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Wednesday, 1 May 2024

 

आज 1 मई 2024 है..! एक मई, यानी मजदूर दिवस।

  रोजा लक्जमबर्ग ने कहा था, ‘ जिस दिन औरतों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी धोखाधड़ी पकड़ी जाएगी। हजारों वर्षों का वह अवैतनिक श्रम, जिसका न कोई क्रेडिट मिला, न मूल्य।’ 

हम जब भी श्रम , मेहनत   की बात करते हैं तो मर्द - आदमी का ख्याल आता है। आप सब ने सड़क किनारे , काम की जगहों  पर वह बोर्ड लगा देखा होगा, ‘मेन एट वर्क’," MEN AT WORK "  कहीं नहीं लिखा होता, ‘ वुमेन एट वर्क ’ या "  LGBTQIA+ एट वर्क "   । चाहे साइट पर काम कर रही मजदूर और इंजीनियर, दोनों औरतें ही क्यों न हों। मजदुर दिवस पर महिलाओं और अलग - अलग पहचान के लोगों ( LGBTQIA+: Abbreviation for Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Queer, Intersex, and Asexual. The additional “+” stands for all of the other identities not encompassed in the short acronym. An umbrella term that is often used to refer to the community as a whole.)  की मेहनत सामने नही आती ! 

 काम यानी मर्दानगी की बात।

पूरी दुनिया की सारी औरतों का समूचा मुफ्त घरेलू श्रम, जिसकी उन्‍हें कोई तंख्‍वाह नहीं मिलती, वह दुनिया के 50 सबसे ताकतवर मुल्कों की समूची जीडीपी के बराबर ठहरता है.

 तो आप एक नौकरीपेशा व्‍यक्ति हैं. आप सप्‍ताह में छह दिन रोज ऑफिस जाते हैं, काम करते हैं. इस काम के बदले में आपको क्‍या मिलता है? 
आप कहेंगे- “सैलरी.”                                                                                                                  लेकिन आपको सिर्फ सैलरी भर नहीं मिल रही. बस इतना ही नहीं है आपके श्रम का प्रतिदान. आपको और भी बहुत कुछ मिल रहा है, जिसके बारे में आपने शायद कभी सोचा भी न हो.

आपको अपनी नौकरी, जो कि एक सवैतनिक श्रम है, से ये  नीचे लिखी  सारी चीजें मिल रही हैं-

  • 1- आप दफ्तर में जो श्रम कर रहे हैं, वो इस देश की जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्‍ट) यानी सकल घरेलू उत्‍पाद में गिना जा रहा है.
  • 2- जीडीपी में हिस्‍सेदारी का अर्थ है, आपका श्रम देश की अर्थव्‍यवस्‍था को मापने में गिना जा रहा है.
  • 3- चूंकि आपका श्रम उत्‍पादक श्रम की श्रेणी में आता है और जीडीपी का हिस्‍सा है, इसलिए भारत सरकार के श्रम कानून उस पर लागू हो रहे हैं.
  • 4-आपके श्रम के लिए नियम-कानून और सुरक्षा के प्रावधान हैं.
  • 5- आपको बीमार पड़ने, घूमने, पिता बनने, मां बनने आदि के लिए छुट्टी मिल रही है क्‍योंकि आपका श्रम जीडीपी का हिस्‍सा है.
  • 6- आपको कई तरह के इंश्‍योरेंस, मेडिकल अलाउंस आदि मिल रहे हैं क्‍योंकि आपका श्रम जीडीपी का हिस्‍सा है.
  • 7- आपको सप्‍ताह, महीने और साल के निश्चित वैतनिक अवकाश मिल रहे हैं क्‍योंकि आपका श्रम जीडीपी का हिस्‍सा है.

हर वो श्रम, जो जीडीपी का हिस्‍सा है, उसके लिए तंख्‍वाह के अलावा नियम, कानून, छुट्टी, सुरक्षा के प्रावधान हैं.                                                                                              जो श्रम जीडीपी का हिस्‍सा नहीं, उस पर किसी संविधान और संहिता की कोई धारा, कोई कानून लागू नहीं होता.

इस देश की आधी आबादी यानी 50 करोड़ महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम पर सुविधा-सुरक्षा का कोई नियम लागू नहीं होता, क्‍योंकि वो श्रम जीडीपी का हिस्‍सा नहीं है.

ये सैलरी, जीडीपी, घरेलू श्रम, औरतें आदि का घालमेल आखिर है क्‍या ?  

अगर आप जानना चाह रही हैं / चाह रहे हैं तो आइए, इसे थोड़ा सलीके से समझते हैं.

‘फेमिनिस्‍ट इकोनॉमिक्‍स’ – क्‍या आपने कभी ये शब्‍द सुना है?

