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Wednesday, 14 August 2013

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...



च्छा लगता है बच्चों को आज के दिन खुश देख कर , तिरंगा खरीदने की जिद्द करते हुए। उन के लिए यह एक उत्सव है। होना भी चाहिए ..वो सब !! 
 मतलब बोले तो सभी बच्चे  !! हर प्रकार के  फ़िक्र से परे है !! मतलब सब  फ़िक्र से परे  ..उन्हे क्या पता बी जे पी - कांग्रेश का  चुनावी एजेंडा क्या है ? जिंदल क्यूँ boxit निकालने के लिए पहाड़ ले रहा है , क्यूँ बड़े बाँध के लिए लोग बिस्थापित किए जा रहें हैं ? मनरेगा का रुपिया जो की हमारे टैक्स का रुपिया है कहाँ जा रहा है ? मंदिर जरूरी है या अस्पताल , जिन्दा रहना जरूरी है या लड़ना। 

और हम सब भी गज़ब हैं  ..बढ़े होते संतान को घर वाले क्या  समझाते है - पढो की जल्दी नौकरी  मिल जाए , क्या करो की सब काबू मे रहे  .पर  घर/ समाज / देश की राजनीति पर कोई समझ बनाने के लिए कोई प्रयास  नहीं ! 
क्या बात है !! और फ़िर सब तथाकथित चिन्तक लोगों को लगता है की घर/देश/समाज मे  सब गड़बड़ हो रहा है ।  

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले !

भारत माँ की चिंता , भारत माँ के इज्जत की चिंता , उस के चारो ओर  के दीवार / सीमा के सुरक्षा की चिंता।  इसी चिंता के कारण देश का रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है और शिक्षा , स्वस्थ्य पर सब्सिडी काम होती जा रही है।  

सम से माँ रूपी देश की चिंता करते - करते हम अब घर में मौजूद  लड़की - औरत  के शरीर की चिंता  करने लगे हैं  और इनको भी दीवाल और सीमा मे बाँध देने के नियम और परम्परा बना दिए हैं।  कोई फर्क नहीं तथाकथित भारत माँ ! और घर की माँ-औरत -लड़की मे।   यह की इसी सीमा के अंदर वो कहने को सुरक्षित हैं क्यों कि महिलाओं का शरीर इसी सीमा के अंदर भेदभाव झेलता है , हिंसा सहता  है , गाली सुनता है 
 सीमा से बाहर तो सीता जेसा हाल  !! और सुरक्षा का ठेका लक्ष्मन-आदमी- मर्द-भाई-हथियार से  ;-) ओह ओह !! वाह वाह !! 
मानसिकता बनाने के लिए एक से एक मुहाबरे / कहावत - औरत खुली तिजोरी है , लड़की घर की इज्जत है , लड़की लक्ष्मी है , औरतों की अकल  घुटने में है , औरतों के नाक न हो तो गन्दा खा लें। ढोल गवाँर छुद्र पशु नारी  , सब तारण के अधिकारी।  

 सब का अर्थ यह निकलता है कि लड़किओं और औरतों को घर के अंदर बंद कर के रखो , तिजोरी की तरह। घर की तिजोरी को कोई भी  खुला तो नहीं छोरता।   धन तो घर के अन्दर हीं  सुरक्षित हैं।  धन रूपी शरीर को  संभाल कर रखो।  
 तथाकथित तिजोरी पर तो इतना ध्यान और चोर-लुटेरे पर कोई चर्चा नहीं ! मतलब इज्जत लेने वाले पुरुषों पर।  

सही मायने में पूरा चक्कर है नियंत्रण का देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच - योनिकता -व्यवहार -  निर्णय और बाहर घूमने - फिरने  पर  .

अब जरा सोंचिए ना   माँ - बहन की गाली दो - पत्थर से बनी  देवी की पूजा करो , मन्दिर - मस्जिद- गुरुद्वारा - चर्च और कही भी चप्पल खोल कर जाओ और  - घर - पडोस की महिला पर किसी बहाने लात- जूता - चप्पल चलाओ। 
और तो और !!  अपने ना चलाओ तो जो चला रहा है उस को चलाने से ना रोको ..और ना रोकने के कई बहाने ( मेरी बीबी नहीं , मेरे घर की नहीं है , उस की है जो उस को मन करे वो उस के साथ करे ..हम को क्या ? )
 किसी धार्मिक जगह पर चप्पल पहन कर चले जाए तो !! जो आप को जानते नहीं वो भी आप की कायदे से क्लास ले लेंगे।  तब धर्म , आस्था के नाम पर अनजाने लोग भी एक हो जायगे .  
निर्जीव वस्तु के लिए श्रद्धा चरम पर लेकिन सजीव शरीर के सम्मान के लिए , उनके हिंसा और भेदभाव मुक्त जीवन के लिए कोई एक नहीं होता।  सब बट जाते हैं।  

दिमाग - विचार - व्यवहार - कर्म से गुलाम और आज़ादी उत्सव देश के नाम वाह !! 
देश आज़ाद  कैसे  रहेगा ? इस के लिए एक हज़ार उपाय और प्रयाश पर मानव शरीर कैसे  आज़ाद रहेगा उसमे भी महिलाओं का शरीर तो सब आप की बोलती बंद कर देंगे लोग समझाने पहुँच जाएगें और कहेंगे कि शी शी !! क्या बोल रहे हैं ?? ..धीरे बोलिए क्या बोल रहे है ..कोई सुन लेगा .. घर- परिवार - राष्ट्र -धर्म तो उस की गुलामी की सोच रहा है .और आप इन की आज़ादी की बात कह रहे हैं। भाई  देश आज़ाद रहना चहिए पर महिलाओं का शरीर, मन  गुलाम।   

हम  कार, मोटर साइकिल पर तिरंगा का स्टीकर चिपकाते हुए खुश हो लेते हैं , पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से निकलते हुए कई सालों से ..हाथ मे कागज से बना  छोटा तिरंगा का स्टीकर लिए पिन के साथ ..वो औरत .... जो सब के सीने पर कपडे मे तिरंगा लगा कर रुपिया लेना चाहती है ..और हम मे  से कई उस को मना करते रहते हैं ... यही है सच उस तिरंगे का ..तिरंगे के मायने का !! और एक विशेष दिन उस की इतनी कद्र ..ओह !! 
क्या सड़क , दुकान , फूटपाथ , राजनितिक पार्टियाँ ..सब का मुद्दा एक  " आज़ादी "  ," तिरंगा " ... " देश की सुरक्षा " , भारत माँ की चिंता उस के चारो और के दीवार / सीमा की चिंता ...

