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Thursday, 14 March 2013

We all shit, we all pee but never talk about it


अगर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी
तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया
मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी।
दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते ही धुआं छोड़ने वाली
150 सीसी पल्‍सर की रफ्तार से शुरू हो गईं।
‘मैडम हम फलां कंपनी की तरफ से आए हैं, फलां फेयरनेस क्रीम और साबुन और
शैंपू जाने क्‍या-क्‍या तो बेच रहे हैं। एक डेमो देना चाहते हैं।’
मैंने उनकी बात खत्‍म होने से पहले ही अपने रूटीन बेहया लहजे में कहा,
‘नहीं, नहीं, नहीं चाहिए। हम पहले से ही बहुत ज्‍यादा फेयर हैं। क्रीम
लगाएंगे तो करीना कपूर छाती पीटकर रोएगी। उसके रूप के साथ हम अन्‍याय
नहीं कर सकते।’
मजाक नहीं, मैंने सचमुच ऐसा ही कहा। (मैं काफी बदजबान हूं और कब कहां
क्‍या बोल दूं, मुझे खुद भी पता नहीं होता।)
दोनों थोड़ा इमबैरेस सी हुईं, लेकिन फिर मेरे चेहरे पर शरारती मुस्‍कान
देखकर हंसने लगीं। अबकी मैंने फाइनल डिसीजन सुना दिया, ‘Look mam, I am
not interested. ’

मुझे लगा कि अब वो लौट जाएंगी और किसी और का दरवाजा खटखटाकर सुंदर होने
के नुस्‍खे बताएंगी। लेकिन वो कुछ मिनट और खड़ी रहीं। दोनों ने एक ही रंग
और डिजाइन की साड़ी पहन रखी थी। दिखने में पहली ही नजर में कहीं से
आकर्षक नहीं जान पड़ती थीं, लेकिन बरछियां बरसाती बदजात दोपहरी में
दरवाजे-दरवाजे भटकना पड़े तो करीना कपूर भी दस दिन में कोयला कुमारी नजर
आने लगे। वो मेरी तरह कूलर की हवा में बैठकर तरबूज का शरबत पीती होतीं तो
निसंदेह उनकी त्‍वचा इतनी खुरदुरी नहीं लगती।

मैं दरवाजा बंद करके पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन वो मेरी रुखाई के
बावजूद एकदम से पलटकर दोबारा कभी मेरा मुंह भी न देखने को उद्धत नहीं जान
पड़ीं। उनकी आंखों ने कहा कि वो कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन संकोच की कोई
रस्‍सी तन रही है।
हम दोनों ही कुछ सेकेंड चुपचाप खड़े रहे।
फिर जैसे बड़ी मुश्किल से उनमें से एक हिम्‍मत जुटाकर बोली, ‘मैम, हम
आपका बाथरूम यूज कर सकते हैं।’
मुझे उनकी बात समझने में कुछ सेकेंड लगे। फिर बोली, ‘हां जरूर, शौक से।
प्‍लीज, अंदर आ जाइए।’

दोनों कमरे की ठंडी हवा में आकर सुस्‍ताने लगीं। एक-एक करके बाथरूम गईं,
मुंह पर पानी के छींटे डाले। मैंने तरबूज का शरबत उन्‍हें भी ऑफर किया।
दोनों चुपचाप बैठकर शरबत पीने लगीं और उस पूरे दौरान हुई बातचीत से उनके
मुतल्लिक कुछ ऐसी जानकारियां हासिल हुईं।

वो किसी कंपनी में डेली वेजेज पर काम करती थीं, सुबह दस से शाम छह बजे तक
और शाम को मिलने वाले पैसे इस बात पर निर्भर करते थे कि दिन भर उन्‍होंने
कितने प्रोडक्‍ट बेचे थे। वो घर-घर जाकर अपने प्रोडक्‍ट दिखातीं (जैसे
चश्‍मे बद्दूर में दीप्ति नवल चमको साबुन बेचती थी) और जिस घर जातीं,
उनका नाम, मकान नंबर और साइन एक कागज पर दर्ज कर लेती थीं। उनमें से एक
अपने एलआईसी एजेंट पति और दूसरी मां और विधवा बहन के साथ रहती थी। ये
जानकारियां मैंने दनादन सवालों की बौछार करके जुटा ली थीं। लेकिन मैं
mainly जो बात कहना चाहती हूं, उसका इन डीटेल्‍स से न ज्‍यादा, न कम
लेना-देना है।
मैं घूम-फिरकर उस सवाल पर आ गई, जो मुझे इतनी देर से कोंच रहा था।
‘आप दिन भर इतनी गर्मी, धूप में घूमते-घूमते परेशान नहीं हो जातीं।’
‘आदत हो गई है।’
‘आपको प्‍यास लगे तो? ’
‘किसी के घर में पी लेते हैं।’
‘और लू जाना हो तो? ’
‘क्‍या? ’
‘बाथरूम?’
‘बाथरूम जाना हो तो? आप लोगों को प्रॉब्‍लम नहीं होती। 8-10 घंटे आप बाहर
घूमती हैं। बाथरूम लगे तो क्‍या करती हैं?’ ।
मैंने देखा संकोच की एक लकीर उनके माथे पर घिर आई थी। जाहिर था कि जैसे
उन्‍होंने मुझे लड़की, शायद थोड़ी बिंदास लड़की या जो कुछ भी समझकर मुझसे
बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट कर ली थी, ऐसा वो अमूमन नहीं करती होंगी,
नहीं कर पाती होंगी। वैसे भी आप किसी अनजान के घर सामान बेचने जाकर उसके
बाथरूम में नहीं घुस जाते। लेकिन बाथरूम Available न हो तो ऐसा तो नहीं
कि सू-सू अपने आने का कार्यक्रम मुल्‍तवी कर देगी।
उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें दिक्‍कत तो होती है। दिन भर वो कम से कम पानी
पीती हैं। बहुत बार घंटों-घंटों इस प्राकृतिक जरूरत को दबाकर भी रखती
हैं। मेरे काफी खोदने पर उन्‍होंने स्‍वीकारा कि ऐसा करने का उन्‍हें
खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। पेट में दर्द से लेकर यूरिनरी इंफेक्‍शन तक
वो झेल चुकी हैं।
‘पीरियड्स के समय भी आप ऐसे ही घूमती हैं?’
वो और ज्‍यादा अपने संकोच में सिकुड़ गईं। मैं तो कोई पुरुष नहीं थी,
लेकिन शायद लड़कियां भी लड़कियों से ऐसी बातें नहीं करतीं। इसलिए मैं
उन्‍हें थोड़ी विचित्र जान पड़ी।
बोलीं, ‘हां करना तो पड़ता है मैम। क्‍या करें, हमारी नौकरी ही ऐसी है।
एक दिन न आएं तो उस दिन के पैसे नहीं मिलेंगे। और फिर घर भी तो चलाना है।
आजकल महंगाई कितनी बढ़ गई है।’
बातें जो न चाहें तो कभी खत्‍म न हों, को चाहकर हमने खत्‍म किया और वो
चली गईं। वो चली गईं और मैं सोच रही थी। घड़ी की तरह शरीर में भी (खासकर
औरतों के शरीर में) एक अलार्म होना चाहिए, जिसमें हर चीज का टाइम सेट कर
दें। बाथरूम आने का भी टाइम सेट हो। सुबह दस से शाम छह बजे तक नहीं आएगी।
जब घर में रहेंगे, तभी आएगी क्‍योंकि इस देश में पब्लिक टॉयलेट्स सच्‍ची
मोहब्‍बत की तरह ढूंढे से नहीं मिलते। गलती से मिल भी जाएं तो पता चलता
है कि सच्‍ची मोहब्‍बत नहीं, सड़क छाप, बदबू मारते गलीज बीमारियों के
अड्डे हैं, जहां अव्‍वल तो लड़कियां घुसती नहीं और घुसती हैं तो ऐसा ही
समझा जाता है कि छेड़े जाने की हरसत से आई हैं। और जो थोड़ी भलमनसाहत
बाकी हो और उन्‍हें न भी छेड़ो तो आंखें फाड़-फाड़ देख तो लो ही सही।
तो ऐसे देश का सिस्‍टम तो बदलने से रहा, इसलिए अलार्म ही फिट हो सके तो
कुछ बात बने। वरना हम ऐसी ही मुश्किलों से गुजरते रहने को अभिशप्‍त
होंगे।
ऐसी मुश्किलों से मैं भी कम नहीं गुजरी हूं और बीमारियों को खुद आ बैल
मुझे मार करने के लिए बुलाया है।
अपने जिए हुए अनुभव से मैं कह सकती हूं कि हिंदुस्‍तान जैसे मुल्‍क, जो
हालांकि पूरा की पूरा ही बड़ा शौचालय है, लेकिन पब्लिक शौचालय का जहां
कोई क्‍लीयर आइडिया न तो सरकार और न लोगों के दिमाग में है, में किसी
लड़की के लिए ऐसा कोई काम, जिसमें उसे दिन भर सिर्फ घूमते रहना हो, करना
किसी बड़ी बीमारी को मोहब्‍बत से फुसलाकर अपनी गोदी बिठाने से कम नहीं
है।
मुंबई में मैंने कुछ समय फिल्‍म रिपोर्टिंग जैसे काम में हाथ आजमाया था,
जिसके लिए मुझे घंटों-घंटों न घर, न ऑफिस, बल्कि बाहर इधर-उधर भटकना
पड़ता था। सुबह नौ बजे मैं घर से निकलती, दो घंटे ऑटो, लोकल train और बस
से सफर करके यारी रोड, पाली हिल, लोखंडवाला कॉम्‍प्‍लेक्‍स या
महालक्ष्‍मी रेसकोर्स रोड के रेस्‍टरेंट में पहुंचती, फिर वहां से
पृथ्‍वी थिएटर, पृथ्‍वी से जुहू तारा रोड, जुहू तारा से सात बंगला, सात
बंगला से केम्‍स कॉर्नर, केम्‍स कॉर्नर से वॉर्डन रोड करते हुए मेरा शरीर
रोड की तरह हो जाता था, जिस पर लगता हजारों गाडि़यां दौड़-दौड़कर रौंदे
डाल रही हैं।
मुंबई जैसे विशालकाय महानगर में, जहां पांच सितारा होटलों के चमकीले
टायॅलेटों, जिनकी फर्श भी हमारी रसोई की परात जितनी साफ रहती है, इतनी कि
उस पर आटा सान लो, से लेकर बांद्रा की खाड़ी के बगल में बने आसमान के
नीचे खुले प्राकृतिक शौचालयों तक सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन पब्लिक टॉयलेट
ढूंढना वहां भी धारावी में ब्रैड पिट को ढूंढने की तरह है।