न्‍यूजीलैंड की अर्थशास्‍त्री और पॉलिटिकल एक्टिविस्‍ट मैरिलिन वैरिंग, जो ‘फेमिनिस्‍ट इकोनॉमिक्‍स’ की जनक मानी जाती हैं.

अगर आपने स्‍कूल-कॉलेज में इकोनॉमिक्‍स बतौर एक विषय पढ़ा है, तब भी इस बात की संभावना बहुत कम है कि आप इस शब्‍द से वाकिफ हों. आपने एडम स्मिथ को पढ़ा होगा, जॉन स्‍टुअर्ट मिल के सिद्धांत रटे होंगे, डेविड रिकॉर्डो और इरविंग फिशर को पढ़कर परीक्षा पास की होगी, लेकिन फेमिनिस्‍ट इकोनॉमिक्‍स और मैरिलिन वेरिंग का नाम शायद ही सुना हो.

मैरिलिन वैरिंग न्‍यूजीलैंड की अर्थशास्‍त्री और पॉलिटिकल एक्टिविस्‍ट हैं. मैरिलिन ‘फेमिनिस्‍ट इकोनॉमिक्‍स’ की जनक मानी जाती हैं. 1988 में उन्‍होंने एक किताब लिखी, ‘इफ विमेन काउंटेड’. अमेरिकन फेमिनिस्‍ट एक्टिविस्‍ट एंड राइटर ग्लोरिया स्टाइनम ने उस किताब की भूमिका लिखी थी. इस किताब को फेमिनिस्‍ट इकोनॉमिक्‍स की शुरुआत माना जा सकता है. इस किताब में उन्‍होंने पहली बार इस बात को विस्‍तार से आंकड़ों, तथ्‍यों और गणितीय विश्‍लेषण के साथ समझाने की कोशिश की कि अगर स्त्रियों का अवैतनिक श्रम जीडीपी का हिस्‍सा होता तो हमारी अर्थव्‍यवस्‍था कैसी होती. समाज में स्त्रियों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत कैसी होती. इस किताब में मैरिलिन लिखती हैं कि कैसे पूरी दुनिया की सारी औरतों का समूचा मुफ्त घरेलू श्रम, जिसकी उन्‍हें कोई तंख्‍वाह नहीं मिलती, वह दुनिया के 50 सबसे ताकतवर मुल्कों की समूची जीडीपी के बराबर ठहरता है.

मैरिलिन वैरिंग की किताब पर 1995 में टैरी नैश ने एक डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍म बनाई थी, जिसे उस साल के ऑस्‍कर अवॉर्ड से नवाजा गया था. फिल्‍म का नाम था- Who’s Counting? Marilyn Waring on Sex, Lies and Global Economics. 

फिल्म लिंक   https://www.youtube.com/watch?v=WS2nkr9q0VU

यूट्यूब पर ही मैरिलिन वैरिंग का एक टेड टॉक भी है, जिसमें वो इस अनपेड घरेलू श्रम की इकोनॉमिक्‍स को तरीके से समझाती हैं. मैरिलिन घरेलू श्रम के साथ स्त्रियों के उस श्रम की बात करती हैं, जो बच्चा पैदा करने, उसे दूध पिलाने, पालने-पोसने से जुड़ा है.

इस टॉक शो का लिंक https://www.youtube.com/watch?v=BrnZMrjsf6w

वो कहती हैं, “क्या आपको पता है कि आप अपने दुधमुंहे शिशु को जो दूध पिला रही हैं, वो जीडीपी का हिस्सा नहीं है. गाय, भैंस, भेड़, बकरी सबका दूध जीडीपी में गिना जाता है, लेकिन आपका नहीं.”

टैरी नैश की डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍म- Who’s Counting? Marilyn Waring on Sex, Lies and Global Economics का एक दृश्‍य. ये फिल्‍म यूट्यूब पर देख सकते हैं.

ये लिंक इसी फिल्म का हैं   https://www.youtube.com/watch?v=WS2nkr9q0VU 

पिछले साल सितंबर में नेशनल स्टैटिकल ऑफिस (एनएसओ) ने अपनी साल 2019 की रिपोर्ट जारी थी. यह रिपोर्ट कह रही थी कि एक भारतीय महिला प्रतिदिन 243 मिनट यानी चार घंटे घरेलू काम करती है, जबकि भारतीय पुरुष का यह औसत समय सिर्फ 25 मिनट है. यानी उसके आधे घंटे से भी कम घरेलू कामों में खर्च होते हैं.