चक्कर है नियंत्रण का ..देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच पर / 

और फिर कई सवाल से चतुराई से बचने की सफल कोशिस .... 
घर मे एक शरीर को तो ..... क्या पहनना है , क्या पढना है , कहाँ और कब जाना है ,  किसके साथ जाना है, कहाँ  रहना है , किस से सम्बन्ध रखना है - बनाना है इस की फ़िक्र तो है नहीं ..हम इस आज़ादी पर  कोई सवाल नहीं सुनना चाहते ..बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...
इंडियन नेशन की आज़ादी का उत्सव वाह !! और नेशन की जनता की आज़ादी , राज्यों की आज़ादी !!    उस पर हमारा नेशन हम को बात नहीं करने देता ..और साथी किया तो देश द्रोह ...तथाकथित नेशन के पक्ष मे कहा - सुना - मान लिया तब तो देश भक्त पर !! सवाल उठा दिया  ..ओह ओह .. तब तो देश द्रोही  नहीं तो विकाश बीरोधी ....
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दीप जिस का महल्लात  (महल का बहुवचन) ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत ( समयोचितता, expediency ) के पले

ऐसे दस्तूर( संविधान)  को, सुबह-ए-बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी खाइफ़ ( खोफज़दा, भयभीत )  नहीं तख्ता-ए-दार ( फाँसी का तख़्ता )  से
मैं भी मंसूर ( एक मशहूर सूफी संत जिन्हें बादशाह ने उन के विधर्मिक व्यवहार के कारण फांसी पर चढ़ा दिया था )  हूँ कह दो अग़यार ( ग़ैर का बहुवचन ) से
क्यूँ डराते हो ज़िन्दां  ( क़ैदख़ाना ) की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जहल ( जहालत ) की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

फूल शाखों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिन्दों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूट को, ज़हन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ ( जादू )
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ

तुम नहीं चारागर ( चिकित्सक, काम बनाने वाला, (काम या हालत वगैरा को) दुरुस्त करने वाला, बिगड़ा काम बनाने वाला, मदद करने वाला ) , कोई माने, मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।
अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।
ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।
राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।
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भागवत के भांड नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
मौलाना का फरमान नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
नेता का भाषण नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
फौज पुलिस का जुल्म नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 

राजपथ तुम्हारा होगा 
जनपथ हमारा है 
ये 2013 है 
एक नया सवेरा है 

जम्हूरियत का एक ही नाम 
बेख़ौफ़ औरत 
आज़ाद इंसान

Thursday, 14 March 2013

We all shit, we all pee but never talk about it


गर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी
तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया
मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी।
दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते ही धुआं छोड़ने वाली
150 सीसी पल्‍सर की रफ्तार से शुरू हो गईं।
‘मैडम हम फलां कंपनी की तरफ से आए हैं, फलां फेयरनेस क्रीम और साबुन और
शैंपू जाने क्‍या-क्‍या तो बेच रहे हैं। एक डेमो देना चाहते हैं।’
मैंने उनकी बात खत्‍म होने से पहले ही अपने रूटीन बेहया लहजे में कहा,
‘नहीं, नहीं, नहीं चाहिए। हम पहले से ही बहुत ज्‍यादा फेयर हैं। क्रीम
लगाएंगे तो करीना कपूर छाती पीटकर रोएगी। उसके रूप के साथ हम अन्‍याय
नहीं कर सकते।’
मजाक नहीं, मैंने सचमुच ऐसा ही कहा। (मैं काफी बदजबान हूं और कब कहां
क्‍या बोल दूं, मुझे खुद भी पता नहीं होता।)
दोनों थोड़ा इमबैरेस सी हुईं, लेकिन फिर मेरे चेहरे पर शरारती मुस्‍कान
देखकर हंसने लगीं। अबकी मैंने फाइनल डिसीजन सुना दिया, ‘Look mam, I am
not interested. ’

मुझे लगा कि अब वो लौट जाएंगी और किसी और का दरवाजा खटखटाकर सुंदर होने
के नुस्‍खे बताएंगी। लेकिन वो कुछ मिनट और खड़ी रहीं। दोनों ने एक ही रंग
और डिजाइन की साड़ी पहन रखी थी। दिखने में पहली ही नजर में कहीं से
आकर्षक नहीं जान पड़ती थीं, लेकिन बरछियां बरसाती बदजात दोपहरी में
दरवाजे-दरवाजे भटकना पड़े तो करीना कपूर भी दस दिन में कोयला कुमारी नजर
आने लगे। वो मेरी तरह कूलर की हवा में बैठकर तरबूज का शरबत पीती होतीं तो
निसंदेह उनकी त्‍वचा इतनी खुरदुरी नहीं लगती।

मैं दरवाजा बंद करके पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन वो मेरी रुखाई के
बावजूद एकदम से पलटकर दोबारा कभी मेरा मुंह भी न देखने को उद्धत नहीं जान
पड़ीं। उनकी आंखों ने कहा कि वो कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन संकोच की कोई
रस्‍सी तन रही है।
हम दोनों ही कुछ सेकेंड चुपचाप खड़े रहे।
फिर जैसे बड़ी मुश्किल से उनमें से एक हिम्‍मत जुटाकर बोली, ‘मैम, हम
आपका बाथरूम यूज कर सकते हैं।’
मुझे उनकी बात समझने में कुछ सेकेंड लगे। फिर बोली, ‘हां जरूर, शौक से।
प्‍लीज, अंदर आ जाइए।’

दोनों कमरे की ठंडी हवा में आकर सुस्‍ताने लगीं। एक-एक करके बाथरूम गईं,
मुंह पर पानी के छींटे डाले। मैंने तरबूज का शरबत उन्‍हें भी ऑफर किया।
दोनों चुपचाप बैठकर शरबत पीने लगीं और उस पूरे दौरान हुई बातचीत से उनके
मुतल्लिक कुछ ऐसी जानकारियां हासिल हुईं।