सुबह नौ बजे से लेकर शाम 5-6 बजे तक भटकने के बाद मैं ऑफिस पहुंचती और
सबसे पहले बाथरूम भागती थी। दिन भर काफी मिट्टी पलीद होती थी। बॉम्‍बे के
बेहद उमस भरे दिलफरेब मौसम में बार-बार पानी या लेमन जूस पीते रहना
मजबूरी थी, वरना डिहाइड्ेशन से ही मर जाती। इस तरह भटकते रहने का यह
ताजातरीन अनुभव था। शुरू में काफी एक्‍साइटमेंट था। लेकिन इससे और
क्‍या-क्‍या मुश्किलात जुड़े हैं या इसके और क्‍या-क्‍या नतीजे मुमकिन
हैं, इस बारे में तब तक कोई अंदाजा ही नहीं था। नौ बजे घर से निकलने के
बाद 1-2 बजते-बजते मैं काफी परेशान हो जाती थी। लेकिन मैंने हालांकि बड़े
सामान्‍य, लेकिन कुछ विचित्र भी लगने वाले तरीकों से ऐसी हाजतों से निजात
पाई है। ये बोलते हुए हंसी भी आती है, लेकिन फेयरनेस क्रीम बेचने वाली उन
स्त्रियों ने तो मुझसे ही बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट की थी, लेकिन
मैं बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के घर ऐसी डिमांड रख देती थी।
एक दिन स्‍मृति ईरानी के घर पहुंची तो जोर की बाथरूम लगी थी। संकोच बहुत
था, लेकिन कुछ जरूरतें ऐसी होती हैं कि दुनिया के हर संकोच से बड़ी हो
जाती हैं। मैंने बड़ी बेशर्मी से पूछ लिया, May I use your washroom
please.

उसने कहा, yes. Off course. ऑफ कोर्स मैंने खुद को कृतार्थ किया।
एक बार शेखर कपूर के घर, हालांकि वो उस समय घर में नहीं थे (ये बहुत दुख
की बात है, क्‍यों‍कि शेखर कपूर पर मुझे क्रश है) मैंने सुचित्रा से ऐसी
ही रिक्‍वेस्‍ट की और उन्‍होंने बड़ी खुशी से रिस्‍पॉन्‍ड किया। ऐसी
रिक्‍वेस्‍ट मैंने सुप्रिया पाठक, किरण खेर, रेणुका शहाणे, सुरेखा सीकरी,
नादिरा बब्‍बर वगैरह से भी की थी और शायद सबने इस रिक्‍वेस्‍ट की
जेनुइननेस को समझा भी था। इंटरेस्टिंगली सभी स्त्रियों से ही ऐसी बात
कहने का विश्‍वास होता था। बोस्‍कीयाना में बैठकर ढाई घंटे भी इंतजार
करना पड़े तो भी मैं नेचर कॉल को चप्‍पल उतारकर दौड़ाती - 'भाग, अभी
नहीं, बाद में आना।'
सिर्फ कुछ ही महीनों में सेहत की काफी बारह बज गई थी।

2- बंबई में फिल्‍म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्‍कत से
नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज
करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब
अपनी दोस्‍त लेडी डॉक्‍टर्स से लेकर अनजान लेडी डॉक्‍टर्स तक से मैं ये
सवाल जरूर पूछती हूं कि औरतों के बाथरूम रोकने, दबाने या बाथरूम जाने की
फजीहत से बचने के लिए पानी न पीने के क्‍या-क्‍या नतीजे हो सकते हैं?
कौन-कौन सी बीमारियां उनके शरीर में अपना घर बनाती हैं और आपके पास ऐसे
कितने केसेज आते हैं। मेरे पास कोई ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं है कि लेकिन सभी
लेडी डॉक्‍टर्स ने यह स्‍वीकारा किया कि औरतों में बहुत सी बीमारियों की
वजह यही होती है। उन्‍हें कई इंफेक्‍शन हो जाते हैं और काफी हेल्‍थ
संबंधी कॉम्‍प्‍लीकेशंस। कई औरतें प्रेग्‍नेंसी के समय भी अपनी शर्म और
पब्लिक टॉयलेट्स की अनुपलब्‍धता की सीमाओं से नहीं निकल पातीं और अपने
साथ-साथ बच्‍चे का भी नुकसान करती हैं। यूं नहीं कि ये रेअरली होता है।
बहुत ज्‍यादा और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। खासकर जब से औरतें घरों से
बाहर निकलने लगी हैं, नौ‍करियां करने लगी हैं और खास तौर से ऐसे काम,
जिसमें एक एयरकंडीशंड दफ्तर की कुर्सी नहीं है बैठने के लिए। जिसमें दिन
भर इधर-उधर भटकते फिरना है।

मुंबई में मेरे लिए ये सचमुच एक बड़ी समस्‍या थी। हमेशा आप किसी सेंसिटिव
सी जान पड़ने वाली फीमेल सेलिब्रिटी के घर ही तो नहीं जाते। या कई बार
किसी के भी घर नहीं जाना होता, फिर भी भटकना होता है। मैं तो ऐसी भटकू
राम थी कि बिना काम के भी भटकती थी। तो ऐसे में मैंने एक तरीका और ईजाद
किया था। बॉम्‍बे में वेस्‍टसाइड, ग्‍लोबस, फैब इंडिया और बॉम्‍बे स्‍टोर
से लेकर शॉपर्स स्‍टॉप तक जितने भी बड़े स्‍टोर थे, उनका इस्‍तेमाल मैं
पब्लिक टॉयलेट की तरह करती थी। जाने कितनी बार मैं इन स्‍टोरों में कुछ
खरीदने नहीं, बल्कि इनका टॉयलेट इस्‍तेमाल करने के मकसद से घुसी हूं।
काउंटर पर बैग जमा किया, दो-चार कपड़े, सामान इधर-उधर पलटककर देखा और चली
गई उनके वॉशरुम में। इससे ज्‍यादा उन स्‍टोर्स की मेरे लिए कोई वखत नहीं
थी।
बचपन में मैंने मां, मौसी, ताईजी और घर की औरतों को देखा था कि वो कहीं
भी बाहर जाने से पहले बाथरूम जाती थीं और घर वापस आने के बाद भी सबसे
पहले बाथरूम ही जाती थीं। गांव में, जहां हाजत के लिए खुले खेतों में
जाना पड़ता है, वहां तो सचमुच औरतों के शरीर में (सिर्फ औरतों के) अलार्म
फिट था। उन्‍हें सुबह उजाला होने से पहले और शाम को अंधेरा होने के बाद
ही हाजत आती और कमाल की बात थी कि पड़ोस, पट्टेदारी की सारी औरतों को एक
साथ आती थी। सब ग्रुप बनाकर साथ ही जाती थीं, मानो किसी समारोह में जा
रही हों। मैं भाभी, दीदी टाइप महिलाओं से बक्‍क से पूछ भी लेती थी, ‘आप
लोगों को घड़ी देखकर टॉयलेट आती है क्‍या?’ कइयों ने कहा, हां और कइयों
ने स्‍वीकारा कि दिन में जाने का जोर आए तो दबा देते हैं।
कितनी अजीब है ये दुनिया। टायलेट जाते भी औरतों को शर्म आती है, मानो कोई
सीक्रेट पाप कर रही हों। जिस कमरे से होकर बाथरूम के लिए जाना पड़ता है,
या जिस कमरे से अटैच बाथरूम है, उस कमरे में अगर जेठ जी, ससुर या कोई भी
पुरुष बैठा है तो मेरी दीदियां, भाभियां, मामियां और घर की औरतें रसोई
में चुपाई बैठी रहेंगी, लेकिन बाथरूम नहीं जाएंगी। बोलेंगी, ‘नहीं, नहीं,
वो जेठजी बैठे हैं।’ हर दो मिनट पर झांकती रहेंगी, दबाती रहेंगी, लेकिन
जाएंगी नहीं। जेठजी तो गेट के बाहर गली खड़े होकर करने के लिए भी दो मिनट
नहीं सोचते। बहुएं मरी जाती हैं।
जेठ-बहू को जाने दें तो पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़कियों के दिमाग भी कुछ
खास रौशनख्‍याल नहीं हैं। इंदौर में वेबदुनिया में लेडीज टॉयलेट का
रास्‍ता एक बड़े केबिन से होकर गुजरता था, जहां सब पुरुष काम कर रहे होते
थे। वहां भी लड़कियां बाथरूम जाने में संकोच करती थीं। कहतीं,
‘सब बैठे रहते हैं वहां पर, सबको पता चल जाएगा कि हम कहां जा रहे हैं।’
‘अरे तो चलने दो न पता, कौन सा तुम अभिसार पर जा रही हो।’
‘अभिसार मतलब।’
‘अभिसार मतलब रात में छिपकर अपने प्रेमी से मिलने जाना। अभिसार पर जाने
वाली अभिसारिका।’
‘तुम बिलकुल बेशर्म हो।’
‘इसमें बेशर्म की क्‍या बात है। अभिसार में शरमाओ तो समझ में भी आता है।
लेकिन बाथरूम जाने में कैसी शर्म। जो लोग वहां बैठे हैं, वो नहीं जाते
क्‍या।’
‘नहीं यार, अच्‍छा नहीं लगता।’
ऐसे ही इस दुनिया को जाने क्‍या-क्‍या अच्‍छा नहीं लगता। आपकी बाकी चीजें
तो अच्‍छी नहीं ही लगतीं, लेकिन अब आप पानी पीना, बाथरूम जाना भी छोड़
दीजिए। लोगों को अच्‍छा जो नहीं लगता।