समझने के लिए आंकड़ों को थोड़ा भीतर जाकर इसकी पड़ताल करते हैं. प्रतिदिन 243 मिनट घरेलू कामों में खर्च करने का मतलब है कि एक औरत अपने समूचे उत्पादक समय का 19.5 फीसदी हिस्सा घर के कामों में लगा रही है, जिसके लिए उसे कोई वेतन नहीं मिलता. जबकि पुरुष का यह प्रतिशत मात्र 2.3 है.

एनएसओ के आंकड़ों के मुताबिक वेतन वाली नौकरी के साथ-साथ 81 फीसदी औरतें घर के काम करती हैं, जबकि मात्र 26 फीसदी मर्दों की घरेलू कामों में हिस्सेदारी है. ये जनवरी से लेकर दिसंबर, 2020 तक के सर्वे का आंकड़ा है. कोविड और लॉकडाउन के बाद जब अचानक घरेलू काम की जिम्‍मेदारियां कई गुना बढ़ गईं तो जाहिर है औरतों के घरेलू श्रम का प्रतिशत और बढ़ गया होगा, जिसका इन आंकड़ों में कोई ज़िक्र नहीं है.

अब आते हैं संदर्भ और भूमिका पर.


औरत अपने समूचे उत्पादक समय का 19.5 फीसदी हिस्सा घर के कामों में लगा रही है, जिसके लिए उसे कोई वेतन नहीं मिलता. जबकि पुरुष का यह प्रतिशत मात्र 2.3 है.

सैकड़ों सालों से औरतों को बुनियादी इंसानी हक भी न देकर उन्‍हें रानी-महारानी और देवी का जो मूर्खतापूर्ण झुनझुना पकड़ाया गया है, 

 

श्रम यानी मर्दों का श्रम। कितने लोग जानते हैं कि ये जो पूरी दुनिया में मनाया जा रहा श्रम दिवस है, इसका श्रेय भी दरअसल औरतों को ही जाता है। इसी दिन कामगार औरतों ने काम के घंटे 8 करने के लिए लंबी समय से चल रही लड़ाई जीती थी। आज पूरी दुनिया में नौकरी के घंटे 8 हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि बाहर की नौकरी के घंटे तो 8 हो गए, तनख्वाह भी सुनिश्चित हो गई, रविवार की छुट्टी भी तय रही, बाकी कैजुअल लीव, मेडिकल लीव, प्रिवेलेज लीव भी। सबके लिए कानून भी बन गया, लेकिन आज भी एक नौकरी ऐसी है, जिसमें न कोई काम के घंटे निश्चित हैं, न कोई छुट्टी का दिन। न ही कोई सैलरी है और न कोई कानूनी अधिकार। यह श्रम है-घरेलू औरतों का अवैतनिक श्रम।


घरेलू श्रम करने वाली औरतों के बच्चे कहते हैं कि मेरी मां हाउस वाइफ है। उनके पति कहते हैं कि उनकी पत्नी कोई काम नहीं करती। ‘पापा क्या करते हैं’ के जवाब हमेशा गर्वीले और वजनदार होते हैं। पापा काम करते हैं, पापा का काम महत्वपूर्ण है। मां कुछ नहीं करती। हालांकि, वह घर में सबसे पहले सोकर उठती है और सबसे बाद में सोती है।                                                                  संडे के दिन, जब बाकी पूरा परिवार छुट्टी मना रहा होता है, मां डबल मेहनत करती है, लेकिन मां का वर्किंग स्टेटस है कि वह कुछ नहीं करती। दिन भर घर को घर बनाने, रोटी पकाने, बच्चों को पालने, उनको पढ़ाने, सिखाने, इंसान बनाने और घर के सब लोगों की देखभाल करने का स्त्री का श्रम कहीं दर्ज नहीं होता। न उसका वेतन मिलता है और न कोई आदर। कहीं ज्यादा काम की या थकान की शिकायत कर दे तो सुनने को मिलता है, ‘तुम करती क्या हो दिन भर’। आपके दिन भर की मेहनत के बाद अगर बाॅस कह दे कि आपने किया क्या है, तो आप किस कदर अपमानित महसूस करेंगे। औरतें भी करती हैं, बस कह नहीं पातीं। कानून की किताबों में उस श्रम का न कहीं जिक्र है, न उससे जुड़ा कोई कानूनी अधिकार।


कुछ साल पहले संसद में भी यह सवाल उठा था। औरतों के घरेलू श्रम को जीडीपी से जोड़ने का सवाल। उस श्रम की कीमत का सवाल। दुनिया की कोई मेहनत मुफ्त की मेहनत नहीं होनी चाहिए। उसे उसका मूल्य मिलना चाहिए। सवाल आया और चला गया। ज्यादा विचार नहीं हुआ इस पर, क्योंकि देश के लिए ये इतना जरूरी सवाल नहीं था शायद। आपके लिए भी नहीं है शायद। लेकिन अगली बार जब आप अपनी पत्नी या अपनी मां से कहें कि तुम दिन भर करती क्या हो, तो उस श्रम के बारे में जरूर सोचिएगा जिसने आपको इस लायक बनाया कि आप दुनिया में सिर उठाकर जी सकें। इज्जत पा सकें।                                                                                                   औरत के श्रम का मूल्य नहीं तो कम से कम उसे उसका श्रेय तो दीजिए। उसे इज्जत दीजिए। ये इनका अधिकार हैं . 