वो किसी कंपनी में डेली वेजेज पर काम करती थीं, सुबह दस से शाम छह बजे तक
और शाम को मिलने वाले पैसे इस बात पर निर्भर करते थे कि दिन भर उन्‍होंने
कितने प्रोडक्‍ट बेचे थे। वो घर-घर जाकर अपने प्रोडक्‍ट दिखातीं (जैसे
चश्‍मे बद्दूर में दीप्ति नवल चमको साबुन बेचती थी) और जिस घर जातीं,
उनका नाम, मकान नंबर और साइन एक कागज पर दर्ज कर लेती थीं। उनमें से एक
अपने एलआईसी एजेंट पति और दूसरी मां और विधवा बहन के साथ रहती थी। ये
जानकारियां मैंने दनादन सवालों की बौछार करके जुटा ली थीं। लेकिन मैं
mainly जो बात कहना चाहती हूं, उसका इन डीटेल्‍स से न ज्‍यादा, न कम
लेना-देना है।
मैं घूम-फिरकर उस सवाल पर आ गई, जो मुझे इतनी देर से कोंच रहा था।
‘आप दिन भर इतनी गर्मी, धूप में घूमते-घूमते परेशान नहीं हो जातीं।’
‘आदत हो गई है।’
‘आपको प्‍यास लगे तो? ’
‘किसी के घर में पी लेते हैं।’
‘और लू जाना हो तो? ’
‘क्‍या? ’
‘बाथरूम?’
‘बाथरूम जाना हो तो? आप लोगों को प्रॉब्‍लम नहीं होती। 8-10 घंटे आप बाहर
घूमती हैं। बाथरूम लगे तो क्‍या करती हैं?’ ।
मैंने देखा संकोच की एक लकीर उनके माथे पर घिर आई थी। जाहिर था कि जैसे
उन्‍होंने मुझे लड़की, शायद थोड़ी बिंदास लड़की या जो कुछ भी समझकर मुझसे
बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट कर ली थी, ऐसा वो अमूमन नहीं करती होंगी,
नहीं कर पाती होंगी। वैसे भी आप किसी अनजान के घर सामान बेचने जाकर उसके
बाथरूम में नहीं घुस जाते। लेकिन बाथरूम Available न हो तो ऐसा तो नहीं
कि सू-सू अपने आने का कार्यक्रम मुल्‍तवी कर देगी।
उन्‍होंने बताया कि उन्‍हें दिक्‍कत तो होती है। दिन भर वो कम से कम पानी
पीती हैं। बहुत बार घंटों-घंटों इस प्राकृतिक जरूरत को दबाकर भी रखती
हैं। मेरे काफी खोदने पर उन्‍होंने स्‍वीकारा कि ऐसा करने का उन्‍हें
खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। पेट में दर्द से लेकर यूरिनरी इंफेक्‍शन तक
वो झेल चुकी हैं।
‘पीरियड्स के समय भी आप ऐसे ही घूमती हैं?’
वो और ज्‍यादा अपने संकोच में सिकुड़ गईं। मैं तो कोई पुरुष नहीं थी,
लेकिन शायद लड़कियां भी लड़कियों से ऐसी बातें नहीं करतीं। इसलिए मैं
उन्‍हें थोड़ी विचित्र जान पड़ी।
बोलीं, ‘हां करना तो पड़ता है मैम। क्‍या करें, हमारी नौकरी ही ऐसी है।
एक दिन न आएं तो उस दिन के पैसे नहीं मिलेंगे। और फिर घर भी तो चलाना है।
आजकल महंगाई कितनी बढ़ गई है।’
बातें जो न चाहें तो कभी खत्‍म न हों, को चाहकर हमने खत्‍म किया और वो
चली गईं। वो चली गईं और मैं सोच रही थी। घड़ी की तरह शरीर में भी (खासकर
औरतों के शरीर में) एक अलार्म होना चाहिए, जिसमें हर चीज का टाइम सेट कर
दें। बाथरूम आने का भी टाइम सेट हो। सुबह दस से शाम छह बजे तक नहीं आएगी।
जब घर में रहेंगे, तभी आएगी क्‍योंकि इस देश में पब्लिक टॉयलेट्स सच्‍ची
मोहब्‍बत की तरह ढूंढे से नहीं मिलते। गलती से मिल भी जाएं तो पता चलता
है कि सच्‍ची मोहब्‍बत नहीं, सड़क छाप, बदबू मारते गलीज बीमारियों के
अड्डे हैं, जहां अव्‍वल तो लड़कियां घुसती नहीं और घुसती हैं तो ऐसा ही
समझा जाता है कि छेड़े जाने की हरसत से आई हैं। और जो थोड़ी भलमनसाहत
बाकी हो और उन्‍हें न भी छेड़ो तो आंखें फाड़-फाड़ देख तो लो ही सही।
तो ऐसे देश का सिस्‍टम तो बदलने से रहा, इसलिए अलार्म ही फिट हो सके तो
कुछ बात बने। वरना हम ऐसी ही मुश्किलों से गुजरते रहने को अभिशप्‍त
होंगे।
ऐसी मुश्किलों से मैं भी कम नहीं गुजरी हूं और बीमारियों को खुद आ बैल
मुझे मार करने के लिए बुलाया है।
अपने जिए हुए अनुभव से मैं कह सकती हूं कि हिंदुस्‍तान जैसे मुल्‍क, जो
हालांकि पूरा की पूरा ही बड़ा शौचालय है, लेकिन पब्लिक शौचालय का जहां
कोई क्‍लीयर आइडिया न तो सरकार और न लोगों के दिमाग में है, में किसी
लड़की के लिए ऐसा कोई काम, जिसमें उसे दिन भर सिर्फ घूमते रहना हो, करना
किसी बड़ी बीमारी को मोहब्‍बत से फुसलाकर अपनी गोदी बिठाने से कम नहीं
है।
मुंबई में मैंने कुछ समय फिल्‍म रिपोर्टिंग जैसे काम में हाथ आजमाया था,
जिसके लिए मुझे घंटों-घंटों न घर, न ऑफिस, बल्कि बाहर इधर-उधर भटकना
पड़ता था। सुबह नौ बजे मैं घर से निकलती, दो घंटे ऑटो, लोकल train और बस
से सफर करके यारी रोड, पाली हिल, लोखंडवाला कॉम्‍प्‍लेक्‍स या
महालक्ष्‍मी रेसकोर्स रोड के रेस्‍टरेंट में पहुंचती, फिर वहां से
पृथ्‍वी थिएटर, पृथ्‍वी से जुहू तारा रोड, जुहू तारा से सात बंगला, सात
बंगला से केम्‍स कॉर्नर, केम्‍स कॉर्नर से वॉर्डन रोड करते हुए मेरा शरीर
रोड की तरह हो जाता था, जिस पर लगता हजारों गाडि़यां दौड़-दौड़कर रौंदे
डाल रही हैं।
मुंबई जैसे विशालकाय महानगर में, जहां पांच सितारा होटलों के चमकीले
टायॅलेटों, जिनकी फर्श भी हमारी रसोई की परात जितनी साफ रहती है, इतनी कि
उस पर आटा सान लो, से लेकर बांद्रा की खाड़ी के बगल में बने आसमान के
नीचे खुले प्राकृतिक शौचालयों तक सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन पब्लिक टॉयलेट
ढूंढना वहां भी धारावी में ब्रैड पिट को ढूंढने की तरह है।