ये इतनी स्‍वाभाविक जरूरत है, लेकिन इसके बारे में हम कभी बात नहीं करते।
बच्‍चा पैदा होते साथ ही रोने और दूध पीने के बाद पहला काम यही करता है,
लेकिन औरतों के बाथरूम जाने को लेकर समाज ऐसे पिलपिलाने लगता है मानो
बेहया औरतें भरे चौराहे आदमी को चूम लेने की बेशर्म जिद पर अड़ आई हों।
‘नहीं, हम तो यहीं चूमेंगे, अभी इसी वक्‍त।’
हम कोई अतिरिक्‍त सहूलियत की बात नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि बहुत
मानवीय, उदात्‍त, गरिमामय समाज की डिमांड की जा रही है। प्‍लीज, प्‍यार
कर सकने लायक खुलापन दीजिए समाज में, इतना कि अपने दीवाने को हम चूम
सकें। रात में समंदर किनारे बैठकर बीयर पीना चाहें तो पीने दीजिए।
हल्‍द्वानी-नैनीताल की बीच वाली पहाड़ी पर रात में बैठकर सितारों को
देखने दीजिए। नदी में तैरने दीजिए, आसमान में उड़ने दीजिए। राहुल
सांकृत्‍यायन की तरह पीठ पर एक झोला टांगे बस, Truck, टैंपो, ऑटो,
बैलगाड़ी, ठेला जो भी मिले, उस पर सवार होकर दुनिया की सैर करने दीजिए।
अपनी बाइक पर हमें मनाली से लेह जाने दीजिए और बीच में अपनी नाक मत
घुसाइए, प्‍लीज। प्‍यार की खुली छूट दीजिए या फ्री सेक्‍स कर दीजिए।


ऐसा तो कुछ नहीं मांग रहे हैं ना। बस इतना ही तो कह रहे हैं कि बाथरूम
करने दीजिए। घूरिए मत, ऐसी दुनिया मत बनाइए कि बाथरूम जाने में भी हम
शर्म से गड़ जाएं। इतने पब्लिक टॉयलेट तो हों कि सेल्‍स गर्ल, एलआईसी
एजेंट या हार्डकोर रिपोर्टर बनने वाली लड़कियों को यूरीनरी इंफेक्‍शन
होगा ही होगा, ये बहार आने पर फूल खिलने की तरह तय हो।

प्‍लीज, ये बहुत नैचुरल, ह्यूमन नीड है। इसे अपने सड़े हुए बंद दिमागों
और कुंठाओं की छिपकलियों से बचाइए। सब रेंग रही हैं और हम अस्‍पतालों के
चक्‍कर लगा रहे हैं।


समाप्‍त।

साभार :- मनीषा पांडे के ब्लॉग बेदखल की डायरी से 

Friday, 8 March 2013

किन देशों में महिलाओं की कैसी है स्थिति





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आज यानी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है।  आइए जानते हैं‌ कि किन देशों में महिलाओं की कैसी और क्या स्थिति है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध
भारत: बलात्कार के 24,206, छेड़छाड़ के 42,968 व यौन उत्पीड़न के 8,570 मामले एवं अन्य सभी को मिलाकर कुल 2,19,062 मामले दर्ज किए गए। (2011 में)

अन्य देश: ब्रिटेन में लैंगिक हिंसा के 45,326, अमेरिका में बलात्कार के 90,750, रूस में 15,770 लैंगिक हिंसा के मामले दर्ज किए गए। (2010 में)

कंपनियों के कार्यकारी अधिकारी के पद पर
भारत: विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत हैं।
अन्य देश: अमेरिका और ब्रिटेन में तीन प्रतिशत है। (फॉर्च्यून 500 और एफटीएसई 100 की कंपनियों की सूची 2010)

महिला डायरेक्टर
भारत: भारतीय कंपनियों के निदेशक मंडल में 30 फीसदी महिला निदेशक है।
अन्य देश: नार्वे में सबसे अधिक 37 फीसदी जबकि सऊदी अरब में इसकी संख्या 0.23 फीसदी है। अमेरिका में यह संख्या 16.34 प्रतिशत है। (माईहायरिंगक्लब डॉटकॉम द्वारा किए गए सर्वे की 2012 में जारी रिपोर्ट)

संसद में महिलाएं
भारत: निचले और ऊपरी सदन में महिलाओं का कुल प्रतिनिधित्व 10.3 फीसदी।
अन्य देश: सेनेगल में सबसे अधिक 45 प्रतिशत जबकि भूटान में 13.9 फीसदी, और नेपाल में 33.2 फीसदी।
शिक्षा।

शिक्षा में महिलाएं
भारत: देश में 65.46 फीसदी महिलाएं साक्षर है। राज्यों में 93 फीसदी के साथ केरल सबसे अव्वल जबकि बिहार 63 फीसदी के साथ नीचले स्थान पर है। उत्तर प्रदेश में 59.3 फीसदी औरतें साक्षर है।
अन्य देश: लक्जमबर्ग, नार्वे में 100 फीसदी, यूएसए में 99 फीसदी जबकि सामालिया में 25 व अफगानिस्तान में 12.6 फीसदी महिलाएं साक्षर है।

कामकाजी महिलाएं
भारत: 60 लाख महिलाएं (2011 में) कामकाजी है जिसकी औसत आय (प्रति माह) 9,000 रुपये है। वहीं टॉप पांच फीसदी की प्रतिमाह औसत आय 32,000 रुपये है।

रात को घर से बाहर निकलने में सुरक्षा
भारत: 69 फीसदी महिलाएं आने-आप को सुरक्षित मानती है।
अन्य देश: सिंगापुर में 88, इंडोनेशिया में 84, अमेरिका में 62 जबकि ऑस्ट्रोलिया में 51 फीसदी महिलाएं रात को निकलने में सुरक्षित महसूस करती है। (2012 में गैलप द्वारा 143 देशों के 1.80 लाख से अधिक युवाओं पर किए गए अध्ययन के मुताबिक)

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं
भारत: 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई पिछले तीन दशक में। (द लांसेट 2011 की रिपोर्ट), 8,618 दहेत हत्या के मामले दर्ज किए गए। (राष्ट्रीय अपराध सांख्यकी ब्यूरो 2011)
अन्य देश: रूस में 14,000 महिलओं की मौत हुई। (2010)

मातृत्व
भारत: दुनिया भर में मातृत्व की स्थिति से संबंधित सूचकांक में भारत का स्थान 76वां है। 140 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चो के जन्म पर 212 है।

अन्य देश: नार्वे शीर्ष स्थान पर जबकि नाइजर सबसे नीचे है। चीन में 1500 महिलाओं और श्रीलंका में 1100 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान होती है। (80 कम विकसित देशों में किए गए सर्वे/सेव द चाइल्ड की 2012 की सालाना रिपोर्ट)

परिवार नियोजन से अनजान
भारत: 10-20 फीसदी भारतीय महिलाएं परिवार नियोजन से अनजान हैं।
अन्य देश: पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में 20-30 प्रतिशत जबकि यूगांडा में 41 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन के उपायों से वाकिफ नहीं है।

देश में महिलाओं की स्थिति
--देश में 58.65 करोड़ महिलाएं हैं।
--महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है
--पंचायतों में लगभग 38.87 फीसदी यानी 28.18 लाख चुनी महिलाएं हैं
--विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत
--मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर 212 है।
--भारत के निचले सदन लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10.8 फीसदी और राज्यसभा में 10.3 फीसदी है।
--बंबई शेयर बाजार में 100 सूचीबद्घ कंपनियों में से 1,112 निदेशकों के पदों में सिर्फ 59 (5.3 फीसदी) पर ही महिलाएं हैं।
--देश में कुल 60 लाख कामकाजी महिलाए हैं जबकि बड़े शहरों में कामकाजी महिलाओं की संख्या 36 लाख है।
--2 करोड़ 70 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी कमाई महिला पर टिकी है। कुल परिवारों में ऐसे परिवारों की तादाद 11 फीसदी।
--49 लाख ऐसी महिलाएं हैं जो सिंगल मेंबर फैमिली हैं।
--2001 के मुकाबले महिला प्रधान परिवारों की संख्या लगभग 6 फीसदी बढ़ी है।
--70 प्रतिशत महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है।
--देश में डीजीपी, स्पेशल डीजी, एडीजीपी, आईजीपी व डीआईजी स्तर के कुल 76 महिला अधिकारी है। वहीं अधिकारी से हेड कांस्टेबल तक में महिलाओं की संख्या 71,756 है।

