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Saturday, 5 September 2015

' बेटों' के प्रति 'अनुकूलित आग्रह' और बेटियों के लिए ' दुरग्रह '


यह शोध -लेख शास्त्र और लोक दोनो ही माध्यमों से ' बेटों' के प्रति 'अनुकूलित आग्रह' और बेटियों के लिए ' दुरग्रह' की व्याख्या कर रहा है- पठनीय .
" जैविक मातृत्व मिथ की तीसरी धारणा- बच्चे को उसकी अपनी माँ ही आवश्यक है, यह पहले से कहीं ज्यादा दमनकारी पहलू है। इस धारणा के तीन अंतर्निहित बिंदु है (1) बच्चे को सामाजिक माँ नहीं बल्कि जैविक माँ की जरूरत होती है। (2 ) नवजात शिशु की देखभाल पिता की अपेक्षा माँ अच्छे से कर सकती हैं। (3 ). बच्चे को अनेक नहीं मात्र एक पालक-पोषक ( जैविक माँ की वरीयता ) की जरूरत होती है। ऐन ओकली दत्तक संतानों के अध्ययनों से यह सिद्ध करती हैं कि सामाजिक माँ भी जैविक माँ जितना ही प्रभावकारी होती हैं। दूसरी धारणा कि माँ पिता की अपेक्षा बेहतर देखभाल करती है, को बेबुनियादी ठहराते हुए ऐन ओकली लिखती हैं कि ' आत्मीय, पारस्परिक व पालन-पोषण का रिश्ता ही बच्चे की पिता अथवा माता से जरूरत का निर्धारक बनता है।' और तीसरी धारणा कि बच्चे को एक पोषिका की जरूरत होती है। एक उदाहरण से ऐन ओकली इसे गैर जरूरी सिद्ध करती हुई सामूहिक समाजीकरण और बहुविकल्पी मातृत्व की महत्ता को रेखांकित करती हैं।
इस तरह ऐन ओकली अपने अध्ययन व तर्कों के आधार पर जैविक मातृत्व को स्त्री की प्राकृतिक आवश्यकता माने जाने को खारिज करती है। इसे वह दमनकारी उद्देश्य से रचित एक मिथ के तौर पर चिन्हित करती हैं। ऐन ओकली की भांति शुलामिथ फायरस्टोन भी जैविक मातृत्व के स्त्री नियंत्रणकारी पक्ष पर लिखती हैं, ' एक पुरुष के लिए उसका संतान उसके नाम, संपत्ति, वर्ग, जाति, पहचान का माध्यम होता है। इसके उलट स्त्री के लिए वहीं संतान घर के भीतर सीमित अस्तित्व का माध्यम बन जाता है।'-"



ब्राह्मणवादी पितृसत्तामक व्यवस्था ने अपनी मजबूती हेतु तमाम तरह के नीति व नियम बना रखे हैं। इस व्यवस्था ने कई तरह की सामाजिक, धार्मिक मान्यताओं को समाज में इस कदर पैबस्त कर रखा है कि जिनके पूरे न होने पर व्यक्ति अपने जीवन को निकृष्ट समझता है, जैसे- पुत्र-प्राप्ति। संपूर्ण हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पुत्र प्राप्ति की इच्छायें पुत्र की महत्ता आदि सहस्त्रमुख से वर्णित है, लेकिन पुत्री की कामना कहीं नहीं दिखती। हिंदू विवाह संस्कार का मूल उद्देश्य ही पुत्र-प्राप्ति है। पुत्र से ही वंश-परंपरा आगे बढ़ती है,  इसलिए पुत्र को ' वंशकर'   कहा जाता है।  पुत्र ही पिण्डदान देकर तर्पण आदि करके पितृऋण चुका पाता है इसलिए पुत्र ही इच्छित है, पुत्री नहीं। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्रोत्पत्ति को ही मनुष्य का परम धर्म कहा गया है. ' पुत्र  ब्राह्मण! इच्छध्वं सवै लोकऽवदावदः।' 

पुत्र ही पिता के धार्मिक कार्य का उत्तराधिकारी बनता है। पितृयज्ञ का वास्तविक अर्थ श्राद्ध है और पुत्र ही इस यज्ञ को सम्पन्न कर सकता है। पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति ही समाज में इस लिंग - विभेद की असाधारणता को सूचित करती है. ' जो  पितरों को पवित्र कर दे अथवा पुत नामक नरक से बचा ले, वह  पुत्र है।  पुत्रहीन व्यक्ति के पितर पिण्डदान के भविष्यत् अभाव को सोचकर रोया करते हैं।'  पुत्र से पिण्ड और जल के तर्पण पाकर पितरों की आत्माएं सुखी व संतुष्ट रहती हैं। पिण्डदान केवल पुत्र कर सकता है, पुत्री नहीं। सभी आशीर्वादों में पुत्र-प्राप्ति सर्वाधिक लालचपूर्ण है, जिसके लिए हिंदू लालायित रहते हैं, ऐसा इसलिए है कि क्योंकि परिवार में पुत्र का जन्म पिता को मुक्ति दिलाता है।'  मनुस्मृति में पितृवंशात्मक वंशावली के द्वारा व्यक्ति के स्वर्ग-प्राप्ति से इतर भी कई प्रलोभन वर्ण्य हैं। जैसा कि उल्लेखनीय है पिता पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त करता है,  पौत्र से उन लोकों में अनंतकाल तक निवास करता है और प्रपोतों से सूर्यलोक को प्राप्त करता है। संतानोपत्ति पूर्व से ही विभिन्न संस्कारों का मूल प्रयोज्य पुत्र प्राप्ति होता है। विवाह संस्कार द्वारा गृहस्थाश्रम में प्रवेशकर पुत्र-प्राप्ति एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है,  वहां उपस्थित जन वधु को 'अष्टपुत्रा सौभाग्यवती भव'  कह कर पुत्र होने का आशीर्वाद देते है, पुत्री होने का नहीं। गर्भाधान संस्कार के मंत्र में पुत्र गर्भ की प्रार्थना है। एक अनोखा उत्सव जिसे ष्संस्कारष् की पदवी से नवाजा जाता हैए अर्थात् पुंसवन संस्कार। इस संस्कार में गर्भवती माँ जिसे तीन माह का गर्भ धारण हो चुका है,  उसके भ्रूण को लड़के में बदलने के उद्देश्य से गर्भवती स्त्री के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

हिंदू.परिवारों में पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को सोहर करते हैं। सोहर का प्रचलन संपूर्ण भोजपुरी क्षेत्र के सभी जातियों में  है। सोहर के गीत अपनी सरसता और सौन्दर्य-व्यंजना के लिए प्रसिद्ध हैं। पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत नारी जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि पुत्र-प्राप्ति है, यही उसकी सार्थकता भी मानी जाती है। पुरुष-प्रधान परिवार को उसका उत्तराधिकारी प्राप्त होने पर पूरे परिवार व निकटस्थ सम्बन्धीजनों में हर्षातिरेक फैल जाता है। सोहर गीतों में हर्ष उल्लास का वातावरण, दान, ननद का नेग आदि वर्ण्य विषय होते हैं।

शास्त्र-सम्मत गर्भाधान, पुंसवन संस्कार से इतर महिलाओं के अपनेव्रत-पूजा-अनुष्ठान हैं,  जोकि मनोकांक्षा प्राप्ति हेतु किए जाते हैं। वैदिक कर्मकाण्ड व स्मृतिकारों के संस्कारिक विधानों से अलहदा महिलाओं ने अपने अनुष्ठान रचे हैं। एकादशी व्रत,  गंगा-स्नान,  तुलसीपूजा, रविवार व्रत इत्यादि पुत्र-प्राप्ति हेतु महिलाओं द्वारा किये जाने वाले धर्म-कर्म हैं। जैसा कि एक सोहर में सूर्य की आराधना का महत्व वर्णित है। कौशल्या को कोई संतान नहीं है। उनकी उम्र बीती जा रही है और वे दुःखी हैं। अपनी सास से वे पुत्र-प्राप्ति का उपाय पूछती हैं। उनसे सूर्य भगवान की आराधना का महत्व सुनकर वह विधिपूर्वक सूर्य की आराधना करती हैंए परिणामस्वरूप उन्हें राम जैसे पुत्र की प्राप्ति होती है।  इसी प्रकार निम्नलिखित सोहर में एकादशी व्रत, सूर्य की आराधना, ब्राह्मण-भोजन, माघ-स्नान आदि का महत्व वर्णित है.

ओहि रे अजोधेया में राम जनमलें,  अजोधा आनंदले हो।
ललना, अजोधा में बाजेला बधावा,  महल उठे सोहर हो
ए बहिनी, कवन वरत तुहूँ कइलू,  त रमइया बड़ा सुन्नर हो।
कातिक कइली एकादसी, दोआदसी के पारन हो।
ललना, अगहन कइली अतवार त रामफल पइली हो।
माघहि मास नेहइली एअगिन नाहिं तपलीं हो।
बहिनी, बइसाख मास बेनिया ना डोलइली त रामफल पइली हो।
बहिनी, भूखल बाभन जेवइली,  त राम फल पइली हो।