सुबह नौ बजे से लेकर शाम 5-6 बजे तक भटकने के बाद मैं ऑफिस पहुंचती और
सबसे पहले बाथरूम भागती थी। दिन भर काफी मिट्टी पलीद होती थी। बॉम्‍बे के
बेहद उमस भरे दिलफरेब मौसम में बार-बार पानी या लेमन जूस पीते रहना
मजबूरी थी, वरना डिहाइड्ेशन से ही मर जाती। इस तरह भटकते रहने का यह
ताजातरीन अनुभव था। शुरू में काफी एक्‍साइटमेंट था। लेकिन इससे और
क्‍या-क्‍या मुश्किलात जुड़े हैं या इसके और क्‍या-क्‍या नतीजे मुमकिन
हैं, इस बारे में तब तक कोई अंदाजा ही नहीं था। नौ बजे घर से निकलने के
बाद 1-2 बजते-बजते मैं काफी परेशान हो जाती थी। लेकिन मैंने हालांकि बड़े
सामान्‍य, लेकिन कुछ विचित्र भी लगने वाले तरीकों से ऐसी हाजतों से निजात
पाई है। ये बोलते हुए हंसी भी आती है, लेकिन फेयरनेस क्रीम बेचने वाली उन
स्त्रियों ने तो मुझसे ही बाथरूम यूज करने की रिक्‍वेस्‍ट की थी, लेकिन
मैं बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के घर ऐसी डिमांड रख देती थी।
एक दिन स्‍मृति ईरानी के घर पहुंची तो जोर की बाथरूम लगी थी। संकोच बहुत
था, लेकिन कुछ जरूरतें ऐसी होती हैं कि दुनिया के हर संकोच से बड़ी हो
जाती हैं। मैंने बड़ी बेशर्मी से पूछ लिया, May I use your washroom
please.

उसने कहा, yes. Off course. ऑफ कोर्स मैंने खुद को कृतार्थ किया।
एक बार शेखर कपूर के घर, हालांकि वो उस समय घर में नहीं थे (ये बहुत दुख
की बात है, क्‍यों‍कि शेखर कपूर पर मुझे क्रश है) मैंने सुचित्रा से ऐसी
ही रिक्‍वेस्‍ट की और उन्‍होंने बड़ी खुशी से रिस्‍पॉन्‍ड किया। ऐसी
रिक्‍वेस्‍ट मैंने सुप्रिया पाठक, किरण खेर, रेणुका शहाणे, सुरेखा सीकरी,
नादिरा बब्‍बर वगैरह से भी की थी और शायद सबने इस रिक्‍वेस्‍ट की
जेनुइननेस को समझा भी था। इंटरेस्टिंगली सभी स्त्रियों से ही ऐसी बात
कहने का विश्‍वास होता था। बोस्‍कीयाना में बैठकर ढाई घंटे भी इंतजार
करना पड़े तो भी मैं नेचर कॉल को चप्‍पल उतारकर दौड़ाती - 'भाग, अभी
नहीं, बाद में आना।'
सिर्फ कुछ ही महीनों में सेहत की काफी बारह बज गई थी।

2- बंबई में फिल्‍म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्‍कत से
नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज
करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब
अपनी दोस्‍त लेडी डॉक्‍टर्स से लेकर अनजान लेडी डॉक्‍टर्स तक से मैं ये
सवाल जरूर पूछती हूं कि औरतों के बाथरूम रोकने, दबाने या बाथरूम जाने की
फजीहत से बचने के लिए पानी न पीने के क्‍या-क्‍या नतीजे हो सकते हैं?
कौन-कौन सी बीमारियां उनके शरीर में अपना घर बनाती हैं और आपके पास ऐसे
कितने केसेज आते हैं। मेरे पास कोई ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं है कि लेकिन सभी
लेडी डॉक्‍टर्स ने यह स्‍वीकारा किया कि औरतों में बहुत सी बीमारियों की
वजह यही होती है। उन्‍हें कई इंफेक्‍शन हो जाते हैं और काफी हेल्‍थ
संबंधी कॉम्‍प्‍लीकेशंस। कई औरतें प्रेग्‍नेंसी के समय भी अपनी शर्म और
पब्लिक टॉयलेट्स की अनुपलब्‍धता की सीमाओं से नहीं निकल पातीं और अपने
साथ-साथ बच्‍चे का भी नुकसान करती हैं। यूं नहीं कि ये रेअरली होता है।
बहुत ज्‍यादा और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। खासकर जब से औरतें घरों से
बाहर निकलने लगी हैं, नौ‍करियां करने लगी हैं और खास तौर से ऐसे काम,
जिसमें एक एयरकंडीशंड दफ्तर की कुर्सी नहीं है बैठने के लिए। जिसमें दिन
भर इधर-उधर भटकते फिरना है।