भारत में महिलाओं को अधिकार
प्लांटेशन लेकर एक्ट: 1951 के प्लांटेशन लेबर एक्ट के तहत किसी भी महिला कर्मचारी की तबियत खराब होने या मातृत्व की स्थिति में मालिक को छुट्टी देने होगी। इस एक्ट के तहत महिलाओं को काम करने के लिए बेहतर माहौल और मेहनताना देने की जिम्मेदारी नियोक्ता को ही है।

स्पेशल मैरिज एक्ट: 1954 में लागू किए गए स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत किसी भी धर्म की व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी कर सकता है। (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर)

मातृत्व लाभ कानून: 1961 में लागू किए गए इस कानून के तहत मां बनने की स्थिति में एक निश्चित समयावधि तक महिला को छुट्टी मिलनी चाहिए साथ ही इस दौरान उसकी नौकरी जारी रहेगी और उसे वेतन भी प्राप्त होगा।

दहेज विरोधी कानून: दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों ही अपराध है। इसे 20 मई 1961 को लागू किया गया था।

गर्भपात कानून: 1971 के गर्भपात कानून के तहत किसी भी वजह से महिला का गर्भ किराना कानूनन जुर्म माना गया है। लेकिन इस कानून में कुछ कमियां होने के बाद अप्रैल 1972 में इसमें कुछ बदलाव कर इसे दोबारा मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1972 के नाम से लागू किया गया।

धरेलू हिंसा: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण विधेयक, 2005 (2005 के 43) की धारा एक की उपधारा (3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्रीय सरकार ने 26 अक्तूबर 2006 को लागू किया गया।

Friday, 30 September 2011

जी हाँ बेटा है आपका

 जी हाँ
बेटा है आपका
पगड़ी आपकी सलामत
बेटा पैदा करने की पूरी
कीमत वसूलेंगे आप
माँगेंगे दहेज और कहेंगे
‘बेटी है आपकी
जो है उसी का है ’
कम लाई तो ताना देंगे
मारेंगे..
सच है कि बेटा ही है आपका
बेटी का बोझ न खौफ।
पर क्या गारण्टी इसकी
पोती नहीं होगी आपको

Sunday, 28 August 2011

चुनौती दंभी पुरुषों को






खरी-खरी
वैज्ञानिक लंबे अरसे से चिल्लाते आ रहे हैं कि बुद्धि की प्रखरता, तीक्ष्णता, शार्पनेस और तेजी पर किसी तरह का कोई लैंगिक आरक्षण नहीं है। सनसनाती बुद्धि पर किसी मर्द का एकाधिकार नहीं होता। मानव विज्ञान मानता है कि विद्वता पर पुरुष जबरन अधिकार नहीं जता सकता, यह सामाजिक तानाबाना है, जो औरतों की बौद्धिकता को क्रियाशील नहीं रहने देता