उपरोक्त व्रत-अनुष्ठान महिलाओं के वैकल्पिक कर्मकाण्डों को रेखांकित करते हैं, जहाँ वे प्रमुख भूमिका में हैं न कि शोभा की वस्तु के मानिंद। यद्यपि इनका भी मूल प्रयोज्य पितृवंशात्मक वारिस तक ही सिमट जाता है। स्पष्टतया स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक मान्यताओं से अनुकूलित ही नहीं बल्कि उसके संवाहक के रूप में परिलक्षित होती हैं। पितृसत्तात्मक परिवार में हैसियत,  मान- सम्मानए सुख- सुविधाओं का निर्धारक स्त्री का पुत्रवती होना माना जाता है। पुत्रवती हुए बिना स्त्री दमन-यातना-उलाहना का ही शिकार मात्र नहीं होती बल्कि निरवंशिया व अपशकुनी से होते हुए डायन बनाने तक की पितृसत्तात्मक सामाजिक धारणाएं स्त्री-जीवन की नियंता बन बैठती हैं। इसलिए जिन स्त्रियों के पुत्र नहीं होते,  उनकी दशा समाज में बहुत उपेक्षित होती। वह बांझ कही जाती हैं। सोहर में 'बाँझ'  स्त्री की मनोव्यथा भी बड़े स्तर पर मुखरित है। निर्धनता और पुत्रहीनता लोक.जीवन में एक-दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। पुत्र का जन्मना या पुत्र-प्राप्ति सम्पन्नता का द्योतक माना जाता है। अथर्ववेद में निरपत्यता के बारे में कहा गया है कि यह दुःख दुश्मनों को भी न भोगना पड़े।  शास्त्रों ने नारी जीवन की मात्र तीन उपलब्धियों को ही अधिकाधिक महत्व दिया है-संतानोत्पादन,  धर्म का पालन और रतिफल देना। शतपथ ब्राह्मण संतानहीन स्त्री को महादुखों से जकड़ी हुई कहता है।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में मातृत्व के द्वारा ही स्त्री अपना अभीष्ट पद व प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकती है। वे महिलाएँ जो संतान पैदा करने में अक्षम होती हैं,  उनकी यह अक्षमता यातना और दुःख का कारण बन जाती है। पितृसत्तात्मक धार्मिक आचार-संहिताएं हर स्त्री से माँ बनने की अपेक्षा करती हैं,  साथ ही मातृत्व को औरत के जीवन की महान अनिवार्यता के तौर पर महिमामंडित करती हैं। अतः अनुकूलीकरण की प्रक्रिया द्वारा स्त्री में मातृत्व-भाव को स्थापित किया जाता है। मातृत्वविहीन स्त्री अपने जीवन को व्यर्थ व अधूरा समझने लगती है। रेडिकल नारीवाद मातृत्व के महिमामंडन, प्रजनन,  यौनता पर पुरूषों की नियंत्रणकारी भूमिका को स्त्री-अधीनस्थता का मूल कारण मानती है। वह मातृत्व के पुरुषोचित संस्थाबद्धता को स्त्री उत्पीड़न का आधार मानती है। रेडिकल नारीवाद की अग्रणी ' शुलामिथ फायरस्टोन' ऐतिहासिक संदर्भ में मातृत्व अथवा प्रजननक्षमता को ही महिलाओं की अधीनता के जड़ रूप में चिन्हित् करती हैं। गर्भधारण,  प्रजनन व पालन- पोषण की समस्याएँ महिलाओं को प्राकृतिक रूप से कमजोर समझने को विवश करती हैं। शुलामिथ लिखती है, '  इन्हीं समस्याओं के फलस्वरूप उन्हें पुरूषों पर आश्रित होना पड़ा,  जिस आश्रय-निर्भरता का लाभ लेते हुए स्त्री अधीनीकरण का सार्वभौम ढांचा निर्मित कर दिया गया है,  यद्यपि इस निर्भरता के मूल में निहित जीववैज्ञानिक कारण बीत चुके हैं।'  शुलामिथ ने नारीवाद को मातृत्व से मुक्ति की नई प्रस्थापना दी। रेडिकल नारीवाद स्त्री को आरोपित मातृत्व व यौन गुलाम के शिकार के तौर पर विश्लेषित करता है और इसे नारीवाद के आधार व प्रस्थान बिंदु के तौर पर स्थापित करने का उपक्रम करता है। मातृत्व का धर्मशास्त्रीय व सांस्कृतिक महिमामंडन,  बच्चों  के पालन-पोषण का संपूर्ण दायित्व स्त्री के कंधे पर डाला जाना स्त्री की अधीनस्थ स्थिति का मुख्य कारण रहा हैं। ऐन ओकली के अनुसार पितृसत्तात्मक समाज के प्रसार में तीन मिथक बेहद प्रभावी रूप में दिखते हैं. (1 ) सभी  स्त्रियों हेतु मातृत्व आवश्यक है। (2)  सभी स्त्रियों के लिए उनकी अपनी संतान आवश्यक है। (3 )  सभी बच्चों के लिए उनकी अपनी माँ आवश्यक हैं।


हर स्त्री हेतु मातृत्व आवश्यक है,  इस धारणा को लड़कियों के समाजीकरण और प्रचलित मनोविश्लेषक सिद्धांत द्वारा प्रदत्त किया जाता है। माता-पिता द्वारा लड़कियों को गुडि़या (खिलौना )  देकर उनमें मातृत्व-भाव उद्भुत किया जाता है। विद्यालय धर्म-संस्थाएं,  ग्रन्थ एंव जनसंचार माध्यमों द्वारा मातृत्व का महिमामंडन किया जाता है। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक व चिकित्साविदों द्वारा मातृत्व के अभाव को एबनार्मल माना जाता है। अतः इनके द्वारा मातृत्व को आरोपित कर स्त्री को 'वस्तु '  में तब्दील करने का उपक्रम किया जाता हैं। इस प्रकार स्त्री अपनी मूल्यवत्ता मातृत्व में ही देखने लगती है। पितृसत्तात्मक तंत्र द्वारा स्त्री को मातृत्व हेतु सामाजिक व सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित किया जाता है। इसी तरह दूसरा मिथ हर  स्त्री को अपने संतान की आवश्यकता होती है- मातृत्व ग्रंथि की धारणा पर केंद्रित है। जिसकी पूर्ति न होने पर स्त्री एकाकीपन व अवसाद में चली जाती है। ऐन ओकली ने एक सौ पचास प्रथमतः माँ बनी स्त्रियों पर अपने अध्ययन द्वारा यह प्रस्थापना दी कि मातृत्व की ग्रंथि भी सांस्कृतिक तौर पर निर्मित होती है। माँ की योग्यताएं भी स्वतः नहीं बल्कि अपने परिवेश से सीखी हुई अथवा समाज द्वारा सिखाई जाती हैं। इसी प्रकार वह यह निष्कर्ष देती है कि ' माँ पैदा नहीं होती बल्कि पैदा की जाती है।'

जैविक मातृत्व मिथ की तीसरी धारणा-  बच्चे को उसकी अपनी माँ ही आवश्यक है,  यह पहले से कहीं ज्यादा दमनकारी पहलू है। इस धारणा के तीन अंतर्निहित बिंदु है  (1)  बच्चे को सामाजिक माँ नहीं बल्कि जैविक माँ की जरूरत होती है। (2 )  नवजात शिशु की देखभाल पिता की अपेक्षा माँ अच्छे से कर सकती हैं।  (3 ). बच्चे को अनेक नहीं मात्र एक पालक-पोषक  ( जैविक माँ की वरीयता )  की जरूरत होती है।  ऐन ओकली दत्तक संतानों के अध्ययनों से यह सिद्ध करती हैं कि सामाजिक माँ भी जैविक माँ जितना ही प्रभावकारी होती हैं। दूसरी धारणा कि माँ पिता की अपेक्षा बेहतर देखभाल करती है,  को बेबुनियादी ठहराते हुए ऐन ओकली लिखती हैं कि ' आत्मीय,   पारस्परिक व पालन-पोषण का रिश्ता ही बच्चे की पिता अथवा माता से जरूरत का निर्धारक बनता है।'  और तीसरी धारणा कि बच्चे को एक पोषिका की जरूरत होती है। एक उदाहरण से ऐन ओकली इसे गैर जरूरी सिद्ध करती हुई सामूहिक समाजीकरण और बहुविकल्पी मातृत्व की महत्ता को रेखांकित करती हैं।
इस तरह ऐन ओकली अपने अध्ययन व तर्कों के आधार पर जैविक मातृत्व को स्त्री की प्राकृतिक आवश्यकता माने जाने को खारिज करती है। इसे वह दमनकारी उद्देश्य से रचित एक मिथ के तौर पर चिन्हित करती हैं। ऐन ओकली की भांति शुलामिथ फायरस्टोन भी जैविक मातृत्व के स्त्री  नियंत्रणकारी पक्ष पर लिखती हैं,  ' एक  पुरुष के लिए उसका संतान उसके नाम, संपत्ति,  वर्ग,  जाति,  पहचान का माध्यम होता है। इसके उलट स्त्री के लिए वहीं संतान घर के भीतर सीमित अस्तित्व का माध्यम बन जाता है।'   इस प्रकार रेडिकल नारीवाद जैविक मातृत्व के पूरे सोच को औरत के दमन का आधार मानता है। इसी सोच के कारण नारीत्व और पुरुषत्व के दो रूप निर्मित किए जाते हैं। जिनका अलग-अलग दोहरा खांका - पुरुषसम्मत व स्त्रीसम्मत गुण हैं  । यह लैंगिक आघार पर घरेलू व बाहरी क्षेत्रों का विभाजन  करके पितृसत्तात्मक व्यवस्था हेतु कारगर उपकरण की भाँति कार्य करता है। जो घर की चौहद्दी एवं घरेलू जटिल व अनार्थिक मूल्य के कार्यों हेतु औरत को पीढी दर पीढी निर्धारित व आजीवन समर्पित कर देता है।

जैविक मातृत्व के मिथक से संचालित स्त्री की अभिव्यक्ति सोहर में बहुतायत मात्रा में मौजूद है। बांझ होने पर सामाजिक उपेक्षा का दंश झेलती स्त्री की वेदना और जैविक मातृत्व की प्राप्ति हेतु विभिन्न व्रत-अनुष्ठानों की महत्ता  सोहर गीतों में वर्ण्य है। जिनका अनुपालन कर बांझ स्त्री भी गर्भवती हो जाती हैं। ये व्रत-अनुष्ठान स्त्री-निर्मित अनुष्ठानिक परंपरा को रेखांकित करते हैं, परंतु इनका प्रयोजन मातृत्व के अभिष्ट लक्ष्य की पूर्ति हेतु ही साधन-रूप भर  वर्ण्य है। सोहर में गर्भस्थ शिशु से मां का एकात्म रिश्ता, शिशु का पालन-पोषण व हंसना-खेलना इत्यादि प्रसंग प्राप्य हैं। पितृसत्तात्मक उद्देश्यों से इतर मातृत्व की स्वाभाविक व सुखद अनुभूति और शिशु से माँ का भावनात्मक रिश्ता भी सोहर गीतों में वर्ण्य है। इसी प्रसंग के क्रम में कई ऐसे भी संदर्भ हैं,  जिनसे प्रसव-पीड़ा से व्याकुल स्त्री पति को इस पीड़ा में भी साझीदार होने को कहती है और पति उसे संतान प्राप्ति हेतु इतनी तकलीफ सहने का ढांढ़स बंधाता हुए प्रसव-वेदना सहने के लिए सान्त्वना देता है। ये गीत मातृत्व के सामाजिक व सांस्कृतिक मिथकों से प्रयाण करते हुए प्रजनन प्रक्रिया के जैविकीय धरातल पर स्त्री के समझ व सजगता को निरूपित करते हैं। जो संतान व शिशु के प्रति स्त्री के एकतरफा दायित्व-बोध  को विस्तृत तौर पर इंगित करते हुए पुरुष साझेदार की भूमिका निर्वाहन को संबोधन है।


