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Saturday, 8 August 2015

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

भारत में महिलाओं के लिए ऐसे कई कानून हैं जो उन्हें सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से जीने के लिए सुविधा देते हैं. देखें ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार...
1- भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार देता है. अगर पिता ने खुद जमा की संपति की कोई वसीयत नहीं की है, तब उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति में लड़की को भी उसके भाईयों और मां जितना ही हिस्सा मिलेगा. यहां तक कि शादी के बाद भी यह अधिकार बरकरार रहेगा.
2- पति की संपत्ति से जुड़े हक
शादी के बाद पति की संपत्ति में तो महिला का मालिकाना हक नहीं होता लेकिन वैवाहिक विवादों की स्थिति में पति की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए. पति की मौत के बाद या तो उसकी वसीयत के मुताबिक या फिर वसीयत ना होने की स्थिति में भी पत्नी को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. शर्त यह है कि पति केवल अपनी खुद की अर्जित की हुई संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है, पुश्तैनी जायदाद की नहीं.
3- अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय
कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अर्जित की गई संपत्ति का जो चाहे कर सकती है. अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई और दखल नहीं दे सकता. महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चो को बेदखल भी कर सकती है.
4- घरेलू हिंसा से सुरक्षा
महिलाओं को अपने पिता या फिर पति के घर सुरक्षित रखने के लिए घरेलू हिंसा कानून है. आम तौर पर केवल पति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कानून के दायरे में महिला का कोई भी घरेलू संबंधी आ सकता है. घरेलू हिंसा का मतलब है महिला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या प्रताड़ना.
5- क्या है घरेलू हिंसा
केवल मारपीट ही नहीं फिर मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा के बराबर है. ताने मारना, गाली-गलौज करना या फिर किसी और तरह से महिला को भावनात्मक ठेस पहुंचाना अपराध है. किसी महिला को घर से निकाला जाना, उसका वेतन छीन लेना या फिर नौकरी से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेना भी प्रताड़ना है, जिसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला बनता है. लिव इन संबंधों में भी यह लागू होता है.
6- पुलिस से जुड़े अधिकार
एक महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है. महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पुलिस हिरासत में नहीं ले सकती. बिना वारंट के गिरफ्तार की जा रही महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी होता है और उसे जमानत संबंधी उसके अधिकारों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही गिरफ्तार महिला के निकट संबंधी को तुरंत सूचित करना पुलिस की ही जिम्मेदारी है.
7- पुलिस से जुड़े अधिकार
एक महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है. महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पुलिस हिरासत में नहीं ले सकती. बिना वारंट के गिरफ्तार की जा रही महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी होता है और उसे जमानत संबंधी उसके अधिकारों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही गिरफ्तार महिला के निकट संबंधी को तुरंत सूचित करना पुलिस की ही जिम्मेदारी है.
सभार :- DW 
http://aalilegal.org/

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Wednesday, 14 August 2013

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...



च्छा लगता है बच्चों को आज के दिन खुश देख कर , तिरंगा खरीदने की जिद्द करते हुए। उन के लिए यह एक उत्सव है। होना भी चाहिए ..वो सब !! 
 मतलब बोले तो सभी बच्चे  !! हर प्रकार के  फ़िक्र से परे है !! मतलब सब  फ़िक्र से परे  ..उन्हे क्या पता बी जे पी - कांग्रेश का  चुनावी एजेंडा क्या है ? जिंदल क्यूँ boxit निकालने के लिए पहाड़ ले रहा है , क्यूँ बड़े बाँध के लिए लोग बिस्थापित किए जा रहें हैं ? मनरेगा का रुपिया जो की हमारे टैक्स का रुपिया है कहाँ जा रहा है ? मंदिर जरूरी है या अस्पताल , जिन्दा रहना जरूरी है या लड़ना। 

और हम सब भी गज़ब हैं  ..बढ़े होते संतान को घर वाले क्या  समझाते है - पढो की जल्दी नौकरी  मिल जाए , क्या करो की सब काबू मे रहे  .पर  घर/ समाज / देश की राजनीति पर कोई समझ बनाने के लिए कोई प्रयास  नहीं ! 
क्या बात है !! और फ़िर सब तथाकथित चिन्तक लोगों को लगता है की घर/देश/समाज मे  सब गड़बड़ हो रहा है ।  

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले !

भारत माँ की चिंता , भारत माँ के इज्जत की चिंता , उस के चारो ओर  के दीवार / सीमा के सुरक्षा की चिंता।  इसी चिंता के कारण देश का रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है और शिक्षा , स्वस्थ्य पर सब्सिडी काम होती जा रही है।  

सम से माँ रूपी देश की चिंता करते - करते हम अब घर में मौजूद  लड़की - औरत  के शरीर की चिंता  करने लगे हैं  और इनको भी दीवाल और सीमा मे बाँध देने के नियम और परम्परा बना दिए हैं।  कोई फर्क नहीं तथाकथित भारत माँ ! और घर की माँ-औरत -लड़की मे।   यह की इसी सीमा के अंदर वो कहने को सुरक्षित हैं क्यों कि महिलाओं का शरीर इसी सीमा के अंदर भेदभाव झेलता है , हिंसा सहता  है , गाली सुनता है 
 सीमा से बाहर तो सीता जेसा हाल  !! और सुरक्षा का ठेका लक्ष्मन-आदमी- मर्द-भाई-हथियार से  ;-) ओह ओह !! वाह वाह !! 
मानसिकता बनाने के लिए एक से एक मुहाबरे / कहावत - औरत खुली तिजोरी है , लड़की घर की इज्जत है , लड़की लक्ष्मी है , औरतों की अकल  घुटने में है , औरतों के नाक न हो तो गन्दा खा लें। ढोल गवाँर छुद्र पशु नारी  , सब तारण के अधिकारी।  

 सब का अर्थ यह निकलता है कि लड़किओं और औरतों को घर के अंदर बंद कर के रखो , तिजोरी की तरह। घर की तिजोरी को कोई भी  खुला तो नहीं छोरता।   धन तो घर के अन्दर हीं  सुरक्षित हैं।  धन रूपी शरीर को  संभाल कर रखो।  
 तथाकथित तिजोरी पर तो इतना ध्यान और चोर-लुटेरे पर कोई चर्चा नहीं ! मतलब इज्जत लेने वाले पुरुषों पर।  

सही मायने में पूरा चक्कर है नियंत्रण का देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच - योनिकता -व्यवहार -  निर्णय और बाहर घूमने - फिरने  पर  .

अब जरा सोंचिए ना   माँ - बहन की गाली दो - पत्थर से बनी  देवी की पूजा करो , मन्दिर - मस्जिद- गुरुद्वारा - चर्च और कही भी चप्पल खोल कर जाओ और  - घर - पडोस की महिला पर किसी बहाने लात- जूता - चप्पल चलाओ। 
और तो और !!  अपने ना चलाओ तो जो चला रहा है उस को चलाने से ना रोको ..और ना रोकने के कई बहाने ( मेरी बीबी नहीं , मेरे घर की नहीं है , उस की है जो उस को मन करे वो उस के साथ करे ..हम को क्या ? )
 किसी धार्मिक जगह पर चप्पल पहन कर चले जाए तो !! जो आप को जानते नहीं वो भी आप की कायदे से क्लास ले लेंगे।  तब धर्म , आस्था के नाम पर अनजाने लोग भी एक हो जायगे .  
निर्जीव वस्तु के लिए श्रद्धा चरम पर लेकिन सजीव शरीर के सम्मान के लिए , उनके हिंसा और भेदभाव मुक्त जीवन के लिए कोई एक नहीं होता।  सब बट जाते हैं।  