मुंबई में मेरे लिए ये सचमुच एक बड़ी समस्‍या थी। हमेशा आप किसी सेंसिटिव
सी जान पड़ने वाली फीमेल सेलिब्रिटी के घर ही तो नहीं जाते। या कई बार
किसी के भी घर नहीं जाना होता, फिर भी भटकना होता है। मैं तो ऐसी भटकू
राम थी कि बिना काम के भी भटकती थी। तो ऐसे में मैंने एक तरीका और ईजाद
किया था। बॉम्‍बे में वेस्‍टसाइड, ग्‍लोबस, फैब इंडिया और बॉम्‍बे स्‍टोर
से लेकर शॉपर्स स्‍टॉप तक जितने भी बड़े स्‍टोर थे, उनका इस्‍तेमाल मैं
पब्लिक टॉयलेट की तरह करती थी। जाने कितनी बार मैं इन स्‍टोरों में कुछ
खरीदने नहीं, बल्कि इनका टॉयलेट इस्‍तेमाल करने के मकसद से घुसी हूं।
काउंटर पर बैग जमा किया, दो-चार कपड़े, सामान इधर-उधर पलटककर देखा और चली
गई उनके वॉशरुम में। इससे ज्‍यादा उन स्‍टोर्स की मेरे लिए कोई वखत नहीं
थी।
बचपन में मैंने मां, मौसी, ताईजी और घर की औरतों को देखा था कि वो कहीं
भी बाहर जाने से पहले बाथरूम जाती थीं और घर वापस आने के बाद भी सबसे
पहले बाथरूम ही जाती थीं। गांव में, जहां हाजत के लिए खुले खेतों में
जाना पड़ता है, वहां तो सचमुच औरतों के शरीर में (सिर्फ औरतों के) अलार्म
फिट था। उन्‍हें सुबह उजाला होने से पहले और शाम को अंधेरा होने के बाद
ही हाजत आती और कमाल की बात थी कि पड़ोस, पट्टेदारी की सारी औरतों को एक
साथ आती थी। सब ग्रुप बनाकर साथ ही जाती थीं, मानो किसी समारोह में जा
रही हों। मैं भाभी, दीदी टाइप महिलाओं से बक्‍क से पूछ भी लेती थी, ‘आप
लोगों को घड़ी देखकर टॉयलेट आती है क्‍या?’ कइयों ने कहा, हां और कइयों
ने स्‍वीकारा कि दिन में जाने का जोर आए तो दबा देते हैं।
कितनी अजीब है ये दुनिया। टायलेट जाते भी औरतों को शर्म आती है, मानो कोई
सीक्रेट पाप कर रही हों। जिस कमरे से होकर बाथरूम के लिए जाना पड़ता है,
या जिस कमरे से अटैच बाथरूम है, उस कमरे में अगर जेठ जी, ससुर या कोई भी
पुरुष बैठा है तो मेरी दीदियां, भाभियां, मामियां और घर की औरतें रसोई
में चुपाई बैठी रहेंगी, लेकिन बाथरूम नहीं जाएंगी। बोलेंगी, ‘नहीं, नहीं,
वो जेठजी बैठे हैं।’ हर दो मिनट पर झांकती रहेंगी, दबाती रहेंगी, लेकिन
जाएंगी नहीं। जेठजी तो गेट के बाहर गली खड़े होकर करने के लिए भी दो मिनट
नहीं सोचते। बहुएं मरी जाती हैं।
जेठ-बहू को जाने दें तो पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़कियों के दिमाग भी कुछ
खास रौशनख्‍याल नहीं हैं। इंदौर में वेबदुनिया में लेडीज टॉयलेट का
रास्‍ता एक बड़े केबिन से होकर गुजरता था, जहां सब पुरुष काम कर रहे होते
थे। वहां भी लड़कियां बाथरूम जाने में संकोच करती थीं। कहतीं,
‘सब बैठे रहते हैं वहां पर, सबको पता चल जाएगा कि हम कहां जा रहे हैं।’
‘अरे तो चलने दो न पता, कौन सा तुम अभिसार पर जा रही हो।’
‘अभिसार मतलब।’
‘अभिसार मतलब रात में छिपकर अपने प्रेमी से मिलने जाना। अभिसार पर जाने
वाली अभिसारिका।’
‘तुम बिलकुल बेशर्म हो।’
‘इसमें बेशर्म की क्‍या बात है। अभिसार में शरमाओ तो समझ में भी आता है।
लेकिन बाथरूम जाने में कैसी शर्म। जो लोग वहां बैठे हैं, वो नहीं जाते
क्‍या।’
‘नहीं यार, अच्‍छा नहीं लगता।’
ऐसे ही इस दुनिया को जाने क्‍या-क्‍या अच्‍छा नहीं लगता। आपकी बाकी चीजें
तो अच्‍छी नहीं ही लगतीं, लेकिन अब आप पानी पीना, बाथरूम जाना भी छोड़
दीजिए। लोगों को अच्‍छा जो नहीं लगता।


ये इतनी स्‍वाभाविक जरूरत है, लेकिन इसके बारे में हम कभी बात नहीं करते।
बच्‍चा पैदा होते साथ ही रोने और दूध पीने के बाद पहला काम यही करता है,
लेकिन औरतों के बाथरूम जाने को लेकर समाज ऐसे पिलपिलाने लगता है मानो
बेहया औरतें भरे चौराहे आदमी को चूम लेने की बेशर्म जिद पर अड़ आई हों।
‘नहीं, हम तो यहीं चूमेंगे, अभी इसी वक्‍त।’
हम कोई अतिरिक्‍त सहूलियत की बात नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि बहुत
मानवीय, उदात्‍त, गरिमामय समाज की डिमांड की जा रही है। प्‍लीज, प्‍यार
कर सकने लायक खुलापन दीजिए समाज में, इतना कि अपने दीवाने को हम चूम
सकें। रात में समंदर किनारे बैठकर बीयर पीना चाहें तो पीने दीजिए।
हल्‍द्वानी-नैनीताल की बीच वाली पहाड़ी पर रात में बैठकर सितारों को
देखने दीजिए। नदी में तैरने दीजिए, आसमान में उड़ने दीजिए। राहुल
सांकृत्‍यायन की तरह पीठ पर एक झोला टांगे बस, Truck, टैंपो, ऑटो,
बैलगाड़ी, ठेला जो भी मिले, उस पर सवार होकर दुनिया की सैर करने दीजिए।
अपनी बाइक पर हमें मनाली से लेह जाने दीजिए और बीच में अपनी नाक मत
घुसाइए, प्‍लीज। प्‍यार की खुली छूट दीजिए या फ्री सेक्‍स कर दीजिए।