पुरुषों को यह कहते सुनकर औरतें असहज नहीं होतीं कि उनको समझ कम है या वे नहीं समझ सकतीं बल्कि वे उनको खुश करने के लिए यह दर्शाने में कोई संकोच नहीं करती कि वे बेवकूफ हैं। स्त्री की बौद्धिकता पुरुषों को डराती ही नहीं है, उनके पौरुष को चुनौती भी देती है जिसको बर्दा श्त करने की ना तो उनमें क्षमता होती है, ना ही आदत। पीढ़ियों से औरतों के साथ ‘दासों’ जैसा बर्ताव करते रहते के कारण, उनका अहंकार घायल होता है। वे अपने इसी झूठे दंभ के कारण इस भ्रम में जीते हैं कि वे स्त्री से अव्वल हैं। दुखद तो यह है कि औरतों ने कभी उनके इस भ्रम को तोड़ने के प्रयास नहीं किये। उनको चुनौतियां नहीं दीं। उनको यह नहीं बताया कि तुम्हारे दादा-नाना, अहंकार के जो बीज तुम्हारे भीतर बो गये हैं, वे कांटेदार हैं और तुमको भीतर ही भीतर चोटिल करते हैं जिनके चलते, आधी आबादी को बिला-वजह ही तुम दोयम मानते रहे हो। और, जिसका खामियाजा समूचे सामाजिक विकास पर पड़ा है। नयी अर्थव्यवस्था और विकास के आंकड़ों के धुरंधर खिलाड़ी भी मानते हैं कि वे अपनी जनाना फोर्स के श्रम को इस्तेमाल कर रहे हो ते तो कहीं आगे होते। लड़कियों ने पढ़ाई के मार्फत इनको कितनी ही दफे करारा झटका देकर यह अहसास कराने की भी कोशिश की है, पर इनका झूठा अहंकार यह स्वीकारने में कचोटता है। यह दशा सारी दुनिया में है। ‘फोर्ब्स’ ने लगातार कहा है कि दुनियाभर के सीईओ पदों पर औरतों की संख्या ना के बराबर है, वह यह भी खुलासा करती है कि बड़ी कंपनियां अपने बोडरे में महिलाओं की उचित हिस्सेदारी दिलाने में असफल हैं। सच तो यही है कि पुरुषों से ज्यादा जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उनके काम और क्षमताओं की जानबूझ कर अनदेखी होती है। एक तो उनके अधिकारी पुरुष हैं, दूसरे पुरुषों को उनके काम से मतलब नहीं होता। वे औरतों से बौद्धिकता की ना तो उम्मीद करते हैं, ना ही गले उतार पाते हैं। जहां औरत उनसे ज्यादा बुद्धिमान प्रतीक होती है, वे कुंठित हो जाते हैं और अनर्गल बातें करने लगते हैं। औरतों के लिपे-पुते चेहरों औ र कामुक अदाओं में उलझे रह कर वे अपने अहंकार को संतुष्ट कर लेते हैं। उनकी मोहक मुस्कान और गुदगुदी करने वाली बातें पुरुषों को बरगलाती भले ही हैं पर इनकी आड़ में वे उनको प्रतियोगिता से बाहर धकेलने का अधिकार झटक लेते हैं। समान शिक्षा और बौद्धिकता के बावजूद पौरुषेय दंभ औरतों की तौहीन करने पर आमादा रहता है। उसकी खुन्नस बातों, उलाहनों, शिकायतों और बर्ताव में स्पष्ट झलकती हैं। दुनियाभर में लगातार हो रहे अध्ययन भी बता रहे हैं कि पुरुषों को औरतों की लीडरशिप में काम करने में दिक्कत होती है। वे लेडी बॉस से खार ही नहीं खाते, यह भी मानते हैं कि उनको औरतों के आदेश मानने में अटपटा लगता है। दरअसल, औरतों को फॉलो करने में उनका दंभ आड़े आता है। जिनको अपनी उंगलियों पर नचाने का फख्र हो, उनके इशारों पर काम करना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। पुरुष बॉस की झिड़की खाने वाली उनकी मानसिकता स्त्री का आदेश भी गले नहीं उतार सकती। खासकर, जब वह घर में औरत को दुत्कार कर, ताने मार कर, गाली-गलौच कर आ रहा हो तो ऊंची कुर्सी पर बैठी औरत की जुबान से निकला एक भी शब्द उसके जिगर को भेदने के लिए काफी है। औरतों से गुलामों की तरह पेश आने का यह ‘घमं ड’ उसको तार-तार कर देता है, जिसका असर उसकी क्षमताओं पर भी पड़ सकता है। हालांकि यह कहने में मुझे जरा भी संकोच नहीं है कि कम ही औरतें अभी इस ‘दासत्व’ भाव से निकल पायी हैं या निकलने को चेष्टारत हैं। यह दासत्व भाव परिवार और समाज में ही रचा-बसा नहीं है, यही हमको ‘आइडियल’ भी बनाता है। यही हमको महानता का अहसास कराता है, हम पर दया भाव दिलाने की गुहार लगाता है। पुरुषों की दया की आदी हमारी जीवन शैली, उनको चुनौती देते अटकती है। उसको क्षण-क्षण लगता है, यह अमानवीय तो नहीं हो रहा? वह पलट कर सोचती है। अपनी दादियों-नानियों की दुर्दशा को याद करती है। जिन संस्कारों की नींव पर उसको पाला-पोसा गया, उनको भुलाना/दुत्कारना उसके लिए थोड़ा कठिन हो जाता है। वह शोषित रही है, पीड़ित और सताई जाती रही है, जिसकी अभ्यस्त है वह। सिर उठा कर चलते हुए, कभी-कभी संकोच हो जाता है। पुरानी बातें/ पीढ़ियां याद आ जाती हैं। पुरुषों के सूखे मुंह और चेहरों के उड़े रंग उसके आत्मबल को झकझोरने के लिए काफी हैं। जिन कड़ाइयों और रूखेपन को वह बनावटी तौर पर इस्तेमाल करती है, उनकी टीस भी होती है उसको। परंतु कोमलता और भावनात्मकता के भरोसे निष्ठुर/चतुर/मतलबी पुरुषों को चुनौती नहीं दी जा सकती। उनके झूठे दंभ को चोटिल करने के लिए ही हमको यह रूप ओढ़ना है। हम ना तो अपने प्राकृतिक भावनात्मक स्वभाव को छोड़ रहे हैं, ना ही कोमलता को ठस करने का प्रयास कर रहे हैं पर प्रतिस्पर्धा में बिना बराबरी के तुलना नहीं हो सकती। हमको अब दया नहीं चाहिए। आपकी फेंकी रिश्तेदारियां, भावनाएं या संकीर्णताएं हमारी खुराक नहीं बन सकती। हम मदरे की गलतियां नहीं दोहराएं, बल्कि उनकी गुस्ताखियों से सीख लें और उनको पछाड़ने के सुख में ऐंठने की बजाए यह जता सकें कि चुनौती देना तो हमको भी आता है पर हम गुस्ताख नहीं। कुतर्की यह कह सकते हैं कि स्त्रियां तो राष्ट्राध्यक्ष भी हैं, क्योंकि वे यह सचाई नहीं जान सकते कि मल्टीनेशनल बैंक या कंपनी की सीईओ औरतें हैं, तो किस अनुपात में? उसमें जनसाधारण का कोई सहयोग नहीं है। अमूमन तो परिवारों का भी नहीं होता। कड़ी प्रतिस्पर्धा और विपरीत स्थितियों के बावजूद वह जहां पहुंची है, वह तो झलक भर है। अभी तो वह समय आना है, जब स्त्री ही असल शासक होगी, वही असल दाता और मार्गदर्शक होगी। जाहिर है, वह समय अद्भुत होगा, प्रेममय, अपनत्व भरा, सहिष्णुता और लयबद्धता लिये। जहां ना तो उपद्रव होंगे, ना शुष्कता और ना ही बेरहमी ही। औरतों को गुलाम बना कर रखने की पुश्तैनी आदत ने पुरुषों को भीतर से कमजोर किया है। वे अहंकार के चोटिल होते ही, और भी खूंखार हो जाते हैं। बदले की भावना से वे औरतों पर चारित्रिक दोष मढ़ने लगते हैं। उन पर अनर्गल आरोप- प्रत्यारोप पर उतारू हो जाते हैं। औरत की बौद्धिकता, उसकी तार्किकता उनको भयावह लगती है। उनके काम में मीन-मेख निकालने लगते हैं। उन पर जरूरत से ज्यादा बोझ डालने की साजिश में शामिल हो जाते हैं । पीढ़ियों से औरतों ने पुरुष के मन को दासी बनाकर जो सहलाया है, वह उसके ममतीलेपन से नहीं निकल पा रहा है । वह मान बैठा है कि औरत की क्षमता ही यही है। उसको इतना भी शऊर नहीं कि प्राकृतिक रूप से औरत कोमल है, संवेदनशील है, प्रेममय है। ‘देने’ की उसमें जबर्दस्त क्षमता है। वह भाव-विह्वल होकर कुछ भी देने की भूमिका में कभी भी आ सकती है। वह देह-बल में भले ही कुछ कमजोर हो, पर उसका आत्म-बल और चेतना पुरुषों की तुलना में असीम है, जिसको भोथरा करने की कोशिशें करने में पुरुष कहीं मात नहीं खाता। भाषा से, तानों से, गाली-गलौच से वह औरत को हमेशा पीछे धकेलने का काम करते नजर आता है। उसको भीतर ही भीतर डर बैठा है कि औरतों की चुनौती को ना तो स्वीकार ही सकता है, ना उसके सामने ही टिक सकता है। भीतर से कमजोर पुरुष इसीलिए अत्याचारी है। वह घर बैठी स्त्री को सताता है, दफ्तर में काम में जुटी औरत हो या सड़क पर चलती, अपनी कुंठाओं के कारण वह अनजाने ही औरतों पर मानसिक/व्यावहारिक प्रहार करने से बाज नहीं आता। अपनी कमजोरियों को ढांकने का सुख, उसके संपूर्ण मर्द होने के भ्रम को सहलाता रहता है। अपनी कमजोरियों को छुपाने का यह तरीका अनजाने ही उस पर हावी हो जाता है। देखा-देखी, परंपरा से, अनुभवों और व्यवहार से वह इनका इतना आसक्त हो जाता है कि इनसे छुटकारा पाने की कल्पना से भी दिल दहल जाता है। कमजोरियों के मारे पुरुषों के आतंक से दहली औरतों का प्राकृतिक विकास तो ठहरता ही है, वे पुरुषों पर आश्रित भी होती चली जाती हैं, जो सामाजिक नियम बनता गया है। यही कारण होता है कि औरतें बेहद चतुराई से दफ्तर में अपने बॉस की या घर पर पति की चिरौरी कर अपने काम निकलवा लेती हैं। वे जानती हैं कि ठस्स सोच वाला पुरुष चुनौती देने से मानेगा नहीं, इसलिए वे देसी टाइप के हथकंडे अपनाती हैं और उसके अहंकार को बिना ठेस लगाये अपना काम बना लेती हैं। वे कहती हैं, ‘आपसे बुद्धिमान तो कोई हो ही नहीं सकता’ या ‘यू आर जीनियस’। हालांकि इस तरह के जुमले सुनने के आदी हो चुके भोथरी बुद्धि वाले मर्द, किसी भी कीमत पर औरतों को अपनी बराबरी का ज्ञानी नहीं मान सकते। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनको स्त्री का दासत्व रूप इतना सूट करता है कि जहां औरत ने गर्दन उठाई, उनकी संपूर्ण मर्दानगी फना हो जाती है। अपने भीतर के केंचुए को वे स्पष्ट देखना लग जाते हैं। उनकी सारी ऐंठ हवा हो जाती है। यहां से शुरू होता है, विपरीत भय। डरा हुआ पुरुष, रीढ़हीन, मिमियाता, रेंगता। दया मांगता। पंगु। बेचारा। वैज्ञानिक लंबे अरसे से चिल्लाते आ रहे हैं कि बुद्धि की प्रखरता, तीक्ष्णता, शार्पनेस और तेजी पर किसी तरह का कोई लैंगिक आरक्षण नहीं है। सनसनाती बुद्धि पर किसी मर्द का एकाधिकार नहीं होता। मानव विज्ञान मानता है कि विद्वता या समझ पर पुरुष जबरन अधिकार नहीं जता सकता, यह सामाजिक तानाबाना है, जो औरतों की बौद्धिकता को क्रियाशील नहीं रहने देता। अपने यहां तो अभी तक ठीक से लड़कियों को पढ़ाया तक नहीं जाता। आधुनिकता के हितैषियों की बातों के बावजूद आधी औरतें अपढ़ ही हैं, शिक्षित तो दूर की बात है। जीवन अनुभवों का जखीरा है उनके पास पर वे दबाव में होती हैं। घुटन जीती। मुक्ति के अभाव में छटपटाती। दया की भीख मांगती। पौरुषेय दंभ से दबी। पुरुषवादी संस्कारों और नियमों के बोझ से लदी। मुक्ति की यह भूख, आजादी की झटपटाहट उनको चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित करेगी। वे सामने होंगी। उनके भीतर का दासत्व- उनका गुलामीपन उनको मजबूती देगा।

साभार :- मनीषा

Saturday, 27 August 2011

विद नमकीन चार आने की पी...


Himanshu Bajpai ने लिखा है , मुझे यह  अपनी दोस्त  Arima के पोस्ट से प्राप्त हुआ .
समय निकाल कर जरूर पढ़े.
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चवन्नी की विदाई का वक्त है इसलिए पूरे मुल्क के साथ लखनऊ का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. सुबूत चाहिए तो आफताब लखनवी के कुछ अश्आर आपकी खिद्मत में पेश किए दे रहा हूं-

मै अगर छू लूं चवन्नी को अधन्ना हो जाए
‘वो’ अगर बांस को छू ले तो गन्ना हो जाए (वो=महबूबा)
            ***   
मेरे वालिद अपना बचपन याद करके रो दिए
इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन चार आने की पी
पूरी बोतल मेरा छोटा भाई तन्हा पी गया
मैने मजबूरी में लस्सी भर के पैमाने में पी

ये अलग बात है कि नए दौर के लखनऊ ने आफताब लखनवी को ज़मानों पहले भुला दिया और दस बीस बरस में चवन्नी भी उसके ज़हन से गैर हाजिर हो जाएगी. वो चवन्नी जो कभी लखनऊ की ज़बान और बयान के आगे आगे चलती थी. लखनऊ के मकबूल तहज़ीबी जुमलों में चवन्नी का अच्छा खासा दखल था.

अगर किन्ही हज़रत में मर्दानगी कम है तो उनके लिए कहा जाता था कि ‘अमां उनकी चवन्नी कम है’. अगर कोई मोहतरम अक्ल से पैदल हैं तो उनके लिए गढ़ा गया जुमला था कि ‘अमां फुलां साहब चवन्नी गिराए घूमते हैं.’ और अगर कोई कंजूस है तो उसके लिए- ‘अमां छोड़िए वो तो रूपए में पांच चवन्नी बनाते हैं.’ हालांकि तमाम लखनवी तहज़ीब के इन तमाम एजाजो-इकबाल के बावजूद चवन्नी के फेयरवेल के दिन जो मुहावरा मैने सबसे ज्यादा सुना वो‘चवन्नीछाप’ का था, जिसे सुनकर शायद चवन्नी भी दिल शिकस्ता (टूटे हुए दिल वाली) हो जाती होगी.