हिन्दू शास्त्रों व धर्मग्रन्थों में पुरुष को बीज और स्त्री को धरती के रूपक में व्याख्यायित किया गया है। सन्तति सृष्टि की प्रक्रिया में पुरुष श्रेष्ठता ही प्रतिपादित की गई है। प्राचीनकालीन एवं कालांतर के संस्कृत ग्रन्थों में,  जो विधि,  समाज और संस्कार से संबंधित हैं -  स्त्री के खेत में पुरुष का बीज गिरने की अवधारणा स्पष्टतया उल्लेखित है। अथर्ववेद के एक श्लोक में कहा गया है, ' वास्तव  में पुरुष में बीज का विकास होता है। उसे स्त्री के भीतर डाल दिया जाता है। वही पुत्र प्राप्ति है।'  इसी प्रकार नारद स्मृति में उल्लेखित है- 'स्त्रियाँ  सन्तानोत्पत्ति के लिए बनाई गई हैं, जो खेत है और पुरुष बीज का मालिक।'   ' बीज'  पिता के योगदान का और ' धरती '  माँ की भूमिका के प्रतीक रूप में शास्त्रों व संस्कारों में वर्ण्य है। पुरुष बीज के दृारा संतान की रचना का सत्व प्रदान करता है। इसलिए जहाँ तक कुल निर्धारण का सवाल है, बच्चे की पहचान उसके पिता द्वारा होती है। माँ की भूमिका गर्भ में आये तत्व की वृद्धि करना है। वह अपने रक्त के माध्यम से ऊष्मा और भोजन प्रदान कर उसके विकास में सहायता करती है। यह प्रक्रिया लंबी है और प्रसव के साथ समाप्त नहीं हो जाती। माँ अपने दूध से बच्चे का पोषण करती है। उसकी भूमिका पोषिका की है। विभिन्न ग्रन्थों में स्त्री पुरुष के संतान प्राप्ति की मात्र वाहिका रूप में वर्णित है। महाभारत का एक प्रसंग उल्लेखनीय है,  जिसमें राजा दुश्यंत शकुंतला का तिरस्कार करते हुए उसे अपना पुत्र ले जाने को कहते हैं। इस पर शकुंतला तर्क देती है, पत्नी के गर्भ में प्रवेश करने वाला पुरुष पुत्र के रूप में स्वयं बाहर आ जाता है। उसी समय आकाशवाणी होती है,  ' माँ तो मांस का आवरण है,  पिता से उत्पन्न होने वाला पुत्र वास्तव में स्वयं पिता का ही रूप है'  ( महाभारत के आदिपर्व के चौदहवें खंड में) ।

प्राचीन काल से भारत में मानव प्रजनन प्रक्रिया को स्त्री-खेत में पुरुष-बीज के अंकुरण के संदर्भ में समझा और अभिव्यक्त किया गया है। हिंदू वैवाहिक कर्मकांडों में बीज और खेत के प्रतीक बार-बार आते हैं। वैवाहिक कर्मकांडों के अनेक धार्मिक कृत्यों में पति ( बीज देने वाला )  के प्रति पत्नी के समर्पण,  निष्ठा,  दृढ़ता आदि मूल्यों पर जोर दिया जाता है। वैवाहिक कर्मकांड के दौरान विविध अवसरों पर उच्चारित श्लोकों में अंतर्निहित आशीर्वादोंए कामनाओं और अपेक्षाओं में पुत्र.जन्म का महत्व स्पष्ट हो जाता है। वर के द्वारा कहे जाने वाले ऐसे दो श्लोक निम्नवत् हैं ।
' इसे इच्छानुसार वैभव,  (दीर्घ आयु, समृद्धि और दस पुत्रों का शुभ और गौरवपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। हे इन्द्र,  हे सवितृ,  वह गौरव, जो इस पुत्रहीनता की स्थिति समाप्त करे,  शीघ्र इसे दो। ( वैखानस गृह्यसूत्र,  3-4)
' तुम्हारे  गर्भ में पुरुष भ्रूण उसी तरह प्रवेश करे जैसे तरकश में तीर,  एक पुत्र दस माह बाद जन्म ले और इस तरह अनेक पुरुष उत्पन्न हों।'  ( सांख्यायन गृह्यसूत्र, 1-19-6) 

खेत-बीज रूपक एवं पुत्र-प्राप्ति कामना को वैवाहिक अनुष्ठान तथा अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर उच्चारित मंत्रों-पाठों में सुना जा सकता है। समाज में संतान को जन्मदात्री माँ के नाम से न जाकरए पिता के नाम से जाना जाता है। इस परंपरा से दुःखी स्त्री कहती है:

पीर हमनें खायी 
सइयाँ के लाल कैसे कहाई
आओ सास रानी बैठो पलंग चढ़
हमरा झगड़ा छुड़ाओ सइयाँ के लाल
कितनो बहू लड़बू कितनो झगड़बू
बेटवा बापे के कहाई
तोहार लाल कैसे कहाई।

प्रचलित सामाजिक संरचना की यह अनिवार्य परिणति है, जहाँ गर्भाधान में पुरुष के नाम का महत्व होता है। गर्भाधान संस्कार के समय होने वाले अनुष्ठानों व कर्मकाण्डों में पुरुष का शिशु पर अधिकार स्पष्टतया ध्वनित होता है। आदिम समाज में गर्भाधान में पुरुष की विशिष्ट भूमिका नहीं मानी जाती थी। पितृसत्तात्मक संस्थाओं के विकास के साथ पुरुष अपनी संतति पर  अधिकार का दावा करने लगा और स्त्री की भूमिका मात्र पालिका-पोषिका तक सीमित कर दी गई । अपनी विशिष्ट जैविक स्थिति के कारण पुरुष गर्भ की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। शुलामिथ फायरस्टोन जैसे रेडिकल नारीवादी गर्भधारण को जंगली प्रवृत्ति कहते हुए शुक्राणु व डिम्ब से जन्में शिशु हेतु अंधप्रेम को सामाजिक न्याय की दृष्टि से बाधक मानती हैं।  इसी प्रकार गर्भाधान को नाटक करार देते हुए सिमोन द बोउवार लिखती हैं , ' गर्भाधान एक प्रकार का नाटक है,  जो स्त्री के शरीर के भीतर ही खेला जाता है। स्त्री को एक साथ सम्पन्नता और आहत का अनुभव होता है। भ्रूण उसके शरीर का एक अंश होता है। भ्रूण एक परजीवी जीव है, जो स्त्री से अपना पोषण प्राप्त करता है। वह संतान को अपने वश में रखती है और स्वयं संतान द्वारा अधिकृत कर ली जाती है। संतान द्वारा भविष्य में अपने प्रतिनिधित्व की आशा से गर्भधारण करके स्त्री अपनी सांसारिक महानता का अनुभव करती है। महानता का यह अनुभव ही स्त्री का विनाश कर देता है। उसे नगण्यता का अनुभव होता है। अपने गर्भ से बाहर आकर पृथक अस्तित्व ग्रहण करने वाले जीव पर गर्व करने के बावजूद स्त्री अनुभव करती है कि कोई उसे उसके स्थान से भगा रहा है। ऐसा लगता है कि वह अदृश्य शक्तियों के हाथों का खिलौना हो गई है। यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि ठीक उसी समय जबकि गर्भवती स्त्री सर्वोपरि हो उठती हैए वह अपने को विश्वव्यापी रूप में देखती है। वह अपने लिए अपना अस्तित्व नहीं रखती।ष्  अतः रेडिकल नारीवाद स्त्री उत्पीड़न के मूल में उसकी प्रजननकारी भूमिका को देखता व समझता रहा हैं। शुलामिथ फायरस्टोन स्त्री उत्पीड़नकारी व्यवस्था के खात्मे हेतु प्रजनन को स्त्री द्वारा त्याग करने का प्रस्ताव रखती है। उनका कहना है कि तकनीकी क्रांति से ग्लास के डिबों में गर्भधारण व गर्भावस्था की पूरी प्रक्रिया की जा सकती है। तकनीकी प्रणाली से जैविक मातृत्व की पितृसत्तात्मक संरचना व मिथक को प्रायः समाप्त किया जा सकता है।  यद्यपि बाद की रेडिकल नारीवादी इन अतिरेकों से प्रयाण करते हुए इस प्रस्थापना बिंदु पर पहुँची कि स्त्री के गर्भधारणा की क्षमता उसके विकास में बाधक नहींए अपितु प्रजनन व शिशु.संरक्षण पर पुरूषों का सीधा नियंत्रण बाधक है। इसी आधार पर एजिजा.एल.हिबरी शुलामिथ फायरस्टोन की आलोचना करते हुए लिखती हैं कि. ष्महिलाओं के अपने प्रजननकारी भूमिका को त्याज्य कर देने परए वह एक मुख्य तत्व छोड़ देगीए जिसके लिए पुरुष उन पर निर्भर है।ष्  स्त्री की शारीरिक रचना जीवन के नैरन्तर्य को बनाए रखने की दृष्टि से हुई हैए अतः पुरुष उन पर पूर्णतयाः निर्भर है। अतः इसे कमजोरी के तौर पर नहीं अपितु ताकत व हथियार के रूप में स्त्रियों द्वारा उपयोग करने की जरूरत है। स्त्रियों के गर्भधारणए प्रजनन व मातृत्वए शिशु के पालन.पोषण के संदर्भ में अपने निर्णय व अधिकार होने चाहिए न कि पुरुष तय करें कि उसे कब और कितने बच्चे चाहिएए उनकी परवरिश कैसे व किस तरह होघ् यह समूचा क्षेत्र महिलाओं के निर्णय व स्वेच्छा पर आधारित होना चाहिए। पुरुष.प्रधान व्यवस्था अपने नियंत्रणकारी निर्देशों के बल पर मातृत्व को एक अजनबीपन अनुभव में तब्दील कर देता है। समाजवादी नारीवादी एलीसन जैगर समकालीन समय में महिलाओं के अलगावध्पार्थक्यकारी स्थिति को विश्लेषित करते हुए लिखती हैं कि 'महिलाएं  पुरुष के नियंत्रणकारी आदेशों व निर्देशों के कारण जहाँ पुनरूत्पादन श्रम से पार्थक्य स्थिति में रहीं है, वहीं नई पुनरूत्पादन तकनीकी भी प्रजनन.प्रक्रिया से उनका पार्थक्य सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर है। शुलमिथ फायरस्टोन  के अतिरेकपूर्ण मंतव्य अंततः जैविक निर्धारणवाद विचार प्रणाली के ही शिकार हो जाते हैं। जैविक निर्धारणवाद के आधार पर ही पुरुष प्रधान व्यवस्था अपने वर्चस्व को प्राकृतिक व स्वाभाविक सिद्ध करता रहा है। जैविक मातृत्व के अंतनिहित पुरुष वर्चस्वशाली उद्देश्यों से विलग होकर इसे स्त्री द्वारा अलग स्वरुप से गढा जाना चाहिए। पुनरूत्पादन एंव संतति के पालन-पोषण पर स्त्री का अधिकार व उसके रीति.नियम होने चाहिएए जो किसी भी पितृसत्तात्मक सामाजिक प्रभावों से मुक्त हो। ऐड्रिन रिच जैविक मातृत्व के पितृप्रधान संस्थानिक स्वरूप की आलोचना करती है। वह गर्भावस्था व संतति पालन.पोषण के आनुभविक आधार पर जैविक मातृत्व को प्रतिष्ठित करती हैंए बशर्ते स्त्री को पुनरूत्पादन व संतति पालन -पर स्वयं का अधिकार हासिल हो। जिससे वह बच्चों का नारीवादी मूल्यों के आधार पर पालन-पोषण कर सकें।
समाज में स्त्री का पुत्रवती होना गर्व का विषय समझा जाता हैं। पुत्र.जन्म पर परिवार में हर्षोल्लास का वातावरण होता है और सोहर गाये जाते हैं। पुत्र ही पितृवंशात्मक उत्तराधिकारी होता है। निजी संपत्ति का वारिस होने के कारण उसकी निर्विवाद महत्ता है। जो पुत्री की अपेक्षा उसकी श्रेष्ठ स्थिति को दर्शाता है। वहीं सांस्कृतिक व धार्मिक मान्यता के अनुसार पुत्र ही मां.बाप के श्राद्ध.तर्पण का अधिकारी होता हैं। पुत्र द्वारा श्राद्ध.तर्पण करने पर ही मां.बाप की आत्माएं मुक्त होती हैं। पितरों की आत्माएं पुत्रों से ही पिण्ड व जल ग्रहण कर सुखी और संतुष्ट होती हैं। अतः पुत्र की प्रबल.कामना सोहर गीतों में वर्ण्य है। जबकि पुत्री.जन्म पर दुःख व विशाद का वातावरण होने के कारण सोहर नहीं गाया जाता। पुत्री जन्म पर प्रसूता की उपेक्षित स्थिति निम्नवत् वर्ण्य है:


जइसन दहे में के पुरइनि दहे बिचे काँपेले रे।
ए ललना ओइसन कॉपेले हमरो हरि जीए घिया कारे जनमु रे।
कुस ओढ़न कुस डासनए बन फल भोजन रे।
ए ललना खुखुड़ी के जरेला पसगिया निनरियौ ना आवेला रे।। 
( जिस प्रकार तालाब के बीच में स्थित पुरैन का पत्ता कांपता रहता है,  उसी प्रकार से मेरा पति पुत्री का जन्म होने से कांपता रहता है अर्थात् डरता है। दुर्भाग्य से यदि लड़की पैदा हो जाती है तो वह कुश ओढ़ने और कुश ही बिछाने को देता है। वन के फूल भोजन करने को देता है। बुरी लकड़ी जलाने के लिए देता है, जिससे मुझे नींद नहीं आती। )
लोक में ऐसी मान्यता है कि लड़की के पैदा होते ही पृथ्वी तीन हाथ नीचे दब जाती है। जिस स्त्री को लड़की पैदा होती है,  वह प्रसव-पूर्व के दैवीय '  पदवी से पदच्युत करके उपेक्षित व बहिष्कृत कोटि में खड़ी कर दी जाती है। उसको वस्त्र, भोजन भी बदतर दिया जाता है। सास-ससुर, ननद व पति द्वारा उपेक्षापूर्ण व्यवहार व यातना दी जाती है। कन्या जन्म पर ससुराल वालों का कठोर व्यवहार निम्नवत् गीत में उदाहरणार्थ प्रस्तुत है:
बिटिया के भइल ससुरा सुनले।।
हथवन से छूट गइल लठीया।
बिटिया के भइल जेठवा सुनले।।
हथवन से छूट गइल घडि़या।
आज बहूरानी के हो गइल बिटिया।।

देश के कई क्षेत्रों में पुत्री के जन्म लेते ही मार डालने की परंपरा रही है। कन्या शिशु हत्या की यह परंपरा उच्च वर्णों,  खासकर क्षत्रियों में प्रचलित रही है। जिसका जिक्र ललिता पाणिग्रही ने अपनी पुस्तक '  ब्रिटिश सोशल पॉलिसी एंड फीमेल इनफैटिसाइड इन इण्डिया. में विस्तार से किया है। आधुनिकयुगीन अल्ट्रासाउण्ड परीक्षणों के अभाव में पंडितों व ज्योतिषियों की बड़ी पूछ होती थी, जो पुत्र या पुत्री जन्म की भविष्यवाणियां किया करते थे। पुत्री-जन्म से व्यथित स्त्री एक सोहर में कहती है कि ' यदि  मुझे पूर्व में पता होता तो मैं झरार काली मिर्च खाकर गर्भावस्था में तुम्हारा जीवन खत्म कर देती।'   भ्रूण लिंग-परीक्षण कानूनी तौर पर प्रतिबंधित होने के बावजूद हालिया दशक में कन्या भ्रूण हत्या की कुप्रथा शहर व गांव में तेजी से विस्तारित हुई है। उच्चवर्ग के साथ-साथ निम्न मध्यवर्ग भी इस जघन्य अपराधिक कृत्य में शरीक हो चुका हैं। कन्या को परिवार हेतु एक बड़ा आर्थिक बोझ समझा जाता है। इसी आर्थिक बोझ,  यानि दहेज से मुक्ति , का रास्ता कन्या भ्रूण हत्या , शिशु  हत्या माना जाता रहा है। उदाहरणार्थ. एक सोहर का हिन्दी भावार्थ हैं. ' ऐ बेटी जिस दिन से तुम्हारा जन्म हुआ है उस दिन से मुझे भादव की रात ही दिखाई पड़ती है। सास व ननद सूतिका गृह में दीपक भी नहीं जलातीं और पति भी कुबोल बोलता है। जब तुम्हारा विवाह होगा, तुम्हारी माँग में सिन्दूर पड़ेगा और दूल्हा नव लाख रूपये दहेज में मांगेगा,  तो मैं (गरीब होने के कारण) घर के सारे बर्तन उसे देने के लिए आंगन में पटक दूंगी। शत्रु को भी कभी लड़की न पैदा हो। यदि मैं जानती कि लड़की पैदा होगी तो मैं काली-मिर्च पीसकर पी जाती, उस मिर्च की गरमी से तुम मर जाती और मेरा पुत्री-जन्म से उत्पन्न बड़ा दुःख छूट जाता।'

पितृसत्तात्मक व्यवस्था में प्रचलित दहेज की लैंगिक विभेदी परिपाटी के कारण पुत्री परिवार में बोझ सदृश्य हो जाती है। पुत्र जन्म पर जहाँ परिवार में हर्षोल्लास व पुत्रवती की देखभाल व पूछ होती हैं। वहीं पुत्री का जन्म परिवार की चिन्ता व विषाद का कारण बन जाता हैं और पुत्रवती स्वयं को संकटग्रस्त समझने लगती है। दहेज प्रथा के कारण पुत्री जन्म अभिशाप का रूप घारण कर चुका है। नारी जीवन की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि मातृत्व को लालायित स्त्री पुत्रीजन्म को ही स्वयं एवं परिवार पर सबसे बड़ा अभिशाप व आपदा मान बैठती 

Tuesday, 17 December 2013

सवाल आधी आबादी की सुरक्षा का....

कुछ समय पहले की ही बात है. एक महिला किसी से मेरा पता पूछते पूछते मेरे घर पहुँचीं. एक लम्बी यात्रा के बाद मैं उसी दिन लौटी थी. मुझे लगा कि संस्था से किसी प्रकार की मदद की ज़रूरत होगी. लेकिन जहाँ उन महिला ने अपने जीवन के पन्ने उलटे पलटने शुरू किये, उनकी आपबीती ने  मेरे अन्दर सिहरन पैदा कर दी. 25 सालों से अपने पति द्वारा सताई जा रही ये महिला अब मदद इसलिए ढूंढ  रही थी क्योंकि उसके बर्दाश्त करने की सीमा खत्म हो चुकी थी.  खुद शारीरिक हिंसा की शिकार इस महिला ने बताया कि इसका पति अपनी ही दोनों बेटियों का यौन उत्पीडन कर चुका है. इसमें से छोटी बेटी तो उस वक़्त कुछ महीनो की ही थी. दहशत में आई बेटी एक बार चीखी और बिस्तर से गिर गयी जिससे आज भी वो मानसिक रूप से असामान्य है. बड़ी बेटी के मन में डर इस क़दर बैठा कि आज भी वो उससे जूझ रही है. पति माँ और दोनों बेटियों को छोड़कर कहीं और रहता है और उन्हें खर्च भी नहीं देता है. कहीं से पता चलने पर एक संस्था की मदद से कोर्ट तक पहुंची तो लेकिन एक लम्बे अरसे के बाद भी अभी तक कुछ हाथ नहीं लगा. अब यहाँ ये बताना ज़रूरी हो जाता है कि ये किसी गरीब, ग्रामीण घर की कहानी नहीं है. पति एक बैंक में ऊंचे पद पर कार्यरत है और वो महिला खुद जादवपुर यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञान में ऑनर्स है. अब एक दूसरी संस्था की मदद से उनकी छोटी बेटी को ख़ास बच्चों के स्कूल में निः शुल्क दाखिला मिल गया है और दबाव बनाने पर  केस की सुनवाई में भी तेज़ी आई है. यह सच है कि यह घटना बहुत आम घटना नहीं है लेकिन ऐसी घटनाएं होती हैं. और ये उस मुद्दे की बस बानगी है जिस पर  आगे इस लेख में बात होगी.
  
पिछले कुछ समय में सोया हुआ पूरा मुल्क अचानक जाग उठा. बड़ी तादाद में लोग सड़कों पर उतर आये. हर तरह का मीडिया सक्रिय हो गया और काफी लम्बे से सोया हुआ प्रशासन, राजनीतिक दल, पुलिसिया तंत्र और और कुछ हद तक हमारी न्यायप्रणाली भी इस रोष के चलते जाग उठी. मुद्दा कोई नया नहीं और न ही इसके लिए किसी भी समाज या संस्था की उदासीनता नयी है. महिला सुरक्षा, महिलाओं के प्रति बढती हिंसा, सामाजिक गैरबराबरी, हमारे समाज के हर स्तर पर जमी हुई पित्रसत्ता और इन मुद्दों पर चल रहे आन्दोलन भी कोई नए नहीं हैं.  लेकिन हाँ इन सबको जिस घटना ने हवा दी वो बेहद क्रूर, बर्बर, अमानवीय और जघन्य अपराध थी. इस देश की राजधानी व यहाँ के दिल कहे जाने वाले शहर दिल्ली के सभ्रांत इलाके में चलती बस में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म ने इस देश में महिलाओं की स्थिति की पोल पट्टी खोल दी. राजधानी दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हो रहे सारे दावे हवा हो गए. युवा, नारीवादी संगठन, बुज़ुर्ग सड़कों पर उतर आये, ज़ाहिर बात है ये स्थिति  उनके लिए स्वीकार्य नहीं थी. सरकार ने भरोसा दिलाया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा लेकिन साथ ही शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पानी की तेज़ बौछारें हुई, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज किया गया और प्रदर्शन रोकने के लिए धारा 144 लगाने के अलावा 9 मेट्रो स्टशन बंद कर दिए गए.  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता था. लेकिन मुद्दा इससे कहीं ज्यादा बड़ा और उसकी जडें कहीं ज्यादा गहरी हैं. 