ऐसा तो कुछ नहीं मांग रहे हैं ना। बस इतना ही तो कह रहे हैं कि बाथरूम
करने दीजिए। घूरिए मत, ऐसी दुनिया मत बनाइए कि बाथरूम जाने में भी हम
शर्म से गड़ जाएं। इतने पब्लिक टॉयलेट तो हों कि सेल्‍स गर्ल, एलआईसी
एजेंट या हार्डकोर रिपोर्टर बनने वाली लड़कियों को यूरीनरी इंफेक्‍शन
होगा ही होगा, ये बहार आने पर फूल खिलने की तरह तय हो।

प्‍लीज, ये बहुत नैचुरल, ह्यूमन नीड है। इसे अपने सड़े हुए बंद दिमागों
और कुंठाओं की छिपकलियों से बचाइए। सब रेंग रही हैं और हम अस्‍पतालों के
चक्‍कर लगा रहे हैं।


समाप्‍त।

साभार :- मनीषा पांडे के ब्लॉग बेदखल की डायरी से 

Friday, 8 March 2013

किन देशों में महिलाओं की कैसी है स्थिति





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ज यानी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है।  आइए जानते हैं‌ कि किन देशों में महिलाओं की कैसी और क्या स्थिति है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध
भारत: बलात्कार के 24,206, छेड़छाड़ के 42,968 व यौन उत्पीड़न के 8,570 मामले एवं अन्य सभी को मिलाकर कुल 2,19,062 मामले दर्ज किए गए। (2011 में)

अन्य देश: ब्रिटेन में लैंगिक हिंसा के 45,326, अमेरिका में बलात्कार के 90,750, रूस में 15,770 लैंगिक हिंसा के मामले दर्ज किए गए। (2010 में)

कंपनियों के कार्यकारी अधिकारी के पद पर
भारत: विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत हैं।
अन्य देश: अमेरिका और ब्रिटेन में तीन प्रतिशत है। (फॉर्च्यून 500 और एफटीएसई 100 की कंपनियों की सूची 2010)

महिला डायरेक्टर
भारत: भारतीय कंपनियों के निदेशक मंडल में 30 फीसदी महिला निदेशक है।
अन्य देश: नार्वे में सबसे अधिक 37 फीसदी जबकि सऊदी अरब में इसकी संख्या 0.23 फीसदी है। अमेरिका में यह संख्या 16.34 प्रतिशत है। (माईहायरिंगक्लब डॉटकॉम द्वारा किए गए सर्वे की 2012 में जारी रिपोर्ट)

संसद में महिलाएं
भारत: निचले और ऊपरी सदन में महिलाओं का कुल प्रतिनिधित्व 10.3 फीसदी।
अन्य देश: सेनेगल में सबसे अधिक 45 प्रतिशत जबकि भूटान में 13.9 फीसदी, और नेपाल में 33.2 फीसदी।
शिक्षा।

शिक्षा में महिलाएं
भारत: देश में 65.46 फीसदी महिलाएं साक्षर है। राज्यों में 93 फीसदी के साथ केरल सबसे अव्वल जबकि बिहार 63 फीसदी के साथ नीचले स्थान पर है। उत्तर प्रदेश में 59.3 फीसदी औरतें साक्षर है।
अन्य देश: लक्जमबर्ग, नार्वे में 100 फीसदी, यूएसए में 99 फीसदी जबकि सामालिया में 25 व अफगानिस्तान में 12.6 फीसदी महिलाएं साक्षर है।

कामकाजी महिलाएं
भारत: 60 लाख महिलाएं (2011 में) कामकाजी है जिसकी औसत आय (प्रति माह) 9,000 रुपये है। वहीं टॉप पांच फीसदी की प्रतिमाह औसत आय 32,000 रुपये है।

रात को घर से बाहर निकलने में सुरक्षा
भारत: 69 फीसदी महिलाएं आने-आप को सुरक्षित मानती है।
अन्य देश: सिंगापुर में 88, इंडोनेशिया में 84, अमेरिका में 62 जबकि ऑस्ट्रोलिया में 51 फीसदी महिलाएं रात को निकलने में सुरक्षित महसूस करती है। (2012 में गैलप द्वारा 143 देशों के 1.80 लाख से अधिक युवाओं पर किए गए अध्ययन के मुताबिक)

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं
भारत: 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई पिछले तीन दशक में। (द लांसेट 2011 की रिपोर्ट), 8,618 दहेत हत्या के मामले दर्ज किए गए। (राष्ट्रीय अपराध सांख्यकी ब्यूरो 2011)
अन्य देश: रूस में 14,000 महिलओं की मौत हुई। (2010)

मातृत्व
भारत: दुनिया भर में मातृत्व की स्थिति से संबंधित सूचकांक में भारत का स्थान 76वां है। 140 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चो के जन्म पर 212 है।

अन्य देश: नार्वे शीर्ष स्थान पर जबकि नाइजर सबसे नीचे है। चीन में 1500 महिलाओं और श्रीलंका में 1100 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान होती है। (80 कम विकसित देशों में किए गए सर्वे/सेव द चाइल्ड की 2012 की सालाना रिपोर्ट)

परिवार नियोजन से अनजान
भारत: 10-20 फीसदी भारतीय महिलाएं परिवार नियोजन से अनजान हैं।
अन्य देश: पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में 20-30 प्रतिशत जबकि यूगांडा में 41 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन के उपायों से वाकिफ नहीं है।