जहां तक मेरी जानकारी है ये मुहावरा 80 के दशक में कानपुर में उपजा और बाद में पूरे हिन्दोस्तान में बीमारी की तरह फैला. होता यूं था कि कानपुर से एक दौर में नौटंकी की पार्टियां पूरे देश में जाती थीं. इनमें उत्तेजक प्रसंग आने पर दर्शक मंच की तरफ चवन्नियां उछालते थे. बाद में ये चलन सिनेमा हाल तक जा पहुंचा. इन्ही लोगों को चवन्नी छाप कहा जाता था. मुहावरा पूरी तरह इंसानी मेयार बताने के लिए था लेकिन बाद में चवन्नी का मेयार भी इसी से तय होने लगा. दुनिया ये भूल गई कि इसी चवन्नी से बचपन अपने बेशुमार ख्वाब खरीद लेता था.   

बहुत पुरानी बात नहीं है जब लखनऊ में चिच्चा(पन्नी की छोटी पतंग) और डग्गा(कागज की छोटी पतंगें जिनके पीछे छोटी सी पूंछ लगी होती है.)पतंगों की कीमत चवन्नी हुआ करती थी. दो चवन्नी मिलाकर मै और मेरा भाई सुपर कमांडो ध्रुव नागराज या डोगा की एक कामिक्स किराए पर लाते थे,जिसे पढ़ते पढ़ते ही मै निराला, मीर और तहलका तक पहुंचा. 25 पैसे में इनाम खोलने का एक कूपन मिलता था जिसमें कभी कभी घड़ी और मिथुन या धरमिंदर का बड़ा पोस्टर तक हाथ लग जाता था. शक्तिमान का स्टिकर भी चवन्नी में ही दस्तयाब था. मांएं अपने बच्चों को नज़र और हाय से बचाने के लिए चवन्नी की शरण में ही जाती थी. फिर बच्चे अपनी करधनी और गले से चवन्नी लटकाए घूमते थे. यही नहीं आंख दुखने पर मां जो देसी ट्यूब (जिसे आम जुबान में गल्ला कहते हैं,) बच्चे के लगाती थी वो भी चवन्नी का मिलता था. इसके साथ ही  संतरे की वो सदाबहार टाफियां भी याद आती हैं जो मेरे पूरे बचपन भर ‘चवन्नी की दो वाली’ संज्ञा से ही नवाज़ी जाती रहीं. (अंग्रेजी में मजबूत कुछ बच्चे इन्हे आरेंज वाली टाफी भी कहते थे).  इसी तरह कुछ टाफियों का नाम 'चवन्नी वाली' भी था. संतरे की फांक जैसा लैमनजूस या लैमनचूस (पता नहीं इसका सही नाम क्या होता है,) भी चवन्नी का ही मिल जाता था.
बचपने का रिजर्व बैंक यानि गुल्लक को तोड़कर अपनी अमीरी दिखाने के लिए जब सिक्कों की कुतुब मीनार बनाई जाती थी तो  उसकी सबसे ऊपरी मंजिल भी चवन्नी से ही बनती थी. ये भी कहा जाता था कि चवन्नी को अगर कड़वे तेल में डुबो कर रेलगाड़ी के नीचे रख दो तो वो चुम्बक बन जाती है, कई दफा ये प्रयोग मैने भी सिटी स्टेशन और चारबाग की पटरियों पर आजमाया लेकिन सफल नहीं रहा. चवन्नी को उंगली की चोट से देर तक घुमाने की प्रतियोगिताएं भी खूब होती थी जिसमें इनाम वही चवन्नी होती थी. स्कूल के बाहर काला वाला तेज़ाब मिला हुआ चूरन भी चवन्नी में एक पुड़िया मिल जाता था जो कि जबान पर छाला निकालने के लिए काफी होता था. इसी तरह आइसक्रीम के ठेलों पर डिस्को नाम की एक आकर्षक चीज (पन्नी में भरा ठंडा रंगीन मीठा पेय) का दाम भी 25 पैसे था.

लेकिन फिर एक वक्त और भी आया जब इसी चवन्नी के दिन ऐसे बदले कि सफर पर जाते वक्त ढूढ ढूढ के चवन्नियां रखी जाने लगी. भिखारियों को देने के लिए. और भिखारी भी इन्हे, देने वालों को चवन्नीछाप कहके वापस कर देने लगे. बच्चों ने चवन्नी लेकर दुकान जाना बंद कर दिया और अगर कोई बच्चा पहुंच गया भी तो दुकानदार ने बनियागिरी दिखाते हुए उसका दिल तोड़कर उसे ये कहते हुए लोटा दिया कि चवन्नी नही चलेगी. जबकि मुझे घर के पास वाला बनारसी आज भी याद है जिसने मुझे 25 पैसे की इमली की गोली एक बिस्सी यानी 20 पैसे में इस शर्त के साथ दी थी कि मै पंजी या 5 पैसे उसे बाद में दे दूंगा. हालांकि मै उन्हे कभी दे नहीं पाया और पता नहीं बनारसी दादा कहां चले गए. चवन्नी के बंद होने पर व्यवहारिक रूप से कोई क्षोभ जरूरी नहीं है. लेकिन फिर भी चूंकि ये घटना अतीत के खूबसूरत पन्ने दोबारा पलट गई है इसलिए माहौल का जज्बाती होना लाजिमी है. पहले बनारसी दादा गए, फिर बचपन गया और आज बचपन के खजाने का सबसे बड़ा सिक्का यानि चवन्नी भी रूखसत हो गई.

बेशर्मी मोर्चा - Walk Walk बदलो-बदलो बदलो


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यह मार्च सादा था, बिना शोर-शराबे और दिखावे का था। स्त्रीवादी मुहिम ना होने के बावजूद सड़क पर स्लोगनों और पोस्टरों के साथ निकली लड़कियों के साथ ढेरों लड़कों ने आकर पहली बार जता दिया कि वे उनकी पीड़ा बांट रहे हैं। सोच बदलने और अपने भीतर की गंदगी को निकाल फेंकने के जोशीले वॉक पर स्पर्धा

‘दिस इज नॉट एन इंविटेशन टू रेप मी‘ जैसे स्लोगन लिखे कपड़ों को पहने लड़कियां जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुई। लोगों की सोच के विपरीत इस स्लटवॉक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का आयोजन केवल कपड़े पहनने की स्वतंत्रता के लिए नहीं किया गया था। इस मोच्रे का आयोजन विचारों में खुलेपन लाने के लिए किया गया था। कपड़े चाहे छोटे हों या बड़े, खाने का मन चाहे पिज्जा का हो या रोटी का, वकील बनने का मन हो या घर संभालने का, मनमर्जी शादी करने का, जब बात किसी व्यक्ति की हो रही है तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता है कि उसकी क्या ख्वाहिश है और वह क्या पाना चाहता है। यही वजह रही कि इस स्लटवॉक को समझने में कुछ लोग चूक गए। इसे महज कपड़ों के मामले में उलझा समझ लिया गया, जबकि यहां बात हर मामले में स्वतंत्रता और अपने हक की लड़ाई की है। यह लड़ाई सिर्फ पुरुषों से नहीं बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति, संस्था, रीति-रिवाज और परिपाटी से है, जो मुक्ति को बांधे बैठी है। यह वॉक उन महिलाओं द्वारा की गई शुरुआत नहीं है, जो खादी की साड़ी में लिपटी, बड़ी बिंदी लगाए और चप्पल पहने औरतों के हक की लड़ाई लड़ती हैं। यह वॉक उन लड़कियों द्वारा शुरू की गई है, जो जमीनी स्तर पर काम नहीं कर रहीं लेकिन इन्हें पता है कि किस तरह की दिक्कतों का सामना ये करती हैं। सरे राह छेड़छाड़ हो या कपड़ों पर फब्ती, सिर्फ पुरुष ही नहीं, पुरुष मानसिकता वाले लोग लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार का ठीकरा उनके कपड़ों पर ही फोड़ते हैं।

 हां, यह जरूर है कि स्लटवॉक मुहिम की शुरुआत टीनएजर द्वारा शुरू की गई है, जो सही तरह से महिलाओं की परेशानियों और मुद्दों को अभी गहराई से समझती नहीं है। तभी तो जब इसे आयोजित करने वाली उमंग सभरवाल आगे के कदम पर निरुत्तर हो जाती है। बस केवल यही कहती है कि मैं इसे बढ़ाना चाहती हूं लेकिन आगे के कदम के बारे में कुछ सोचा नहीं है। यह उमंग की कम उम्र का ही असर है कि उसे इस वॉक का भविष्य नजर नहीं आ रहा। यही वजह है कि मुंबई में सितम्बर में होने वाले स्लटवॉक के बारे में उमंग को कुछ पता नहीं। वह बस यही कहती है कि यदि उन्हें मेरी कोई मदद चाहिए, तो मैं यहां मौजूद हूं। दरअसल, अपने यहां यही तो दिक्कत है। औरतों के हक की लड़ाई सामूहिक तौर पर नहीं लड़ी जाती। सबने अपने-अपने मोच्रे खोल लिए हैं। सभी अपनी तरह से लड़ रहे हैं। यह बात उन्हें समझ ही नहीं आती कि जब तक सामूहिक तौर पर इस समाज से लड़ा नहीं जाएगा, तब तक कुछ हासिल नहीं होने वाला, कोई हवा नहीं बदलने वाली। शायद जब मामला और बड़ा होगा, इससे न केवल मेट्रो बल्कि कस्बों और गांवों की युवतियां भी जुड़ेंगी तो औरतवादी हक के पक्ष में लड़ने के लिए मसले भी कई होंगे। तब केवल पहनावा या अपनी स्वतंत्रता के लड़ने के मुद्दे के अलावा भ्रूण हत्या, दहेज, घरेलू हिंसा, प्रेमी प्रताड़ना जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे और लड़े जाएंगे। हां, 19 साल की उमंग के दिमाग में यह जरूर साफ है कि वह फेमिनिस्ट नहीं, उसकी लड़ाई इंसानियत के हक की है। दरअसल, हमें समझने की जरूरत है कि उमंग सभरवाल समाज के उस तबके से आती है, जो अपर मिडिल क्लास है, जिसकी अलग समस्याएं है, जो गांव-कस्बों की लड़कियों की समस्याएं को नहीं समझ पाते।