शायद कुछ सवाल खुद से पूछें जाएँ तो थोडा आसानी हो. क्या बलात्कार की ये एकमात्र घटना है या देश की राजधानी में यह पहली बार हुआ है ?? क्या महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा, छेड़छाड़ से लेकर यौन शोषण या दहेज़ हत्या कोई नयी बात है ?? क्या महिलाएं इस देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी संस्था में, घर से लेकर सड़क, दफ्तर तक, कहीं भी खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती हैं ?? क्या महिलाओं को अपने जीवन से जुड़े फैसले खुद लेने का अधिकार है ?? क्या महिलाएं पुलिस प्रशासन या न्यायपालिका पर पूरा भरोसा कर सकती हैं?? क्या इस देश में बच्चियां सुरक्षित हैं ?? क्या हमारे राजनीतिक दल, हमारे नेता, हमारे जनप्रतिनिधि, हमारी सरकार  या हमारा राज्य महिलाओं से जुडी समस्याओं और मुद्दों को लेकर संवेदनशील है ??  क्या यह सब मिलकर अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं ?? और क्या हमारे देश में कानूनों की कोई कमी है ?? 


कुछ आंकड़े शायद स्थिति को थोडा स्पष्ट करें. 2010 में जागोरी संस्था द्वारा आई रिपोर्ट ने बताया कि अकेले दिल्ली शहर में 44% महिलाएं मौखिक उत्पीडन का शिकार हुई हैं जिसमें छीटाकशी और सीटी बजाकर छेड़ना शामिल है. 13% महिलाओं ने शारीरिक उत्पीडन का सामना किया है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों में 2010 की तुलना में 2011 में 7.1% की बढ़ोत्तरी हुई है और 2007 से 2011 तक इनमें 23.4% की वृद्धि हुई है. भारतीय दंड संहिता के तहत आने वाले महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध पिछले 5 सालों में 8.8% से बढ़कर 2011 में 9.4% तक पहुँच गए हैं. 2011 में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराधों की संख्या 228650 थी जिसमे 24206 बलात्कार, 8618 दहेज़ हत्याएं, 35565 अपहरण , 42968 छेडछाड, 8570 यौनिक हिंसा, 99135 पति या अन्य रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता, 80 लड़कियों के व्यापार की घटनाएं शामिल हैं. इन अपराधों के आधार पर सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल में हुई हैं व उत्तर प्रदेश इस सूची में 22639 घटनाओं (जिसमें 2042 बलात्कार शामिल हैं) के साथ तीसरे स्थान पर है. अपहरण व दहेज़ हत्या की घटनाओं के मामले में उत्तर प्रदेश इस सूची में 7525 अपहरणों और 2322 दहेज़ हत्याओं के साथ सबसे ऊपर है. यहाँ पर ये कहना बेहद ज़रूरी है कि यह सिर्फ वो संख्या है जो कि दर्ज होती है. अधिकांशत: तो तो कई कारण पीड़ित महिलाओं की हिम्मत तोड़ने का काम करते हैं जैसे पारिवारिक दबाव, किसी भी प्रकार का सहारा न होना, कभी डर तो कभी शर्म, सामाजिक दबाव, पुलिस का असंवेदनशील रवैया या न्यायपालिका की कमरतोड़ लम्बी प्रक्रिया. आज भी हमारे समाज में दोयम दर्जे पर जी रही औरत आमतौर पर पुलिस या कोर्ट का दरवाज़ा तब खटखटाती है जब उसके बाकी सारे विकल्प बंद हो चुके होते हैं क्योंकि इन जगहों पर पहुँचने  को भी परिवार की इज्ज़त से जोड़कर देखा जाता है जिसकी ज़िम्मेदारी उसी औरत के कन्धों पर होती है. इज्ज़त और शान के नाम पर होने वाली हत्याएं हम रोज़ ही अखबारों में पढ़ते हैं. दिल्ली बलात्कार कांड के बाद न्यूज़ चैनलों पर चल रही चर्चाओं से पता चला कि बलात्कार के लगभग 1 लाख मुक़दमे हमारी न्यायपालिका में लंबित पड़े हैं, उसी के कुछ दिन बाद हिंदुस्तान अखबार के माध्यम से पता चला कि कुछ पीड़ित 36, 37 सालों से उत्तर प्रदेश में न्याय की बाट जोत रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार ही बलात्कार की घटनाओं में सजा की दर मात्र 26.4 है.       

तो यह तो साफ़ है कि देशभर में जो रोष फैला वो एक बलात्कार की वजह से नहीं है. यह हर उस बच्ची, युवती या महिला की बात है जो हर 22वे मिनट देश के किसी कोने में बलात्कार का शिकार होती है. यह सिर्फ राजधानी दिल्ली की नहीं बल्कि बुंदेलखंड, झारखंड, गुवाहाटी और इस मुल्क के दूर दराज़ में ऐसी हिंसा का शिकार हो रही हर महिला के बारे में है. यह दिल्ली के सिर्फ उन शोहदों के बारे में न होकर अपने रुतबे, कद, पैसे, जाति, पदवी के नशे में चूर नेताओं, रईसजादों, पुलिसवालों, नौकरशाहों या सेना के जवानों के बारे में भी है.  लेकिन यहाँ यह कहना भी ज़रूरी है कि बात बलात्कार के अलावा होने वाली घटनाओं की भी है. बात उस अजन्मी अबोध बच्ची की भी है जिसे सिर्फ इसलिए मार दिया जाता है या कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है क्योंकि वो एक लड़की है. बात पैदा होने के बाद हर दिन बढती उस लड़की की भी है जो हर रोज़ भेदभाव को एक नए रूप में देखती और महसूस करती है और ऐसा करते करते वो कब इस दोयम दर्जे को खुद में आत्मसात कर लेती है उसे पता ही नहीं चलता. उसके खेल, खिलौने, कपडे, काम, अगर कर सकी तो पढाई और थोडा और आगे बढ़ सकी तो उसका करियर वरना शादी  कुछ भी तय करने की आजादी या हक आज भी उसके पास नहीं है. बड़े होने की प्रक्रिया में कब उसे बचपन के खेल छोड़कर खुद को अपने ही परिवार के सदस्यों की नज़रों से बचाकर रखना होता है, जिसमें ज़्यादातर वो सफल नहीं हो पाती है, यह भी ज़िम्मेदारी उसी की होती है. 

अगर स्कूल जा पाती  है तो वहां एक ओर पढने की ललक या लालच वहीँ दूसरी ओर अपने ही सहपाठियों, अध्यापकों से खतरा, काम के लिए बाहर निकले तो सड़क पर चलते लोगों, यातायात के साधनों पर सवार लोगों की बेचैन कर देने वाली नज़रों और फब्तियों को झेले, कार्यस्थल में यौन शोषण से खुद को बचाए, शादी करे तो उस घर में कभी शारीरिक तो कभी मानसिक हिंसा का शिकार हो.यह  सच है कि शायद हर लड़की के साथ ये स्थिति न आई हो लेकिन इनमे से कोई भी न आई हों ये संभव नहीं.  तस्वीर बदली है लेकिन ये भी सच है कि अगर एक बड़े फलक पर देखें  तो तस्वीर अब भी बड़ी कुरूप है.  एक लड़की के जीवन में उसे बचपन से ये बता देना कि शर्म ही उसका गहना है, उसे धीरे बोलना चाहिए, धीरे हँसना चाहिए, कैसे चलना चाहिए और उसके लिए उसका शरीर ही उसकी और न सिर्फ उसकी बल्कि पूरे घर भर की इज्ज़त है, ऐसा करके उसकी अस्मिता को महज़ उसके शरीर के दायरे में समेट देना कहाँ तक सही है यह बड़ा सवाल है.

रास्ते चलते छेड़खानी करते, सीटी बजाते लड़कों के खिलाफ जब लड़की खुलकर आवाज़ उठाती है, उसी जगह उसका सामना करती है तो अच्छा लगता है लेकिन ऐसा करने की हिम्मत कम ही लड़कियां जुटा पाती हैं और अगर बात बढ़ जाती है तो अक्सर उन्हें ही चुप हो जाने की हिदायत या सलाह दी जाती है. ऐसी कुछ हिम्मती लड़कियों को आगे अलग किस्म की मुश्किलें भी झेलनी पड़ जाती हैं. जैसे राह चलते उनके चेहरे पर तेजाब फेंक देना, अपहरण करके बलात्कार करना. लखनऊ की ही एक सामाजिक संस्था, साझी दुनिया के सार्वजनिक यातायात के साधनों का इस्तेमाल कर रही महिलाओं के साथ किये गए एक ताज़ा सर्वेक्षण के नतीजे कहते हैं कि 93.72% महिलाओं के साथ छेड़खानी होती है. 62.99% महिलाओं का मानना है की ड्राइवर और उसके साथी भी छेड़खानी करते हैं. और 68.40% महिलाओं का कहना था कि ऐसी स्थिति में आस पास के लोग कोई मदद नहीं करते. तो असल में समस्या कहाँ है, दोषी कौन है और इस स्थिति में क्या किया जा सकता है. 