दिमाग - विचार - व्यवहार - कर्म से गुलाम और आज़ादी उत्सव देश के नाम वाह !! 
देश आज़ाद  कैसे  रहेगा ? इस के लिए एक हज़ार उपाय और प्रयाश पर मानव शरीर कैसे  आज़ाद रहेगा उसमे भी महिलाओं का शरीर तो सब आप की बोलती बंद कर देंगे लोग समझाने पहुँच जाएगें और कहेंगे कि शी शी !! क्या बोल रहे हैं ?? ..धीरे बोलिए क्या बोल रहे है ..कोई सुन लेगा .. घर- परिवार - राष्ट्र -धर्म तो उस की गुलामी की सोच रहा है .और आप इन की आज़ादी की बात कह रहे हैं। भाई  देश आज़ाद रहना चहिए पर महिलाओं का शरीर, मन  गुलाम।   

हम  कार, मोटर साइकिल पर तिरंगा का स्टीकर चिपकाते हुए खुश हो लेते हैं , पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से निकलते हुए कई सालों से ..हाथ मे कागज से बना  छोटा तिरंगा का स्टीकर लिए पिन के साथ ..वो औरत .... जो सब के सीने पर कपडे मे तिरंगा लगा कर रुपिया लेना चाहती है ..और हम मे  से कई उस को मना करते रहते हैं ... यही है सच उस तिरंगे का ..तिरंगे के मायने का !! और एक विशेष दिन उस की इतनी कद्र ..ओह !! 
क्या सड़क , दुकान , फूटपाथ , राजनितिक पार्टियाँ ..सब का मुद्दा एक  " आज़ादी "  ," तिरंगा " ... " देश की सुरक्षा " , भारत माँ की चिंता उस के चारो और के दीवार / सीमा की चिंता ...

चक्कर है नियंत्रण का ..देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच पर / 

और फिर कई सवाल से चतुराई से बचने की सफल कोशिस .... 
घर मे एक शरीर को तो ..... क्या पहनना है , क्या पढना है , कहाँ और कब जाना है ,  किसके साथ जाना है, कहाँ  रहना है , किस से सम्बन्ध रखना है - बनाना है इस की फ़िक्र तो है नहीं ..हम इस आज़ादी पर  कोई सवाल नहीं सुनना चाहते ..बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...
इंडियन नेशन की आज़ादी का उत्सव वाह !! और नेशन की जनता की आज़ादी , राज्यों की आज़ादी !!    उस पर हमारा नेशन हम को बात नहीं करने देता ..और साथी किया तो देश द्रोह ...तथाकथित नेशन के पक्ष मे कहा - सुना - मान लिया तब तो देश भक्त पर !! सवाल उठा दिया  ..ओह ओह .. तब तो देश द्रोही  नहीं तो विकाश बीरोधी ....
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दीप जिस का महल्लात  (महल का बहुवचन) ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत ( समयोचितता, expediency ) के पले

ऐसे दस्तूर( संविधान)  को, सुबह-ए-बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी खाइफ़ ( खोफज़दा, भयभीत )  नहीं तख्ता-ए-दार ( फाँसी का तख़्ता )  से
मैं भी मंसूर ( एक मशहूर सूफी संत जिन्हें बादशाह ने उन के विधर्मिक व्यवहार के कारण फांसी पर चढ़ा दिया था )  हूँ कह दो अग़यार ( ग़ैर का बहुवचन ) से
क्यूँ डराते हो ज़िन्दां  ( क़ैदख़ाना ) की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जहल ( जहालत ) की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

फूल शाखों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिन्दों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूट को, ज़हन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ ( जादू )
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ

तुम नहीं चारागर ( चिकित्सक, काम बनाने वाला, (काम या हालत वगैरा को) दुरुस्त करने वाला, बिगड़ा काम बनाने वाला, मदद करने वाला ) , कोई माने, मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।
अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।
ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।
राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।
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भागवत के भांड नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
मौलाना का फरमान नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
नेता का भाषण नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
फौज पुलिस का जुल्म नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 