 स्लटवॉक न केवल पुरुषों के खिलाफ हो, बल्कि यह ’रन‘ उस समाज के खिलाफ हो, जहां लड़कियों पर कानून कसने वालों का शिंकजा बुरी तरह से हावी रहता है। यह न पहनो, ऐसे न करो, यहां न जाओ, यह मत खाओ, जैसे कहने वालों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए हो स्लटरन। मॉडर्न ड्रेस पहन लिए और किसी ने फब्ती कस दी तो साथ वाली कहती है, यार! तुझे ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए थे। भला कोई दूसरा यह कैसे तय कर सकता है कि किसी को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं? हमें किस तरह से चलना चाहिए, किस तरह से ऑफिस जाना चाहिए, यह दूसरा तय नहीं कर सकता। इसे तय करेगा खुद वही, जिसे चलना है। औरतों पर पाबंदी लगाने को भला हम टीवी चैनलों को कैसे भूल सकते हैं? भारी-भरकम साड़ी और लदे- फदे गहनों में टीवी की ये औरतें इस स्लटवॉक का उपहास उड़ाती दिखती हैं। इन दिनों टीवी पर एक धारावाहिक आ रहा है, जिसमें बहू को डॉक्टरी की पढ़ाई की इजाजत तो मिल गई लेकिन वह मेडिकल कॉलेज भी गहनों में लदी- फंदी जाती है। अब भला यह तो वही बता सकती है कि भारी साड़ी और गहनों में वह किस तरह पढ़ाई करती होगी और किस तरह लैब में चीर- फाड़ करती होगी। फेसबुक पर शुरू की गई इस मुहिम को कइयों ने पसंद किया तो कइयों की सोच थोड़ी अलग सी दिखी। लोगों ने इसे गलत तरीके से सोचा भी और समझा भी। कुछ ने तो इसे सिर्फ लड़कियों के पहनावे से जोड़कर देख लिया। कुछ ने फेसबुक के इस पन्ने पर निगेटिव कमेंट्स भी दे मारे। ऐसे लोगों के बारे में उमंग कुछ कहना नहीं चाहती। वह बस यही कहती है कि इनकी मानसिकता ठीक नहीं।

 हमारा मुद्दा सिर्फ यही है कि किसी के व्यक्तित्व पर कोई दूसरा हक नहीं जमा सकता। फेसबुक के इसी पन्ने पर ऋचा शर्मा कहती हैं कि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबारों में स्लटवॉक के बारे में पढ़ा है। मैं उन लड़कियों में हूं, जिनके माता-पिता यह सोचते हैं कि लड़कियों के पहनावे की वजह से ही उनके साथ गलत है। मैं चाहती हूं कि उनकी भी मानसिकता बदले। अपनी आजादी को लेकर लड़कियों द्वारा निकाली गई इस रैली को कैश करने की कोशिश में कई लोग गए हैं। इनमें मुख्य नाम पूनम पांडे का है। इन्हें पहचान की तो दरकार नहीं, फिर भी लाइमलाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करना चाहिए। सो, दिल्ली के स्लटवॉक की नकल करते हुए मुंबई में होने वाले स्लटवॉक की अगुवाई का जिम्मा इन्होंने उठाया है। कहती हैं कि काश! मैं दिल्ली स्लटवॉक का हिस्सा बनती। पूनम को क्या किसी ने मना किया था कि दिल्ली आने के लिए उन्हें किसी बात का डर था? अब यह तो पूनम ही जानें लेकिन यह जरूर तय है कि उमंग द्वारा शुरू किए गए बेशर्मी मोच्रे की शुरुआत हो चुकी है। इसे बड़े मोच्रे पर ले जाने की जरूरत है ताकि यह मसला लड़कियों की आजादी का बन जाए ताकि यह मसला स्त्रियों के हर उस हक का बन जाए, जिसकी वे हकदार हैं। इसे केवल ’वॉक‘ नहीं बल्कि ’रन‘ बनाने की जरूरत है। (फेसबुक कमेंट्स पेज 2 पर भी)

यह प्रेरणा देने वाला है कि समाज में व्याप्त बुराइयों से लड़ने के लिए हम आगे बढ़े हैं..लेट्स गो पीपल
हम लड़कियां हैं..और हमेशा रहेंगी.हम भी निर्णय ले सकती हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत..!!
मुझे लगता है कि अब की लड़कियां समझदार हैं..वे जानती हैं कि उन्होंने क्या पहना है और उन कपड़ों को कैसे कैरी करना है..ये तो कुछ मूर्ख लो ग हैं, जिनकी मानसिकता छोटी है..जिनके लिए आप कुछ नहीं कर सकते..

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........................................................राष्ट्रीयसहारा समय लाइव ' आधी दुनिया '  के साभार से

लिबास की ‘गरिमा’