शायद ज़्यादातर लोगों के लिए यह बात पुरानी हो चुकी हो लेकिन हमारा सामाजिक ढांचा जिसका कई रुढ़िवादी लोग दंभ भरते हैं इसका मुख्य कारण है.  जो हमारे समाज की हर संस्था, वो चाहे परिवार हो, शिक्षा हो, विवाह हो या और भी कोई ; हर जगह एक गहरी पैठ बना चुका है. साथ ही ज़िम्मेदार है हमारी कथित रूप से महान संस्कृति जो कभी भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दे पाई. एक लड़की के जीवन में उसको व उसकी पहचान को एक पुरुष पर ही आश्रित दिखाया गया है, पहले पिता, फिर पति और फिर बेटा. कई लोग इस बात से कतई सहमत नहीं होंगे और मुझे कई वेद पुराणों, धार्मिक ग्रंथों  व मनुस्मृति का हवाला भी देंगे. लेकिन मैं फिर भी यह बात जोर देकर कहूँगी कि ये सभी धार्मिक ग्रन्थ कहीं न कहीं औरत को दोयम दर्जे में धकेलने का काम ही करते हैं. संस्कृति को यह कहकर महान बताने कि आवश्यकता नहीं कि यहाँ औरत देवी होती है क्योंकि आये दिन ऐसी देवियाँ इस देश में या तो कोख में मार दी जाती हैं, राह चलते सड़क से उठाकर किसी आदमी की हैवानियत का शिकार होती है, दहेज़ के लिए जला दी जाती है या ज़ुल्म न सहने की सूरत में घर से निकाल दी जाती है. देवियों की ऐसी कल्पना करना मेरे लिए तो मुश्किल है. मैं और मेरे जैसी तमाम लड़कियां एक आम इंसान की ज़िन्दगी जीना चाहती हैं और अपने हक का इस्तेमाल करना चाहती हैं. 

यह हमारे समाज के हर हिस्से में घर कर चुकी पित्र्सत्ता का ही परिणाम है कि लड़की के साथ कुछ गलत होने की सूरत में हम उसे चुप रहना सिखाते हैं. यह बताने कि ज़रुरत नहीं कि किस प्रकार हमारे समाज में बलात्कार पीडिता और उसके परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है जबकि दोषी शान के साथ घूमता है. और ऐसी स्थितियां होने पर हर तरह की सलाह लड़की को ही दी जाती है कि वो कैसे खुद को बचाए. मैंने आजतक ऐसी चर्चाएं कहीं भी होते नहीं देखी जहाँ लड़कों को ये बताया जाये कि उन्हें महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए या उन्हें हिंसा नहीं करनी चाहिए. यह सोच किसी एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ समय में पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, दिल्ली में बैठे प्रबुद्धजनों की लड़कियों के लिए हिदायत भरी टिप्पणियां हमे शायद याद होंगी. साथ ही शायद यह भी याद होगा कि महान संस्कृति की मशाल लेकर चलने वाले बड़े धार्मिक संगठनों के ठेकेदारों से लेकर आध्यात्मिक गुरुओं तक के इस विषय पर क्या विचार थे. 

यहाँ एक बार फिर मैं सरकारी आंकड़ों का ही हवाला दूंगी और यह खासतौर पर उनके लिए है जिन्हें लगता है कि परिवार में ऐसी घटनाएं होती नहीं हैं और ऐसी घटनाओं के लिए लड़कियां छोटे कपडे पहन कर खुद ही घटना को निमंत्रण देती हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार इन्सेस्ट रेप  की कुल 267 घटनाएं दर्ज हुई हैं जिनमें 20 घटनाओं में पीडिता की उम्र 10 वर्ष तक और 48 घटनाओं में 10-14 वर्ष थी. साथ ही बलात्कार की अन्य घटनाओं में 855 पीड़ितों की उम्र 10 वर्ष तक व 1659 पीड़ितों की उम्र 10-14 वर्ष के बीच थी.  एक अन्य रिपोर्ट का उल्लेख भी यहाँ करना चाहूंगी. वात्सल्य संस्था द्वारा उत्तर प्रदेश में एक छोटे स्तर पर किये गए एक ताज़ा अध्ययन में ये पाया गया कि 5-10 वर्ष की उम्र की 33.2% बच्चियां किसी न किसी प्रकार की यौनिक हिंसा का शिकार हुई हैं. इस उम्र में एक बच्ची क्या निमंत्रण दे सकती है इसका विचार ज़रा खुद करें. 

कुछ लोगों का यह भी कहना है की लड़कियां देर रात घर से बाहर न निकलें, दिल्ली के स्कूलों में तो नसीहत भी होर्डिंगों में लगा दी गयी की लडकियां स्कूल के बाद सीधे घर जाएँ. ऐसे में बस कुछ  सवाल यह कि राज्य की क्या ज़िम्मेदारी है?? क्या एक लड़की या किसी अन्य  व्यक्ति को भी सुरक्षित माहौल देना राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं?? यह कौन सुनिश्चित  करेगा कि मैं अपने घर से किसी भी वक़्त बेख़ौफ़ होकर निकल सकूँ और सुरक्षित वापस भी पहुँच सकूँ. 

ऐसी विषम परिस्थिति में जन आन्दोलन एक हद तक बदलाव तो ला सकता है लेकिन ज़रूरत और बहुत ज्यादा होने की है. ज़रूरत बदलाव को खुद से शुरू करने की है. इस समाज के हर स्तर पर, हर संस्था को संवेदनशील होने की ज़रूरत है. हमारे व्यवहार से पाठ्यपुस्तकों तक, हमारी भाषा से कार्यशैली तक, नेताओं के वादों से नियम बनाने तक, हर जगह बैठी गैरबराबरी को बाहर करना बहुत ज़रूरी है. और इस सबके लिए ज़रूरी है एक मज़बूत इच्छाशक्ति का होना. पित्र्सत्ता या मौजूदा ढांचा ऐसा कभी नहीं चाहेगा लेकिन अब राज्य, न्यायपालिका, प्रशासन तंत्र के साथ सरकार को भी सिर्फ कहने के लिए नहीं बल्कि वास्तविकता में संवेदनशील होना ही होगा. इस तंत्र को अब ये सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएँगी. उन्हें ये भी सुनिश्चित करना होगा कि महिलाएं अपनी बात उन तक बेख़ौफ़ होकर पहुंचा सकें और उनकी शिकायतों का निस्तारण भी जल्दी हो. जिस पूर्ण असहिष्णुता (zero tolerance) की बात को सिर्फ कागजों तक या अपने भाषणों तक सीमित करके रखा गया है उस पर समाज के हर दर्जे में अमल किया जाए.  राजनीतिक  पार्टियों की इसपर मज़बूत इच्छाशक्ति हो और सबसे ज़रूरी बात, इसे महज़ महिलाओं का मुद्दा न समझकर मानवता का मुद्दा समझा जाए. पिछले 7 वर्षों से अगर महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से संरक्षण पर बने बिल को मंजूरी नहीं मिली है तो यह हमारी सरकार और इस गंभीर मुद्दे पर अन्य दलों की उदासीनता को ही दिखाता है. आज यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि हम अपनी बेटियों को सहना नहीं बल्कि कहना सिखाएं. हम उन्हें वो माहौल दें जिसमें वे खुलकर अपनी परेशानी हमसे साझा कर सकें बिना इस डर के कि इस घटना का ज़िम्मेदार उन्हें ही ठहराया जायेगा या उन पर तमाम तरह की पाबंदियां लगा दी जायेंगी. आज यह ज़रूरत निश्चित तौर पर है कि हमारे देश में सख्त कानून हों लेकिंग उससे भी बड़ी ज़रूरत है कि उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित हो क्योंकि कानूनों की कमी देश में आज भी नहीं है.   
और इन सब के साथ एक बड़ी ज़रूरत है दायरे तय करने की खासतौर पर हमारे मीडिया को, हमारी फिल्मों, टीवी सीरियलों को और हम सबको भी. कहा जाता है कि अब स्थितियां बदलीं हैं, हाँ बदली तो निश्चित तौर पर हैं लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि पित्रसत्ता अब और ज्यादा भयावह रूप से गुप चुप तरीके से काम कर रही है और इससे मजबूती देने का काम बाज़ार ने बखूबी किया है. शीला, मुन्नी, फेविकोल जैसे गानों की भूमिका  औरत को सिर्फ एक  उपभोग की वस्तु दिखाने भर की रह गयी है. साथ ही टीवी सीरियलों से लेकर विज्ञापनों ने जहाँ अपने उत्पादों के लिए खरीदार खड़े कर लिए हैं वहीँ इन्होने भी औरत को उपभोग की वस्तु बनाकर ही प्रस्तुत किया है. सीरियलों ने करवाचौथ, छठ, तीज, अक्षय तृतीया जैसे त्योहारों को क्षेत्र के दायरे से बाहर निकाल दिया है, और हर त्यौहार का अपना मज़बूत बाज़ार है. साथ ही इन कार्यक्रमों ने 'अच्छी' और 'बुरी' औरतों की जो अवास्तविक छवि बनायीं हैं वो कहीं न कहीं पित्रसत्ता और रूढ़ीवाद को ही मज़बूत करती हैं. आज की नायिकाओं और फिल्मकारों  को यह समझने की ज़रूरत है कि समाज में अपने स्तर पर ज़िम्मेदारी वे भी निभा सकते हैं. एक बड़ी तादाद में लोग उनका काम देखते, सुनते और काफी हद तक उससे प्रभावित होते हैं ऐसे में इन आइटम गानों की प्रासंगिकता समझ से परे है. शायद मुनाफा कमाने के अलावा थोडा कुछ और भी सोचा जा सकता है. हमारे पास अश्लील और घटिया गानों से प्रसिद्धि बटोर रहे हनी सिंह  के क्या और कोई विकल्प नहीं हैं. उसको पसंद करने वाले लोग हमारे बीच से ही आते हैं और क्यों ऐसे घटिया गाने लिखने और गानेवाले व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती. हमारी फिल्म और म्युज़िक इंडस्ट्री को कहीं ज्यादा समझदार होने की ज़रूरत है .