सभार - tv9 , bhaskar , Fii 

Saturday, 19 December 2020

FEMINISM AND IT'S IMPACT ON SOCIETY

 

Many researchers and scholars used the term “Feminism” and they tried to define and explain it differently. Some of them use it to refer to some historical political movements in USA and Europe. Whereas, others refer it to the belief that women live an injustice life with no rights and no equality Zara Huda Faris explained this idea, as: “ Women need feminism because there are women who suffer injustice 

The term " Feminism ‟ has a long history; it represents  women's  problems and suffering in addition to their dreams in equal opportunities in societies controlled by man i.e. his power, rules, wishes and orders. Lara Huda Faris added also: “ women have traditionally been dehumanized by a male dominated society, which they call patriarchy; and that has been always better to be a man

The term feminism has a history in English linked with women's activism from the late 19th century to the present, it is useful to distinguish feminist ideas or beliefs from feminist political movements, for even in periods where there has been no significant political activism around women's subordination, individuals have been concerned with and theorized about justice for women.

Despite of the painful segregation and the hard inequality, women were able to stand up each time and they were able to speak and express their problems, feelings and wishes. In addition, women were able to spread it in all over the world, make it a symbol of equality, and make all people believe that men and women deserve equality in all opportunities, treatments respect and social rights.

 The term Feminism appeared in France in the late of 1880s by Hunburtine Auclert in her Journal La Citoyenne as La Feminitè where she tried to criticize male domination and to claim for women's rights in addition to the emancipation promised by the French revolution.

By the first decade of the twentieth century, the term appeared in English first in Britain and then in 1910s in America and by 1920s in the Arab World as Niswia. Feminism originates from the Latin word femina that describes women's issues.Feminism is concerned with females not just as a biological category, but the female gender as a social category, and therefore feminists shared the view that women's oppression tied to their sexuality. This was so because women and men's biological differences reflected in the organization of society, and based on these differences, women have treated as inferior to men. Whether as a theory, a social movement or a political movement, feminism specifically focuses on  women's experiences and highlights various forms of oppression that the female gender has subjected in the society. During a long period in history, woman was not considered as equal citizens, they suffered from bad treatments, discrimination and racism under man domination and rules. In spite these problems, they could challenge them and prove themselves over the society.

Woman in the past was living unequal and unfair life. She was prevented from doing any political, social and economical activities and her only job is being a housewife who takes care of home and children. At that time, woman was under the control of man who dominates all the fields in which he represents the symbol of power.

After all those problems, suffering and misery woman in the entire world started to find ways to improve herself and to change her position in life. They tried also to join their efforts, dreams and wishes to form a universal idea that speaks about all women in any place in the world this leads to the appearance of Feminism.

By the coming of Feminism, woman was able take back her rights in addition to changing her negative image. Feminism proves that woman is capable to play important roles the same as man. Moreover, the most important goals of Feminism were giving woman her total freedom in addition to equal opportunities in the representation of the political and social events.

This modest work tries to give an over view of Feminism and how it developed from being an idea or a belief to becoming a theory with standard goals and principles.

The first chapter of this work was theoretical, in which we presented the definition of Feminism in addition to its origin and its different types. It presents also some famous waves of Feminism in which it tackled the famous leaders of each one of them and more importantly, it gives its principles and goals. This chapter speaks also about the suffering of Muslim and Black woman.

The second chapter indeed gives more importance to role of woman and her achievements in the political, social and the economical fields. It shows also the status and the role of woman in the decisions making in addition to restating the common  obstacles that can any woman face when looking for her rights. This article contains the best examples of Feminism success that are a group of woman leaders mainly in politics, society and science.

 The key message of feminism in the 21st century society should highlight choice in bringing a personal meaning to feminism is to recognize  others’ right to do the exact same thing. Women all over the world nationally, regionally and globally should be able to embrace this powerful message of feminism and be able to create a positive meaning of their own womanhood and femininity. However, despite feminism being a strong successful movement, inequality and exploitation of women still exist and sadly there are women today, who are trapped in a society which doesn’t value them and leaves them neither choice nor freedom to express their views and rights.