दुनिया काफी आगे निकल चुकी है लेकिन नहीं बदली तो स्त्री की जिंदगी। कहीं बुर्के पहनने का तालिबानी आदे श है तो कहीं बिकनी में बिकाऊ है। वस्त्रों से पहचानी जाती है औरत। वस्त्रों का बाजार सिर्फ विज्ञापनों में कैद नहीं, वह भव्य आकषर्ण के साथ आपके ड्राइंग रूम में आ चुका है। वस्त्रों का बाजार है, अंत:वस्त्रों का बाजार है, अल्प वस्त्रों का बाजार है और निर्वस्त्रों का भी बाजार है। अल्प वस्त्रों की दुनिया अलग है । ब्रह्मांड सुंदरी, वि सुंदरी प्रतियोगिताएं हैं। फिगर का भूगोल है और स्विम सूट की परेड है। बिकनी का नाप-जोख है। स्त्रियां अब भी खांचों-खांचों में हैं। घर में बुर्का, बाहर बिकनी है, पर स्त्री हर जगह बिकनी है, बाजार चाहे जहां, जै सा हो
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दी कहा करती थीं अम्मा से, ‘सिर पर कील ठोंकनी पड़ेगी, तब ठहरेगा सिर पर पल्ला..।’अम्मा बताती हैं, ‘दादी पिछौरा ओढ़ा करती थीं। साड़ी का घूंघट और उस पर बड़ी चादर-सा पिछौरा’। अम्मा को भी कड़ी हिदायत थी, ‘घर से बाहर बिना पिछौरा ओढ़े कदम नहीं रखा जाए।’ अम्मा को यूं सिर से पांव तक ढंका-मुंदा होना अखरता। दोपहर की भजन-मंडली में सास-बहू का फेरा अकसर लगता। दादी गहरी सांस लेकर अम्मा को बताया करतीं कि तुम्हारे ससुर के रहते देहरी लांघना नसीब में नहीं रहा, किसी बाहर वाले के सामने नहीं पड़े हम। बाहर जाने की मोहलत के बावजूद अम्मा को पिछौरा अखरता। अकसर बाहर निकलने से पहले वे दादी का पिछौरा छिपा देतीं। दादी परेशान होती रहतीं, भजन- मंडली का आकषर्ण उन्हें बिना पिछौरे के देहरी लांघने देता और अम्मा का रास्ता साफ हो जाता। अम्मा जब-जब यह किस्सा सुनातीं, मुझे यह सवाल परेशान करता-घूंघट से कोई परेशानी क्यों नहीं थी अम्मा को? मेरी बारी आई तो पाया कि सास उन इलाकों में जाते हुए जहां उनके परिचित अधिक रहते थे, वह अपने सिर का पल्ला कुछ और आगे खींच लेतीं, मुझे देखते हुए। संकोच, संस्कार और उनका मान रखते हुए मेरा पल्ला सिर पर आ ही जाता। ऐसा करते हुए अकसर सोचा करती, अपनी अगली पीढ़ी के साथ ऐसा कुछ नहीं होने दूंगी। जब देवर की शादी हुई, अनायास ही देवरानी से कह बैठी, ‘तुम तो सलवार-कुर्ती ही पहनो।’ देवरानी मुस्कुराती रही आंखों में। ‘भाभी जी!
जीन्स...’ बाकी बातें उसकी आंखों की शरारत कह गई। तब कहीं झटका-सा लगा अंदर। मैंने यह तय करने का जिम्मा क्यों और कैसे ले लिया कि वह क्या पहने/क्या न पहने। बहू आई तो सहर्ष कहा- ‘बेटी, जो अच्छा लगे, पहनो।’ बहू ने शालीनता से कहा- ‘ममा! मुझे मालूम है कि आपके सामने शॉ र्ट्स कभी नहीं पहन पाऊंगी। कैप्री में कम्फर्टेबल हूं।’
मैं घर से संसद तक यात्रा कर जाती हूं। प्रिया दत्त की वेशभूषा पर पुरानी सांसदों ने रोक लगाई थी। साड़ी शालीन और गरिमामय वेशभूषा है, संसदीय कार्यवाही में अपनी उपस्थिति.., साड़ी में ही की जानी चाहिए। प्रिया दत्त प्रश्नाकुल थीं, ‘जो सहजता से रोज पहनती हूं, जिन कपड़ों में काम पर जाती हूं, वे कपड़े यहां क्यों नहीं?’ प्रिया अपना प्रतिरोध दर्ज कर पाई पर भारत के हृदय प्रदेश की राजधानी के एक चर्चित महाविद्यालय की प्राध्यापक कोई प्रतिरोध नहीं कर पाई, जब कहा गया, ‘जनभागीदारी समिति का निर्णय है, महिला प्राध्यापक साड़ी में आएं महाविद्यालय।’ साथ ही जोड़ा गया, ‘सलवार-सूट पहनने से आप में और छात्राओं में फर्क करना मुश्किल हो जाता है, वे आपका सम्मान नहीं करतीं और फिर अगर रोका नहीं गया तो कल आप जींस पहनकर आने लगेंगी। छूट की कोई सीमा तो होनी ही चाहिए। महाविद्यालय की भी कोई गरिमा होती है।’ छूट.. गरिमा..सम्मान.. शब्द देर तक खटकते रहे। हुक्म उदूली करती कुछ प्राध्यापक आंखों में खटकती रहीं। खलनायिका घोषित की जाती रहीं। शेष भारतीय संस्कृति को साड़ी में समेट अपने लो-बैक ब्लाउज में लुका-छिपी करती रहीं। कॉलेज की छात्राएं अपने चेहरे की त्वचा की मासूमियत बचाने कपड़ा बांध-बांध कर कॉलेज, बाजार, सिनेमा हॉल और दूर-दूर तक जाती रहीं। अभिभावक परेशान होते रहे, लड़कों के साथ मोटरसाइकिल पर सवार या अपनी सवारी पर तेज रफ्तार बाजू से निकली गुल खिलाती लड़की कहीं हमारी ही बेटी तो नहीं। जरा दूर तक नजर घुमाएं। बुर्के की वापसी के तालिबानी आदेश हैं, क्रूर, निरंकुश, तानाशाही आदेश’.. आदेशों के पालन/इनकार पर आंख गड़ाए दरिंदे। शरीर का कोई अंग दिखा और भरे बाजार, बीच चौराहे पत्थरों से लहूलुहान किया जाता आपका शरीर..। यही सजा मुकर्रर है। और उस पर तुर्रा यह कि आप अपनी ही चीखें अपने टेलीविजन सेट पर री- प्ले में बार-बार देख सकती हैं, सिहर सकती हैं, यह सिर्फ नसीहत नहीं तमाशा है, बार- बार दिखाया जाता है। स्वतंत्रता के हिमायती, दुनिया के आका देश अमेरिका के रंग-ढंग अलग हैं। ट्विन टावर के ध्वंस के बाद उनके देश में सलवार-कुर्ती पहनी औरत संदिग्ध है, वह डराती है, चौकस निगाहों के केंद्र में वह वहां भी है। औरत के कपड़ों से तय होता है मजहब, जात पहचानी जाती है। एक और इलाके में नया अध्यादेश है, ‘स्त्री अपना चेहरा छिपा नहीं सकती/हिजाब/बुर्का/मुखौटा नहीं चाहिए।’ सुरक्षा बड़ा प्रश्न है, आपके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, ‘पर्दा/बेपर्दा-स्त्री की मर्जी कहीं नहीं। कहीं विक्टोरियन आदर्श हैं, टेबलों की और स्त्रियों की तीन-चौथाई टांगें ढंकी होनी चाहिए। टांगें नहीं दिखाई जानी चाहिए, बाकी कोई हर्ज नहीं। सुदूर जंगलों में स्वच्छं द, एक वस्त्रा आदिवासी स्त्रियां.. मनमर्जी का जीता देख खुश हों, इसके पहले ही पर्यटकों की लोलुप निगाहें उन्हें शर्मिन्दा होना सिखा देती हैं। कहीं चेहरा घूंघट में छिपाए रहने के परम्परागत आदेश हैं- ‘चेहरा अलग-अलग है, उसे छिपाया जाए’। बाकी शरीर की शर्म कैसी? शर्म तो तब भी कैसी जब बदला लेने का आसान अस्त्र..सरेआम नंगा किया जाता है औरत को.. मजमा लगता है तब चौराहों पर। द्रौपदी की नियति आज भी दु:शासनों के हाथ है। आपसी बदला इस दा लिबास की ‘
नंगई से लिया जाता रहा है, लिया जा रहा है, सभ्य समाज में!
औरत क्या पहने, क्या न पहने, कहां तक पहने, कहां तक न पहने, कब पहने, कब न पहने.. औरत के हाथ में कुछ नहीं। उसकी गरिमा, लिहाज, शर्म का पैमाना उसके वस्त्रों से तय होता है जिन्हें तय करने का अधिकार उसके पास नहीं। वस्त्रों में व्यक्त होता स्त्री संसार, उसकी हैसियत, उसकी भूमिका। .. और उसका मनमाफिक कुछ भी नहीं। वस्त्रों से पहचानी जाती है औरत। वस्त्रों का बाजार है, अन्त:वस्त्रों का बाजार है, अल्पवस्त्रों का बाजार है, निर्वस्त्रों का बाजार है। वस्त्रों का बाजार सिर्फ विज्ञापनों में कैद नहीं, वह भव्य आकषर्ण के साथ आपके ड्राइंग रूम में आ चुका है। घर से निकले तो आपके साथ-साथ चलता है, आप साथ नहीं चलते तो निगाहों के निशाने पर होते हैं। हिकारत से देखे जाते हैं। कम से कम प्रेजेंटेबल तो देखिए। निर्वस्त्रों का बाजार और है। पोर्न पत्र/पत्रिकाएं अब पुराना फैशन हैं। इंटरनेट अपनी ऑक्टोपसी बांहें हजार-हजार गुना फैलाए खड़ा है, आमंत्रित कर रहा है। यह बाजार घर में रहने वाली ‘अपनी स्त्रियों’ के लिए नहीं। यह आनंद बाजार बनता है, घर से बाहर की स्त्री से। इस बाजार से पैसा बनता है। यहां निर्वस्त्र स्त्री उपकरण- सी साधी जाती है। नंगी स्त्री देह बिकाऊ है, सदियों से, तरीके बदलते रहे हैं। अल्प वस्त्रों की दुनिया अलग हैं। ब्रrांड सुंदरी, वि सुंदरी प्रतियोगिताएं हैं। फिगर का भूगोल है, स्विम सूट की परेड है। बिकनी में नाप-जोख है और है निर्णायक मंडलों की जमात में गिद्ध ही गिद्ध। गिद्ध दर्शक हैं। गिद्ध वे भी हैं जो बाजार भाव तय करते हैं। इस बाजार के लिए बेटियों को तैयार करते और लेकर आते पिताओं की कतार लम्बी है.. मंडी में गहमागहमी है। कई जोड़ी आंखें हैं, जो घूंघट और बुर्के के पीछे से आंखें फाड़-फाड़ कर यह दृश्य देख रही हैं, अपने टेलीविजन सेट पर। उधर, फ्लड लाइट में नहाई चकाचौंध... और इधर अपनी देह पर काले स्याह आघात और दंश। सात पदरे में छिपी स्त्री देह के पार चीरती, घंसती निकट रिश्तेदारों की लेजर- सी आंखें हैं। पोर्न संसार में भटकता, खोजता किशोर है, जो वही प्रयोग साथ पढ़ती किशोरी के साथ करने उतावला है। वस्त्रों, गहनों का विज्ञापन बनी परिवार की समृद्धि का ऐलान करती अपने-अपने परमेर के साथ गृहलक्ष्मियां हैं। रोशनी की बाढ़ में डूबती-उतराती कुछ और स्त्रियां.. जिनके देह के भूगोल बाजार रचते हैं बाजार बचाए रखने का दावा करते हैं। स्त्रियां अब भी खांचों-खांचों में हैं। घर में बुर्का, बाहर बिकनी है, पर स्त्री हर जगह बिकनी है, बाजार चाहे जहां हो, जैसा हो। कहीं दूर ‘मजाज’ की पंक्तियां गूंजती रहती हैं- ‘तेरे माथे का ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था।’
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औरत क्या पहने, क्या न पहने, कहां तक पहने, कहां तक न पहने, कब पहने, कब न पहने.. औरत के हाथ में कुछ नहीं। उसकी गरिमा, लिहाज, शर्म का पैमाना उसके वस्त्रों से तय होता है जिन्हें तय करने का अधिकार उसके पास नहीं। वस्त्रों में व्यक्त होता स्त्री संसार, उसकी हैसियत, उसकी भूमिका। .. और उसका मनमाफिक कुछ भी नहीं.

सभार   :- डॉ. रेखा कस्तवार

हम मेहनतकश इस दुनिया से , जब अपना हिस्सा माँगेगे , एक खेत नहीं एक बाग़ नहीं , हम सारी दुनिया माँगेगे