ये सच है ये बदलाव एक दिन में नहीं  आएगा लेकिन अगर इच्छाशक्ति हो तो तस्वीर बहुत जल्द बदल ज़रूर सकती है. मैंने अपने जीवन में पहली बार महिला मुद्दों पर इतनी बड़ी तादाद में पुरुषों, लड़कों और युवाओं को सड़क पर उतरते देखा है. इनकी तरफ से यह पहल स्वागतयोग्य है व इसे सहेज कर रखना ज़रूरी है.  लेकिन हाँ यहाँ पर ये ज़रूर कहना चाहूंगी कि जनता का ये रवैया महज़ चार दिन के मौन जुलूस, मोमबत्ती प्रदर्शन तक सीमित नहीं होना चाहिए. आज अपनी इंसानियत के जज्बे को जिंदा रखने की ज़रूरत है. ये समाज  हम सबसे ही मिलके बना है इसलिए इसमें बदलाव लाने की शुरुआत खुद से ही करनी होगी. ज़रूरत ये हैं कि हमारे आस पास जब भी कोई घटना हो तो हम उस वक़्त मूकदर्शक न बनें और अपनी चुप्पी तोडें क्योंकि हमारी और आपकी ख़ामोशी ही ऐसे अपराधियों के हौसले बढाती है. अगर ये नहीं कर सके तो 4 दिन के प्रदर्शन मात्र का कोई मतलब नहीं रह जाता. इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और कुछ नहीं हो सकती कि उसकी आधी आबादी असुरक्षित है और आज भी हर एक पल गैरबराबरी और अमानवीयता का सामना कर रही है. एक नसीहत सालों पहले मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी दे गए थे....आज उसका ज़िक्र प्रासंगिक हो चला है: 

कद्र अब तक तिरी तारीख ने जानी ही नहीं 
तुझमें शोले भी हैं बस अश्कफिशानी ही नहीं 
तू हकीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं 
तेरी हस्ती भी है एक चीज़ जवानी ही नहीं 
अपनी तारीख़ का उनवान बदलना है तुझे 
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे 

साभार :- प्रस्तुतकर्ता Rमेरा पन्ना ब्लॉग से  )

Tuesday, 26 March 2013

16 की सच्चाई

कैबिनेट द्वारा लाए गए बलात्कार निरोधक कानून को लेकर पिछले कुछ दिनों से कई तरह की भ्रांतियां बनी हुई हैं। हालांकि कुछ संशोधनों के साथ अब राजनीतिक दलों में मसौदे पर सैद्धांतिक सहमति बनी है। असली भ्रम सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र, बलात्कार कानून के अलावा इससे जुड़ी सजा व दुष्परिणाम को लेकर है

यौन संबंध की सहमति की उम्र 18 साल से घटाकर सरकार द्वारा अचानक 16 साल नहीं की गयी है। हालांकि अनेक राजनीतिक दलों के विरोध को देखते हुए सरकार इस मामले पर पुनर्विचार कर रही है और संकेत हैं कि यह आयु 18 वर्ष ही रखी जाएगी। मालूम हो कि भारत में सहमति की उम्र 1983 से लेकर अभी कुछ महीने पहले तक 16 वर्ष ही थी। इस मामले में सिर्फ चार महीने पहले आवाज बुलंद हुई। इसे 18 वर्ष किए जाने को लेकर मामला गर्माया और चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट (पीओसीएसओ) सामने आया। यह मामला अध्यादेश के आने के एक महीने पहले का है। सहमति की उम्र 16 वर्ष किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि किशोरों या टीन्स को सेक्स करने का लाइसेंस मिल गया या उसे बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। बहस इस पर नहीं है कि टीनएज सेक्स अच्छा है या खराब, बल्कि बहस का केंद्र यह है कि टीन्स के बीच सहमति से किया गया सेक्स बलात्कार के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है या नहीं। क्योंकि आपराधिक कानून में नैतिक या सामाजिक संहिता जैसा कुछ भी नहीं है। यदि सहमति की उम्र 18 बढ़ायी जाती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि 16 से 18 वर्ष के बीच के लड़के को बलात्कारी या यौन दोषी के तौर पर सजा दी जा सकती है जबकि उसके समान उम्र की उसकी गर्लफ्रेंड साफ तौर पर कह रही होगी कि उसकी मर्जी से उसके दोस्त ने यह सबकुछ किया। जब शादी की उम्र 18 साल है तो सहमति से सेक्स करने की उम्र में अंतर क्यों है? इस मामले में पहली बात यह कि यदि कोई नाबालिग लड़का किसी नाबालिग लड़की से शादी करता है तो बाल विवाह कानून के तहत उस लड़के को सजा नहीं मिलेगी। लेकिन जब नाबालिग लड़का अपने समान उम्र की नाबालिग लड़की को उसकी मर्जी से बांहों में लेता है, चूमता है या सेक्स करता है तो उसे यौन अपराधी या बलात्कारी के तौर पर सजा हो सकती है। बाल विवाह के खिलाफ कानून माता-पिता को नाबालिग बच्चों के जीवन के फैसले लेने से रोकता है। वह युगल को इस बात का अधिकार भी देता है कि वे बालिग होंगे तो वे शादी बरकरार रखना चाहते हैं या नहीं, यह उन पर निर्भर है। यह बात सत्य है कि 16 से 18 के बीच की अवस्था में चिकित्सा विज्ञान भी गर्भधारण को उचित नहीं मानता। उन्हें सेक्स करने से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन उस उम्र में एक-दूसरे के प्रति प्राकृतिक तौर पर आकर्षित होना हकीकत है। ऐसे में वयस्कों को यह समझाने की जरूरत है कि वे अपने शरीर को समझें, उन्हें सम्मान दें और आकर्षण में न बहें और प्रेम के प्रति जिम्मेदार बनें। ऐसे में यौन आकर्षण उन्हें अपराधी तक बना सकता है और निदरेष वयस्क बलात्कारी सिर्फ इसलिए बन जाता है क्योंकि उसने अपने हमउम्र की लड़की के साथ उसकी सहमति से सेक्स संबंध बनाए हैं। जिस लड़के ने आपसी सहमति से संबंध बनाए थे, उसे गलत तरीके से बलात्कारी के तौर पर पेश किया जाएगा। इसका अंजाम यह होगा कि वह महिलाओं से डरेगा या फिर घृणा करेगा और वह कामुकता और महिलाओं के प्रति विकृत घृणाओं से भरा रहेगा। इसलिए उसके महिलाओं के प्रति हिंसक होने की संभावनाएं अधिक होंगी। और तो और, हम उस दुनिया में रहते हैं जहां वयस्कों के जीवन और विकल्पों को लेकर मोरल पॉलिसिंग काफी खतरनाक है। चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट के तहत तीसरी पार्टी (माता-पिता, मोरल पॉलिसिंग आउटफिट्स, खाप या और कोई) नाबालिग लड़के के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करा सकता है और न्यायालय में न्यायाधीश लड़के की इस दलील पर कि लड़की की सहमति से उसने ऐसा किया, की अनदेखी कर लड़के को दोषी करार दे सकते हैं। इसलिए कई न्यायाधीशों ने भी मांग की है कि सहमति की उम्र 16 रखी जाए और इसे 18 न बढ़ाई जाए क्योंकि वे नहीं चाहते कि किसी वयस्क बालक को जबर्दस्ती दोषी ठहराया जाए जबकि उसने सहमति से यौन संबंध बनाए। टाटा स्काई के एक विज्ञापन को लेकर जरा सोचें, जिसमें एक भाई अपनी बहन को किसी लड़के के साथ डिनर पर जाने की अनुमति नहीं देता। यदि सहमति की उम्र 18 वर्ष सचमुच बढ़ा दी जाती है तो नाबालिगों के बीच किसी भी तरह का यौन संपर्क स्वत: बलात्कार की श्रेणी में आ जाएगा। ऐसे में जो भाई अपनी बहन की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना चाहता है, वह उसका प्रयोग करेगा और किसी भी लड़के/पुरुष सहपाठी/बहन के दोस्त को दोषी ठहरा देगा। इसलिए जेंडर को लेकर पक्षपातपूर्ण धारणा रखने वाली पुलिस पार्क में एक साथ बैठे जोड़ों को भी परेशान करने से नहीं चूकेगी।

गया झूठी शिकायतें यदि महिला किसी पुरुष के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज कराती हैं तो इसका कानूनी विकल्प क्या है? कानूनी विकल्प आईपीसी सेक्शन-182 और 211 में पहले से मौजूद है। इसके तहत झूठी शिकायत करने पर सजा मौजूद है क्योंकि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। ऐसे में सवाल है, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में झूठी शिकायतों को लेकर क्यों विशेष प्रावधान किया जाए? इस तरह के प्रावधान महिलाओं को झूठी शिकायतें दर्ज करने से रोकते हैं। याद रखें कि यह विधेयक सिर्फ महिलाओं के संघर्ष का परिणाम है। यह पुरुष-विरोधी नहीं है। यह विधेयक यौन हिंसा संबंधी मामले में पुरुषों के साथ- साथ सभी लोगों की रक्षा के लिए है। यही कारण है कि इसमें पीड़ित को जेंडर मामले में तटस्थ रखा गया है। महिलाओं का संघर्ष ही सरकार को बदलाव लाने के लिए सहमत करता है कि अध्यादेश की गलतियों को सुधारा जाए। बलात्कार कानून में दोषी को ‘विशिष्ट जेंडर’ के तहत रखा गया है (क्योंकि महिला किसी पुरुष का बलात्कार नहीं कर सकती), सहमति की उम्र 16 साल बरकरार रखा गया है और विधेयक में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि बलात्कार के चार्जशीट वाले लोकसेवकों को अभी तक जो संरक्षण प्राप्त था, वह नहीं मिलेगा। ताकझांक, पीछा करना, एसिड हमले और नंगा करने जैसे मामले यौन अपराध के दायरे में आएंगे। ऐसे में, जस्टिस वर्मा की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करने को लेकर हमें दूसरी लड़ाई जारी रखनी होगी। बहरहाल, महिलाओं के आंदोलन को लेकर यह विधेयक काफी बड़ी उपलब्धि है।

ताकझांक ताकझांक का अर्थ सिर्फ घूरना नहीं है। ‘फे सबुक’ पर किसी लड़की की तस्वीर अपलोड करना ताकझांक नहीं है। यदि कोई पुरुष अपनी गर्ल फ्रेंड का सेक्स एमएमएस बनाता है या न्यूड फो टो बनाकर उसे सकरुलेट करता है तो इसे ताकझांक कहा जाएगा क्योंकि यह उसकी निजता का हनन है। यदि कोई महिला कपड़े की दुकान के चेंजिंग रूम में कपड़े बदल रही है और वहां गुप्त छेद या गुप्त कैमरे की मदद से उस पर नजर रखी जा रही है तो यह ताकझांक की श्रेणी में आएगा। दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह पर भी ताकझांक करने का आरोप लगा था। उसकी महिला पड़ोसी ने समाचार एजेंसी ‘रॉयटर’ को बताया था कि जब कभी-कभी हम कपड़े बदल रहे होते या नहा रहे होते थे तो वह हमारे घर की झलक ले रहा होता था। विरोध करने पर वह काफी कठोर हो जाता था और कहता था कि उसे कहीं भी खड़ा रहने का अधिकार है। ताकझांक करना मूल रूप से, किसी की निजता को छिप कर जासूसी करने का मामला है। यह कानून पुरुषों की रक्षा भी करता है।