शिवानी  मिश्रा 

शोध अध्येता - वाणिज्य संकाय परिसर,

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, 

गोरखपुर उत्तर प्रदेश, 273001

Note - इस लेख के संदर्भ में कोई भी प्रश्न आप सब शिवानी  मिश्रा जी से कमेंट बॉक्स में लिख कर पूछ सकते हैं। 


Sunday, 13 December 2015

यह वीडियो विद्रोही को श्रद्धांजलि है

हाल ही में दिवंगत हुए जनकवि रमा शंकर यादव ‘विद्रोही’ को उनके कुछ प्रशंसकों ने अनूठे अंदाज में श्रद्धांजलि दी है.
विद्रोही जेएनयू में रहते थे और जेएनयू उनमें रहता था. उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे रमा शंकर यादव पढ़ाई के लिए दिल्ली के इस विश्वविद्यालय में आए तो फिर यहीं के होकर रह गए. यहीं उन्हें विद्रोही उपनाम मिला और यहीं से उनकी कविताएं निकलीं. साहित्यिक हलकों में अनजान लेकिन छात्रों और कविता प्रेमियों के बीच मशहूर इस फक्कड़ कवि का आठ दिसंबर को 58 साल की उम्र में निधन हो गया.
सवाल उठाने वाली परंपरा की जो धारा जेएनयू की पहचान रही है विद्रोही उसके जीवंत प्रतीक थे. जेनएनयू में हर साल आने वाले एक चौथाई नए छात्रों के लिए वे पुराने संघर्षों की जीती-जागती मिसाल रहे. उनका जाना भी इस परंपरा के मोर्चे पर ही हुआ. वे वैसे ही गए जैसे जनकवि जाते हैं. मुट्ठियां ताने हुए.
उस दिन विद्रोही दिल्ली में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दफ्तर के सामने सरकार की शिक्षा नीतियों के विरोध में हो रहे धरना-प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचे थे. दोपहर बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. वहां पर मौजूद लोगों ने उन्हें फौरन अस्पताल पहुंचाया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
साहित्यिक हलकों में विद्रोही भले ही वे अनजान थे, लेकिन छात्रों और कविता प्रेमियों के बीच खासे मशहूर. वे कबीर और अदम गोंडवी की परंपरा के अनुयायी थे.
विद्रोही वाचक परंपरा के कवि थे. खुद को नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरूदा और कबीर की परंपरा से जोड़ने वााले इस कवि को अपना रचनाकर्म जुबानी याद था. उन्होंने कभी अपनी कविताओं को लिखा नहीं. यह काम उनके मुरीदों ने किया. विद्रोही के ऐसे ही कुछ प्रशंसकों ने उन्हें एक अनूठे वीडियो के जरिये श्रद्धांजलि दी है. उनकी चार चर्चित कविताएं इस वीडियो का हिस्सा हैं.
इस वीडियो के सूत्रधार और दिल्ली आर्ट फाउंडेशन के संस्थापक प्रत्युष पुष्कर कहते हैं, ‘मैं भी जेएनयू में ही पढ़ा हूं. विद्रोही जी से बहुत करीब का नाता था. तीन साल पहले पढ़ाई पूरी करके वहां से निकल गया था. फिर अपने काम में व्यस्त हो गया. इस बीच कई बार सोचा, लेकिन उनसे मिलना नहीं हो पाया. फिर अचानक उनके जाने की खबर सुनी बहुत धक्का लगा. वे जितने सक्रिय रहते थे उसे देखते हुए सोचा नहीं था कि वे अचानक यूं चल देंगे.’ वे आगे कहते हैं, ‘मन में बहुत बेचैनी थी.
सभार - सत्याग्रह 

Thursday, 1 October 2015

दादरी मोहम्मद अख़लाक़ की मौत - इंसानियत हार रही है


बिसाहड़ा गांव , दादरी में जो कुछ हुआ उसके बाद मन अभी तक शांत नहीं हुआ है बेचैनी सी बनी हुई है। मुझे 2011 का वक़्त याद आ गया जब मैंने सहारनपुर के मुजफ्फराबाद ब्लॉक के गावों में बजरंग दल के नेता अजय चौहान  द्वारा लिखवाई वाल राइटिंग देखी थी ( शेयर कर रहा हूँ ) जो गौ हत्या और लव जेहाद पर थी। 

जिसे हिन्दुओं के लिए खतरा बताया जा रहा था। उस समय भी यह सब पढ़ कर देख कर मन उदाश हुआ था ! वहां के लोगों से हमने इस तरह के दीवाल लेखन के बारे में  पुछा तो बतलाया गया कि  दीवाल लेखन सैकड़ों की तादात में पूरे मुजफ्फराबाद ब्लॉक के गावों में  किआ गया हैं।  नतीजा सामने है  मुज़फ्फरनगर , सहारनपुर के दंगे के रूप में और दादरी में जो कुछ हुआ उससे में काफी निराश हूँ. 
मुझे  मुहाजिर नाम से प्रसिद्ध शायर मुनव्वर राणा का एक शानदार शेर याद आ रहा है 
 ‘ ये देखकर पतंगे भी हैरान हो गईं, अब तो छतें भी  हिंदू-मुसलमान हो गईं ’