देश में महिलाओं की स्थिति
--देश में 58.65 करोड़ महिलाएं हैं।
--महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है
--पंचायतों में लगभग 38.87 फीसदी यानी 28.18 लाख चुनी महिलाएं हैं
--विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत
--मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर 212 है।
--भारत के निचले सदन लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10.8 फीसदी और राज्यसभा में 10.3 फीसदी है।
--बंबई शेयर बाजार में 100 सूचीबद्घ कंपनियों में से 1,112 निदेशकों के पदों में सिर्फ 59 (5.3 फीसदी) पर ही महिलाएं हैं।
--देश में कुल 60 लाख कामकाजी महिलाए हैं जबकि बड़े शहरों में कामकाजी महिलाओं की संख्या 36 लाख है।
--2 करोड़ 70 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी कमाई महिला पर टिकी है। कुल परिवारों में ऐसे परिवारों की तादाद 11 फीसदी।
--49 लाख ऐसी महिलाएं हैं जो सिंगल मेंबर फैमिली हैं।
--2001 के मुकाबले महिला प्रधान परिवारों की संख्या लगभग 6 फीसदी बढ़ी है।
--70 प्रतिशत महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है।
--देश में डीजीपी, स्पेशल डीजी, एडीजीपी, आईजीपी व डीआईजी स्तर के कुल 76 महिला अधिकारी है। वहीं अधिकारी से हेड कांस्टेबल तक में महिलाओं की संख्या 71,756 है।

भारत में महिलाओं को अधिकार
प्लांटेशन लेकर एक्ट: 1951 के प्लांटेशन लेबर एक्ट के तहत किसी भी महिला कर्मचारी की तबियत खराब होने या मातृत्व की स्थिति में मालिक को छुट्टी देने होगी। इस एक्ट के तहत महिलाओं को काम करने के लिए बेहतर माहौल और मेहनताना देने की जिम्मेदारी नियोक्ता को ही है।

स्पेशल मैरिज एक्ट: 1954 में लागू किए गए स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत किसी भी धर्म की व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी कर सकता है। (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर)

मातृत्व लाभ कानून: 1961 में लागू किए गए इस कानून के तहत मां बनने की स्थिति में एक निश्चित समयावधि तक महिला को छुट्टी मिलनी चाहिए साथ ही इस दौरान उसकी नौकरी जारी रहेगी और उसे वेतन भी प्राप्त होगा।

दहेज विरोधी कानून: दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों ही अपराध है। इसे 20 मई 1961 को लागू किया गया था।

गर्भपात कानून: 1971 के गर्भपात कानून के तहत किसी भी वजह से महिला का गर्भ किराना कानूनन जुर्म माना गया है। लेकिन इस कानून में कुछ कमियां होने के बाद अप्रैल 1972 में इसमें कुछ बदलाव कर इसे दोबारा मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1972 के नाम से लागू किया गया।

धरेलू हिंसा: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण विधेयक, 2005 (2005 के 43) की धारा एक की उपधारा (3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्रीय सरकार ने 26 अक्तूबर 2006 को लागू किया गया।

Thursday, 6 October 2011

पुरुषों से ज्यादा काम करती महिलाएं


हिमालय क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे और एक महिला औसतन 3485 घंटे काम करती दिखती है .
हल चलाना शुरू कर दें, 100 फीसद श्रम की हकदार होंगी महिलाएं

फूड एंड एग्रीकल्चर ऑग्रेनाइजेशन (एफएओ-संयुक्त राष्ट्र) के हालिया अध्ययन से पता चला है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रति हेक्टेअर प्रतिवर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे काम करता है, जबकि एक महिला औसतन 3,485 घंटे काम करती है यानी महिला व पुरुष के काम का अनुपात 294 : 101 है। 
कृषि में महिलाओं का योगदान 60 से 80 फीसद व अन्य गतिविधियों में 70 से 80 फीसद तक है।

 अध्ययन में महिलाओं को मिलने वाले मानदेय पर भी चिंता व्यक्त की गयी है। महिलाओं के श्रम को बराबरी की अहमियत नहीं मिल रहा है। अध्ययन कहता है कि महिलाओं की मौजूदगी पलायन रोकने के साथ सामाजिक ताने-बाने को बिखरने से बचाने के भी काम आती है क्योंकि महिलाएं ही बुजुगरे व बच्चों की देखभाल करती हैं।

 कृषि में सबसे अधिक भागीदारी हिमाचल की, उसके बाद उत्तराखंड का नंबर आता है। बांस आधारित उद्योगों के आधार पर उत्तर-पूर्वी राज्यों- नगालैंड व मिजोरम आदि की महिलाओं को सर्वाधिक प्रगतिशील माना गया है। इस काम से कम श्रम देकर अधिक आय हासिल की जा सकती है।

 अध्ययन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद व नेशनल सैंपल सव्रे ऑफिस (एनएसएसओ) के आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, 23 राज्यों में कृषि, वानिकी और मछली पालन में कुल श्रम- शक्ति का 50 फीसद भाग महिलाओं का है। छत्तीसगढ़, बिहार और मध्य प्रदेश की महिलाएं श्रम में बढ़े हिस्से की साझीदार हैं। पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व केरल में यह अनुपात 50 से कम है। बुवाई-रोपाई-कटाई तक का दारोमदार महिलाओं पर है।

 सामान्यत: अस्थायी रोजगार के वास्ते प्रवास पर गए पुरुष जुताई के समय गांव आते हैं लेकिन बाकी समय महिलाएं ही खेती का काम करती हैं। वे हल चलाना भी शुरू कर दें तो उनकी भागीदारी सौ प्रतिशत हो जाएगी। 

पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली सूअर, बंदर और लंगूरों का आतंक है इसीलिए फसलों की रक्षा के रूप में भी महिलाओं का योगदान है। अध्ययन यह भी सुझाव देता है कि यदि महिलाओं को आधुनिक उपकरण व वैज्ञानिक सलाह दी जाए तो न सिर्फ श्रम व समय की बचत होगी बल्कि उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है। खासकर, दुधारू पशुओं के बारे में कहा गया है कि महिलाओं की दिनचर्या का ज्यादातर समय चारा खिलाने, चारा लाने, दूध निकालने व पशुधन की साफ-सफाई में लग जाता है, लेकिन उस मात्रा में दूध का उत्पादन नहीं होता। अत्यधिक श्रम के कारण महिलाओं की सेहत ठीक नहीं रहती। अधिकतर महिलाओं में एनीमिया की शिकायत है। 

साभार :- सुनीता भास्कर

Friday, 30 September 2011

जी हाँ बेटा है आपका

 जी हाँ
बेटा है आपका
पगड़ी आपकी सलामत
बेटा पैदा करने की पूरी
कीमत वसूलेंगे आप
माँगेंगे दहेज और कहेंगे
बेटी है आपकी
जो है उसी का है
कम लाई तो ताना देंगे
मारेंगे..
सच है कि बेटा ही है आपका
बेटी का बोझ न खौफ।
पर क्या गारण्टी इसकी
पोती नहीं होगी आपको

Thursday, 29 September 2011

सहती है क्यों औरत?