पीछा करना फिल्म "डर" के गाने ˜तू हां कर या ना कर, तू है मेरी सनम  को याद कर लें। यह है ˜स्टाकिंग" यानी पीछा करना। लगातार किसी का पीछा करना, धमकीभरे मेल/पत्र भेजना कि तुम पर एसिड फेंक दूंगा या बलात्कार/र्मडर कर दूंगा, इसी श्रेणी में आते हैं। ज्यादातर महिलाएं इसी दहशत में जीती हैं और इसे लेकर कोई उपाय अभी तक नहीं किया गया है। इस मामले में लगातार सड़कों पर आंदोलन हो रहे हैं कि सिर्फ बलात्कारी को ही सजा न मिले बल्कि बलात्कार, र्मडर और एसिड हमलों जैसी घटनाओं पर अंकुश लगे। याद करें- प्रियदर्शिनी मट्टू कांड को। उसने पुलिस के पास कई बार संतोष सिंह के खिलाफ पीछा करने का मामला दर्ज कराया था। लेकिन कोई कानून नहीं था जिसके बिना पर उसे पीछा करने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता तो संतोष सिंह न तो उसका बलात्कार ही कर पाता और न ही उसकी हत्या। एसिड हमलों के साथ-साथ बलात्कार और र्मडर (धौलाकुआं में राधिका तंवर की हत्या की तरह) मामले अपराधियों द्वारा काफी दिनों तक पीछा करने के बाद ही हुए हैं। पीछा करने के मामले को गैरजमानती क्यों बनाया जाना चाहिए, यह अहम सवाल है क्योंकि पीछा करने वाला, जो एसिड फेंकना चाहता है या गोली मारना चाहता है, वह आगे कदम बढ़ा सकता है और यदि महिला मामला दर्ज करती है तो वह दोगुने गुस्से से ऐसा करेगा। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि धमकियों को अंजाम देने से पहले उसे गिरफ्तार किया जाए। र्मडर और बलात्कार की तु लना में पीछा करने वाले को दोषी साबित करना आसान है। पीछा करने वालों को लेकर गवाही या फिर दस्तावेज के तौर पर सबूत (धमकी भरा पत्र, फोन कॉल की रिकॉर्डिग वगैरह) उपलब्ध होते हैं। इनके आधार पर अपराध साबित किया जा सकता है औ र सजा दी जा सकती है। पीछा करने के मामले में महिलाओं के साथ- साथ यह अधिकार पुरुषों को भी मुहैया कराया गया है।

साभार :- कविता कृष्णन

Monday, 30 July 2012

सीटी बजी खलबली मची

जी से मेरी मुलाक़ात निरंतर , Delhi द्वारा आयोजित एक प्रशिक्षण मे हुई  थी . उनकी हिंदी भाषा पर  समझ का मै  कायल हूँ . उन के ब्लॉग  मनमाफ़िक  से हीं मै  ने यह कविता लिया है . घरेलू और सामाजिक   भेदभॎव  और  हिंसा के बिरोध मे और पारिवारिक और सामाजिक सभी मूल्ल्यों के खिलाफ़ जो किसी को हूनर सिखने से रोके .

 


एक थी चंचल राजकुमारी
     महलों की रौनक सब की दुलारी l
        शौक था उसका सीटी बजाना
               मीठी धुन में गाना गाना ll

         राजा रानी को चिंता सताती 
           सीटी की धुन कभी न भाती l
        लड़की की जाति है उसने पाई 
          फिर भी लाज कभी ना आई ll 

               ब्याह इससे कौन रचाए 
         आखिर इसको कौन समझाए l
       तभी दिमाग में सूझी एक चाल 
        मुकाबला करवाएं हम तत्काल ll

        इससे बढ़िया जो सीटी बजाए 
               ब्याह वह उसी से रचाए l
              आधा राज इनाम में पाए 
         शान से अपना जीवन बिताए ll

          दूर-दूर से राजकुमार थे आए
              सीटी पर धुन खूब सुनाए l
        सीटी बजा कर मुंह भी फुलाए
फिर भी राजकुमारी को हरा न पाए ll

       चमक उठे राजकुमारी के नयन
              मुस्कुराई वह मन ही मन l
             होंठ दबाती हंसी छिपाती
      झुक कर राजकुमारों को सुनाती ll

             गाल फुला कर पेट फुलाया
         सीटी पर इतना जोर लगाया l
            शादी पर यूँ दिल ललचाया
      फिर भी कोई मुझे हरा न पाया ll

           राजकुमार थे हार से परेशान
           मिट गई थी अब उनकी शान l
लगता है,राजकुमारी को जादू है आता
               वरना हमको कौन हराता ?

    तभी बढ़ कर बोला एक राजकुमार
                    मान गया मैं तुमसे हार l
            कितनी बढ़िया सीटी बजाती
             धुन में मुझको तुम उलझाती ll

         सच्चाई सुन सब रह गए हैरान
   खुशी से राजकुमारी ने किया ऐलान l
            हार मानने से यह न कतराए
                 सच्ची बात से न घबराए ll

                      अहंकार नहीं है इसमें
                    शादी करूँगी मैं इसी से ll



रचनाकार - सुनीति नामजोशी
मूल         -  फेमिनिस्ट फेबल्स 
किताब    -   बोलती है भाषा
काव्य रूपांतरण - आरती श्रीवास्तव 
प्रकाशक - निरंतर, दिल्ली, 2002

नारीवादी सिद्धांतों की बात कथा से कविता में और अपनी ज़िन्दगी में लानेवाली आरती को याद करते हुए जिसने छंद और लय से ज़्यादा भावना की परवाह की है...




Thursday, 15 December 2011

30 साल में देश भर में 1.20 करोड़ बच्चियों की घूण हत्या




लखनऊ (एजेंसी)। भारत में पिछले तीन दशक में एक करोड़ बीस लाख बच्चियों को गर्भ में लिंग का पता लगाकर मार दिया गया। सेंटर फार ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के इस साल कराए गए सव्रेक्षण में यह तथ्य सामने आया है। इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति की अक्टूबर, 2010 की रिपोर्ट में भी हुई है। भारत में वर्ष 2011 की जनगणना से यह साफ संकेत मिलता है कि छह साल तक के बच्चों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में लगातार कमी दिखाई दे रही है। प्रति एक हजार लड़कों में लड़कियों की संख्या 914 रह गई है। सव्रेक्षण के मुताबिक देश के कई बड़े राज्यों महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में यह प्रतिशत 914 से भी कम है। पंजाब और हरियाणा में यह आंकड़ा क्रमश: 846 और 830 है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति का मानना है कि एशियाई देशों खासकर भारत और चीन में 11 करोड़ 70 लाख कन्याओं की घूण हत्या की गई। लड़कियों के अधिकार को बढ़ावा देने के लिए सरकार के सात स्वयं सेवी संस्थाएं भी बढ़चढ कर हिस्सा ले रहे है। कन्या घूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाने तथा इसके लिए जमीनी स्तर पर लोगों को जानकारी देने के लिए पिछले 10 साल से काम किया जा रहा है, ताकि लड़कों के मुकाबले लड़कियों का कम अनुपात ठीक हो। इसके तहत कन्या घूण हत्या के व्यवहार को चुनौती देना और रोकना तथा बड़े पैमाने पर जागरुकता पैदा करना है, ताकि लड़के और लड़कियों की बराबरी और लड़कियों के अधिकार के मुद्दे को संवेदनशील बनाया जा सके। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति की रिपोर्ट में सामने आए तथ्य

Thursday, 6 October 2011

पुरुषों से ज्यादा काम करती महिलाएं


हिमालय क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे और एक महिला औसतन 3485 घंटे काम करती दिखती है .
हल चलाना शुरू कर दें, 100 फीसद श्रम की हकदार होंगी महिलाएं

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑग्रेनाइजेशन (एफएओ-संयुक्त राष्ट्र) के हालिया अध्ययन से पता चला है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे काम करता है, जबकि एक महिला औसतन 3,485 घंटे काम करती है यानी महिला व पुरुष के काम का अनुपात 294 : 101 है। 
कृषि में महिलाओं का योगदान 60 से 80 फीसद व अन्य गतिविधियों में 70 से 80 फीसद तक है।

 अध्ययन में महिलाओं को मिलने वाले मानदेय पर भी चिंता व्यक्त की गयी है। महिलाओं के श्रम को बराबरी की अहमियत नहीं मिल रहा है। अध्ययन कहता है कि महिलाओं की मौजूदगी पलायन रोकने के साथ सामाजिक ताने-बाने को बिखरने से बचाने के भी काम आती है क्योंकि महिलाएं ही बुजुगरे व बच्चों की देखभाल करती हैं।

 कृषि में सबसे अधिक भागीदारी हिमाचल की, उसके बाद उत्तराखंड का नंबर आता है। बांस आधारित उद्योगों के आधार पर उत्तर-पूर्वी राज्यों- नगालैंड व मिजोरम आदि की महिलाओं को सर्वाधिक प्रगतिशील माना गया है। इस काम से कम श्रम देकर अधिक आय हासिल की जा सकती है।

 अध्ययन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व नेशनल सैंपल सव्रे ऑफिस (एनएसएसओ) के आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में कुल श्रम- शक्ति का 50 फीसद भाग महिलाओं का है। छत्तीसगढ़, बिहार और मध्य प्रदेश की महिलाएं श्रम में बढ़े हिस्से की साझीदार हैं। पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व केरल में यह अनुपात 50 से कम है। बुवाई-रोपाई-कटाई तक का दारोमदार महिलाओं पर है।

 सामान्यत: अस्थायी रोजगार के वास्ते प्रवास पर गए पुरुष जुताई के समय गांव आते हैं लेकिन बाकी समय महिलाएं ही खेती का काम करती हैं। वे हल चलाना भी शुरू कर दें तो उनकी भागीदारी सौ प्रतिशत हो जाएगी। 

पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली सूअर, बंदर और लंगूरों का आतंक है इसीलिए फसलों की रक्षा के रूप में भी महिलाओं का योगदान है। अध्ययन यह भी सुझाव देता है कि यदि महिलाओं को आधुनिक उपकरण व वैज्ञानिक सलाह दी जाए तो न सिर्फ श्रम व समय की बचत होगी बल्कि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। खासकर, दुधारू पशुओं के बारे में कहा गया है कि महिलाओं की दिनचर्या का ज्यादातर समय चारा खिलाने, चारा लाने, दूध निकालने व पशुधन की साफ-सफाई में लग जाता है, लेकिन उस मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं होता। अत्यधिक श्रम के कारण महिलाओं की सेहत ठीक नहीं रहती। अधिकतर महिलाओं में एनीमिया की शिकायत है। 

साभार :- सुनीता भास्कर

Friday, 30 September 2011

जी हाँ बेटा है आपका

 जी हाँ
बेटा है आपका
पगड़ी आपकी सलामत
बेटा पैदा करने की पूरी
कीमत वसूलेंगे आप
माँगेंगे दहेज और कहेंगे
‘बेटी है आपकी
जो है उसी का है ’
कम लाई तो ताना देंगे
मारेंगे..
सच है कि बेटा ही है आपका
बेटी का बोझ न खौफ।
पर क्या गारण्टी इसकी
पोती नहीं होगी आपको