राजपथ तुम्हारा होगा 
जनपथ हमारा है 
ये 2013 है 
एक नया सवेरा है 

जम्हूरियत का एक ही नाम 
बेख़ौफ़ औरत 
आज़ाद इंसान

Friday, 8 March 2013

किन देशों में महिलाओं की कैसी है स्थिति





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ज यानी 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है।  आइए जानते हैं‌ कि किन देशों में महिलाओं की कैसी और क्या स्थिति है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध
भारत: बलात्कार के 24,206, छेड़छाड़ के 42,968 व यौन उत्पीड़न के 8,570 मामले एवं अन्य सभी को मिलाकर कुल 2,19,062 मामले दर्ज किए गए। (2011 में)

अन्य देश: ब्रिटेन में लैंगिक हिंसा के 45,326, अमेरिका में बलात्कार के 90,750, रूस में 15,770 लैंगिक हिंसा के मामले दर्ज किए गए। (2010 में)

कंपनियों के कार्यकारी अधिकारी के पद पर
भारत: विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत हैं।
अन्य देश: अमेरिका और ब्रिटेन में तीन प्रतिशत है। (फॉर्च्यून 500 और एफटीएसई 100 की कंपनियों की सूची 2010)

महिला डायरेक्टर
भारत: भारतीय कंपनियों के निदेशक मंडल में 30 फीसदी महिला निदेशक है।
अन्य देश: नार्वे में सबसे अधिक 37 फीसदी जबकि सऊदी अरब में इसकी संख्या 0.23 फीसदी है। अमेरिका में यह संख्या 16.34 प्रतिशत है। (माईहायरिंगक्लब डॉटकॉम द्वारा किए गए सर्वे की 2012 में जारी रिपोर्ट)

संसद में महिलाएं
भारत: निचले और ऊपरी सदन में महिलाओं का कुल प्रतिनिधित्व 10.3 फीसदी।
अन्य देश: सेनेगल में सबसे अधिक 45 प्रतिशत जबकि भूटान में 13.9 फीसदी, और नेपाल में 33.2 फीसदी।
शिक्षा।

शिक्षा में महिलाएं
भारत: देश में 65.46 फीसदी महिलाएं साक्षर है। राज्यों में 93 फीसदी के साथ केरल सबसे अव्वल जबकि बिहार 63 फीसदी के साथ नीचले स्थान पर है। उत्तर प्रदेश में 59.3 फीसदी औरतें साक्षर है।
अन्य देश: लक्जमबर्ग, नार्वे में 100 फीसदी, यूएसए में 99 फीसदी जबकि सामालिया में 25 व अफगानिस्तान में 12.6 फीसदी महिलाएं साक्षर है।

कामकाजी महिलाएं
भारत: 60 लाख महिलाएं (2011 में) कामकाजी है जिसकी औसत आय (प्रति माह) 9,000 रुपये है। वहीं टॉप पांच फीसदी की प्रतिमाह औसत आय 32,000 रुपये है।

रात को घर से बाहर निकलने में सुरक्षा
भारत: 69 फीसदी महिलाएं आने-आप को सुरक्षित मानती है।
अन्य देश: सिंगापुर में 88, इंडोनेशिया में 84, अमेरिका में 62 जबकि ऑस्ट्रोलिया में 51 फीसदी महिलाएं रात को निकलने में सुरक्षित महसूस करती है। (2012 में गैलप द्वारा 143 देशों के 1.80 लाख से अधिक युवाओं पर किए गए अध्ययन के मुताबिक)

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं
भारत: 1.2 करोड़ कन्या भ्रूणों की हत्या हुई पिछले तीन दशक में। (द लांसेट 2011 की रिपोर्ट), 8,618 दहेत हत्या के मामले दर्ज किए गए। (राष्ट्रीय अपराध सांख्यकी ब्यूरो 2011)
अन्य देश: रूस में 14,000 महिलओं की मौत हुई। (2010)

मातृत्व
भारत: दुनिया भर में मातृत्व की स्थिति से संबंधित सूचकांक में भारत का स्थान 76वां है। 140 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चो के जन्म पर 212 है।