रवीश जी का लिखा लेख आप सब को शेयर कर रहा  हूँ ( क़स्बा से साभार ) 



तना सब कुछ सामान्य कैसे हो सकता है ? बसाहडा गाँव की सड़क ऐसी लग रही थी जैसे कुछ नहीं हुआ हो और जो हुआ है वो ग़लत नहीं है । दो दिन पहले सैंकड़ों की संख्या में भीड़ किसी को घर से खींच कर मार दे । मारने से पहले उसे घर के आख़िरी कोने तक दौड़ा ले जाए । दरवाज़ा इस तरह तोड़ दे कि उसका एक पल्ला एकदम से अलग होने के बजाए बीच से दरक कर फट जाए। सिलाई मशीन तोड़ दे। सिलाई मशीन का इस्तमाल मारने में करे । ऊपर के कमरे की खिड़की पर लगी ग्रील तोड़ दे । उस भीड़ में सिर्फ वहशी और हिंसक लोग नहीं थे बल्कि ताक़तवर और ग़ुस्से वाले भी रहे होंगे । खिड़की की मुड़ चुकी ग्रील बता रही थी कि किसी की आंख में ग़ुस्से का खून इतना उतर आया होगा कि उसने दाँतों से लोहे की जाली चबा ली होगी । भारी भरकम पलंग के नीचे दबी ईंटें निकाल ली गई थी ।
कमरे का ख़ूनी मंज़र बता रहा था कि मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या में शामिल भीड़ के भीतर किस हद तक नफरत भर गई होगी । इतना ग़ुस्सा और वहशीपना क्या सिर्फ इस अफवाह पर सवार हो गया होगा कि अख़लाक़ ने कथित रूप से गाय का माँस खाया है । यूपी में गौ माँस प्रतिबंधित है लेकिन उस कानून में यह कहाँ लिखा है कि मामला पकड़ा जाएगा तो लोग मौके पर ही आरोपी को मार देंगे । आए दिन स्थानीय अखबारों में हम पढ़ते रहते हैं कि भीड़ ने गाय की आशंका में ट्रक घेर लिया । यह काम तो पुलिस का है । पुलिस कभी भी कानून हाथ में लेने वाली ऐसी भीड़ पर कार्रवाई नहीं करती ।
बसेहड़ा गाँव के इतिहास में सांप्रदायिक तनाव की कोई घटना नहीं है । गाँव में कोई हिस्ट्री शीटर बदमाश भी नहीं है । मोहम्मद अख़लाक़ और उनके भाई का घर हिन्दू राजपूतों के घरों से घिरा हुआ है । यह बताता है कि सबका रिश्ता बेहतर रहा होगा । फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि एक अफवाह पर उसे और उसके बेटे को घर से खींच कर मारा गया । ईंट से सर कूच दिया गया । बेटा अस्पताल में जिंदगी की लड़ाई लड़ रहा है । उसकी हालत बेहद गंभीर है ।
हर जगह वही कहानी है जिससे हमारा हिन्दुस्तान कभी भी जल उठता है । लाउडस्पीकर से एलान हुआ । व्हाट्स अप से किसी गाय के कटने का वीडियो आ गया । एक बछिया ग़ायब हो गई । लोग ग़ुस्से में आ गए । फिर कहीं माँस का टुकड़ा मिलता है । कभी मंदिर के सामने तो कभी मस्जिद के सामने कोई फेंक जाता है । इन बातों पर कितने दंगे हो गए । कितने लोग मार दिए गए । हिन्दू भी मारे गए और मुस्लिम भी । हम सब इन बातों को जानते हैं फिर भी इन्हीं बातों को लेकर हिंसक कैसे हो जाते हैं । हमारे भीतर इतनी हिंसा कौन पैदा कर देता है ।
दादरी दिल्ली से बिल्कुल सटा हुआ है । बसेहड़ा गाँव साफ सुथरा लगता है । ऐसे गाँव में हत्या के बाद सब कुछ सामान्य हो जाएगा ये बात मुझे बेचैन कर रही है । आस पास के लोग कैसे किसी की सामूहिक हत्या की बात पचा सकते हैं । शर्म और बेचैनी से वे परेशान क्यों नहीं दिखे ? भीड़ बनने और हत्यारी भीड़ बनने के ख़िलाफ़ चीख़ते चिल्लाते कोई नहीं दिखा । जब मैं पहुँचा तो गाँव नौजवानों से ख़ाली हो चुका था ।
लोग बता रहे थे कि लाउडस्पीकर से एलान होने के कुछ ही देर बाद हज़ारों लोग आ गए । मगर वो कौन थे यह कोई नहीं बता रहा । सब एक दूसरे को बचाने में लगे हैं । यह सवाल पूछने पर कि वो चार लोग कौन थे सब चुप हो जाते हैं । यह सवाल पूछने पर उन चार पाँच लड़कों को कोई जानता नहीं था तो उनके कहने पर इतनी भीड़ कैसे आ गई, सब चुप हो जाते हैं । अब सब अपने लड़कों को बीमार बता रहे हैं । दूसरे गाँव से लोग आ गए । हज़ारों लोग एक गली में तो समा नहीं सकते । गाँव भर में फैल गए होंगे । तब भी किसी ने उन्हें नहीं देखा । जो पकड़े गए हैं उन्हें निर्दोष बताया जा रहा है ।