तुम पूछते हो
सहती है क्यों औरत?
जवाब क्यों नहीं देती? 
‘‘पिता-पति-पुत्र ही हैं स्त्री के रक्षक
बाप-शौहर-बेटा है निगहबान इसका
खानदान का नाम चलाता है बेटा
बोझ की खान है बेटियाँ
मर्द कमाता है, खिलाता है, पैसा लाता है
लाठी है बुढ़ापे की
इसीलिए दर्जा भी ऊँचा है उसका

.. और फिर औरत
भोग की वस्तु है
कहाँ मर्द- कहाँ औरत’’
तुमने रचे शास्त्र, गढ़े नियम, 
बनाई मर्यादाओं की घेराबंदी 
जवाब तुम्हारे ही पास है
कैसा क्रूर मजक 
फिर भी करते हो सवाल 
सहती है क्यों औरत 

Saturday, 10 September 2011

गोरख पाण्डेय की याद में-


ग़ज़ल 1

कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं कैसे कह दूं तुझसे कि प्यार है
तू सितम की अपनी मिसाल है तेरी जीत में मेरी हार है

तू तो बांध रखने का आदी है मेरी सांस-सांस आजादी है
मैं जमीं से उठता वो नगमा हूं जो हवाओं में अब शुमार है

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर, मेरे शीशे पर, मेरे ख्वाब पर
यूं जो पर्त-पर्त है जम गया किन्हीं फाइलों का गुबार है

इस गहरे होते अंधेरे में मुझे दूर से जो बुला रही
वो हंसीं सितारों के जादू से भरी झिलमिलाती कतार है

ये रगों में दौड़ के थम गया अब उमड़ने वाला है आंख से
ये लहू है जुल्म के मारों का या फिर इन्कलाब का ज्वार है

वो जगह जहां पे दिमाग से दिलों तक है खंजर उतर गया
वो है बस्ती यारों खुदाओं की वहां इंसां हरदम शिकार है

कहीं स्याहियां, कहीं रौशनी, कहीं दोजखें, कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए मेरे पास सिर्फ नकार है

ग़ज़ल -2

सुनना मेरी दास्तां अब तो जिगर के पास हो
तेरे लिए मैं क्या करूं तुम भी तो इतने उदास हो

कहते हैं रहिए खमोश ही, चैन से जीना सीखिये 
चाहे शहर हो जल रहा चाहे बगल में लाश हो

नगमों से खतरा है बढ़ रहा लागू करों पाबंदियां
इससे भी काम न बन सके तो इंतजाम और ख़ास हो

खूं का पसीना हम करें वो फिर जमाएं महफ़िलें 
उनके लिए तो जाम हो हमको तड़पती आस हो

जंग के सामां बढ़ाइए खूब कबूतर उड़ाइये
पंखों से मौत बरसेगी लहरों की जलती घास हो

धरती, समंदर, आस्मां, राहें जिधर चलें खुली
गम भी मिटाने की राह है सचमुच अगर तलाश हो

हाथों से जितना जुदा रहें उतने खयाल ही ठीक हैं
वर्ना बदलना चाहोगे मंजर-ए-बद हवास हो

 है कम नहीं खराबियां फिर भी सनम दुआ करो
मरने की तुमपे ही चाह हो जीने की सबको आस हो


आशा का गीत

आएंगे, अच्छे दिन आएंगे,
गर्दिश के दिन ये कट जाएंगे,
सूरज झोपडि़यों में चमकेगा,
बच्चे सब दूध में नहाएंगे।

जालिम के पुर्जे उड़ जाएंगे,
मिल-जुल के प्यार सभी गाएंगे,
मेहनत के फूल उगाने वाले,    
दुनिया के मालिक बन जाएंगे।

दुख की रेखाएं मिट जाएंगी,
खुशियों के होंठ मुस्कुराएंगे,
सपनों की सतरंगी डोरी पर,
मुक्ति के फरहरे लहराएंगे।


अमीरों का कोरस

जो हैं गरीब उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं जरूरतें तो मुसीबतें कम हैं
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा 
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं।

वे नंगे रहते हैं बड़े मजे में 
वे भूखों रह लेते हैं बड़े मजे में 
हमको कपड़ों पर और चाहिए कपड़े
खाते-खाते अपनी नाकों में दम है।

वे कभी कभी कानून भंग करते हैं
पर भले लोग हैं, ईश्वर से डरते हैं
जिसमें श्रद्धा या निष्ठा नहीं बची है
वह पशुओं से भी नीचा और अधम है।

 अपनी श्रद्धा भी धर्म चलाने में है
अपनी निष्ठा तो लाभ कमाने में है
ईश्वर है तो शांति, व्यवस्था भी है
ईश्वर से कम कुछ भी विध्वंस परम है।

करते हैं त्याग गरीब स्वर्ग जाएंगे
मिट्टी के तन से मुक्ति वहीं पाएंगे
हम जो अमीर है सुविधा के बंदी हैं
लालच से अपने बंधे हरेक कदम हैं।

इतने दुख में हम जीते जैसे-तैसे
हम नहीं चाहते गरीब हों हम जैसे
लालच न करें, हिंसा पर कभी न उतरें
हिंसा करनी हो तो दंगे क्या कम हैं।

जो गरीब हैं उनकी जरूरतें कम हैं
कम हैं मुसीबतें, अमन चैन हरदम है
हम मिल-जुल के गाते गरीबों की महिमा 
हम महज अमीरों के तो गम ही गम हैं।





 गोरख पाण्डेय (1945 -1989) प्रतिबद्ध कवि और दर्शन, संस्कृति व कला के प्रश्नों से जूझने वाले हिन्दी के आर्गेनिक इंटलेक्चुअल (जन बुद्धिजीवी). जन संस्कृति मंच के संस्थापक महासचिव.
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...द्वारा मृत्युंजय ... 12:27 AM