अन्य देश: नार्वे शीर्ष स्थान पर जबकि नाइजर सबसे नीचे है। चीन में 1500 महिलाओं और श्रीलंका में 1100 महिलाओं में से एक महिला की मौत प्रसव के दौरान होती है। (80 कम विकसित देशों में किए गए सर्वे/सेव द चाइल्ड की 2012 की सालाना रिपोर्ट)

परिवार नियोजन से अनजान
भारत: 10-20 फीसदी भारतीय महिलाएं परिवार नियोजन से अनजान हैं।
अन्य देश: पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में 20-30 प्रतिशत जबकि यूगांडा में 41 प्रतिशत महिलाएं परिवार नियोजन के उपायों से वाकिफ नहीं है।

देश में महिलाओं की स्थिति
--देश में 58.65 करोड़ महिलाएं हैं।
--महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है
--पंचायतों में लगभग 38.87 फीसदी यानी 28.18 लाख चुनी महिलाएं हैं
--विभिन्न कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों पर 11 फीसदी महिलाएं कार्यरत
--मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख बच्चों के जन्म पर 212 है।
--भारत के निचले सदन लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 10.8 फीसदी और राज्यसभा में 10.3 फीसदी है।
--बंबई शेयर बाजार में 100 सूचीबद्घ कंपनियों में से 1,112 निदेशकों के पदों में सिर्फ 59 (5.3 फीसदी) पर ही महिलाएं हैं।
--देश में कुल 60 लाख कामकाजी महिलाए हैं जबकि बड़े शहरों में कामकाजी महिलाओं की संख्या 36 लाख है।
--2 करोड़ 70 लाख परिवार ऐसे हैं, जिनकी कमाई महिला पर टिकी है। कुल परिवारों में ऐसे परिवारों की तादाद 11 फीसदी।
--49 लाख ऐसी महिलाएं हैं जो सिंगल मेंबर फैमिली हैं।
--2001 के मुकाबले महिला प्रधान परिवारों की संख्या लगभग 6 फीसदी बढ़ी है।
--70 प्रतिशत महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है।
--देश में डीजीपी, स्पेशल डीजी, एडीजीपी, आईजीपी व डीआईजी स्तर के कुल 76 महिला अधिकारी है। वहीं अधिकारी से हेड कांस्टेबल तक में महिलाओं की संख्या 71,756 है।

भारत में महिलाओं को अधिकार
प्लांटेशन लेकर एक्ट: 1951 के प्लांटेशन लेबर एक्ट के तहत किसी भी महिला कर्मचारी की तबियत खराब होने या मातृत्व की स्थिति में मालिक को छुट्टी देने होगी। इस एक्ट के तहत महिलाओं को काम करने के लिए बेहतर माहौल और मेहनताना देने की जिम्मेदारी नियोक्ता को ही है।

स्पेशल मैरिज एक्ट: 1954 में लागू किए गए स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत किसी भी धर्म की व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी कर सकता है। (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर)

मातृत्व लाभ कानून: 1961 में लागू किए गए इस कानून के तहत मां बनने की स्थिति में एक निश्चित समयावधि तक महिला को छुट्टी मिलनी चाहिए साथ ही इस दौरान उसकी नौकरी जारी रहेगी और उसे वेतन भी प्राप्त होगा।

दहेज विरोधी कानून: दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत दहेज लेना और देना दोनों ही अपराध है। इसे 20 मई 1961 को लागू किया गया था।

गर्भपात कानून: 1971 के गर्भपात कानून के तहत किसी भी वजह से महिला का गर्भ किराना कानूनन जुर्म माना गया है। लेकिन इस कानून में कुछ कमियां होने के बाद अप्रैल 1972 में इसमें कुछ बदलाव कर इसे दोबारा मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1972 के नाम से लागू किया गया।

धरेलू हिंसा: घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण विधेयक, 2005 (2005 के 43) की धारा एक की उपधारा (3) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्रीय सरकार ने 26 अक्तूबर 2006 को लागू किया गया।