जाँच और अदालत के फ़ैसले के बाद ही किसी को दोषी माना जाना चाहिए लेकिन हिंसा के बाद जिस तरह से पूरा गाँव सामान्य हो गया है उससे लगता नहीं कि पुलिस कभी उस भीड़ को बेनक़ाब कर पाएगी । वैसे पुलिस कब कर पाई है । माँस गाय का था या बकरी का फ़ोरेंसिक जाँच से पता चल भी गया तो क्या होगा । जनता की भीड़ तो फ़ैसला सुना चुकी है । अख़लाक़ को कूच कूच कर मार चुकी है । अख़लाक़ की दुलारी बेटी अपनी आँखों के सामने बाप के मारे जाने का मंज़र कैसे भूल सकती है । उसकी बूढ़ी माँ की आँखों पर भी लोगों ने मारा है । चोट के गहरे निशान है ।
दादरी की घटना किसी विदेश यात्रा की शोहरत या चुनावी रैलियों की तुकबंदी में गुम हो जाएगी । लेकिन जो सोच सकते हैं उन्हें सोचना चाहिए । ऐसा क्या हो गया है कि हम आज के नौजवानों को समझा नहीं पा रहे हैं । बुज़ुर्ग कहते हैं कि गौ माँस था तब भी सजा देने का काम पुलिस का था । नौजवान सीधे भावना के सवाल पर आ जाते हैं । वे जिस तरह से भावना की बात पर रिएक्ट करते हैं उससे साफ पता चलता है कि यह किसी तैयारी का नतीजा है । किसी ने उनकी दिमाग़ में ज़हर भर दिया है । वे प्रधानमंत्री की बात को भी अनसुना कर रहे हैं कि सांप्रदायिकता ज़हर है ।
मेरे साथ सेल्फी खींचाने आया प्रशांत जल्दी ही तैश में आ गया । ख़ूबसूरत नौजवान और पेशे से इंजीनियर । प्रशांत ने छूटते ही कहा कि किसी को किसी की भावना से खेलने का हक नहीं है । हमारे सहयोगी रवीश रंजन ने टोकते हुए कहा कि माँ बाप से तो लोग ठीक से बात नहीं करते और भावना के सवाल पर किसी को मार देते हैं । अच्छा लड़का लगा प्रशांत पर लगा कि उसे इस मौत पर कोई अफ़सोस नहीं है । उल्टा कहने लगा कि जब बँटवारा हो गया था कि हिन्दू यहाँ रहेंगे और मुस्लिम पाकिस्तान में तो गांधी और नेहरू ने मुसलमानों को भारत में क्यों रोका । इस बात से मैं सहम गया । ये वो बात है जिससे सांप्रदायिकता की कड़ाही में छौंक पड़ती है ।
प्रशांत के साथ खूब गरमा गरम बहस हुई लेकिन मैं हार गया । हम जैसे लोग लगातार हार रहे हैं । प्रशांत को मैं नहीं समझा पाया । यही गुज़ारिश कर लौट आया कि एक बार अपने विचारों पर दोबारा सोचना । थोड़ी और किताबें पढ़ लो लेकिन वो निश्चित सा लगा कि जो जानता है वही सही है । वही अंतिम है । आख़िर प्रशांत को किसने ये सब बातें बताईं होंगी ? क्या सोमवार रात की भीड़ से बहुत पहले इन नौजवानों के बीच कोई और आया होगा ? इतिहास की आधू अधूरी किताबें और बातें लेकर ? वो कौन लोग हैं जो प्रशांत जैसे नौजवानों को ऐसे लोगों के बहकावे में आने के लिए अकेला छोड़ गए ? खुद किसी विदेशी विश्वविद्यालय में भारत के इतिहास पर अपनी फटीचर पीएचडी जमा करने और वाहवाही लूटने चले गए ।
हम समझ नहीं रहे हैं । हम समझा नहीं पा रहे हैं । देश के गाँवों में चिंगारी फैल चुकी है । इतिहास की अधकचरी समझ लिये नौजवान मेरे साथ सेल्फी तो खींचा ले रहे हैं लेकिन मेरी इतनी सी बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि वो हिंसक विचारों को छोड़ दें । हमारी राजनीति मौकापरस्तों और बुज़दिलों की जमात है । दादरी मोहम्मद अख़लाक़ की मौत कवर करने गया था । लौटते वक्त पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि एक और लाश के साथ लौट रहा हूँ ।

रवीश जी की NDTV की रिपोर्ट इस लिंक को क्लिक कर के देखें 

http://khabar.ndtv.com/video/show/prime-time/prime-time-a-man-killed-due-to-rumor-385050?pfrom=home-khabar





  

 


Sunday, 1 December 2013

कार्यस्थल पर लैंगिक समानता

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न रोकने के कानून विशाखा निर्देशिका
सर्वोच्च न्यायालय का 1997 में विशाखा मामले में दिया गया फैसला मील का पत्थर बन गया है। इसके तहत न्यायालय ने सभी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को निर्देर्शित किया कि वे अपने यहां महिलाओं के साथ यौन र्दुव्‍यवहार या उत्पीड़न रोकने और उनके निबटारे के लिए एक समिति का गठन करे, जिसमें महिलाओं का अनुपात अधिक हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यौन उत्पीड़न को परिभाषित भी किया, जिसके अंतर्गत शारीरिक सम्पर्क और इसके लिए की जाने वाली कोशिश यौन सम्पर्क के लिए की गई मांग या अनुरोध कामुक प्रतिक्रियाएं अश्लील चित्र दिखाना अन्य कोई भी अवांछित कामुक प्रकृति का शारीरिक, मौखिक और अ-मौखिक व्यवहार या आचरण हालांकि इस परिभाषा के दार्यो में आने वाले यौन उत्पीड़न के मामलों के निबटारे के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कोई समय सीमा नहीं तय की। दोष साबित होने पर दंड के प्रावधानों को भी समिति के ही विवेक पर छोड़ दिया इसके लगभग 16 साल बाद, 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की विदारक घटना और उसके विरुद्ध में उठ खड़े देश ने समूचे परिदृश्य को एकदम से बदल कर रख दिया। इसने महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा की तरफ पूरे अवाम का ध्यान खींचा और नतीजतन, यौन उत्पीड़न की परिभाषा को और व्यापक करते हुए जुर्मो की संगीनता के मुताबिक सख्त सजा के प्रावधान वाले कानून की जरूरत महसूस की गई।

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (बचाव, रोकथाम और निबटान) कानून-2013 
इस नये कानून में विशाखा मामले में यौन उत्पीड़न के पांच प्रकारों को बढ़ाते हुए निम्नलिखित आचरणों को भी शामिल किया गया- कार्यस्थल पर प्रकट या अप्रकट पक्षपातपूर्ण या हानिकारक वादे महिलाकर्मी की मौजूदा या भविष्य की हैसियत के बारे में प्रकट या अप्रकट दी गई धमकी महिलाकर्मियों के काम में अनुचित दखल अथवा कार्यस्थल के वातावरण में डर, शत्रुता और हमले के प्रति भय पैदा करना ऐसा अपमानजनक व्यवहार जिससे कि महिला सहकर्मियों की सेहत और उनकी सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़े अन्य प्रावधान यह कानून जम्मू -कश्मीर समेत देश के सभी राज्यों में समान रूप से लागू इसके विस्तृत दार्यो में असंगठित क्षेत्र को भी लाया गया ‘कार्यस्थल’ की परिभाषा को व्यापक करते हुए इसमें खेल संस्थान, स्टेडियम आदि को भी समाहित किया गया। यहां तक कि घरेलू कामगारों के लिए घरों तक को उनका कार्यस्थल माना गया उन जगहों को भी ‘कार्यस्थल’ के रूप में परिभाषित किया गया, जहां कोई कर्मी अपने काम के सिलसिले में जाता है कार्यस्थलों पर यौन र्दुव्‍यवहार के मामलों के निबटारे के लिए दो संस्थाएं गठित करने का प्रावधान किया गया; एक नियोक्ता के लिए. दूसरा, असंगठित क्षेत्रों में हस्तक्षेप के अधिकार के साथ एक जिला शिकायत समिति का गठन विशाखा निर्देशिका के विपरीत, इस नये कानून में शिकायतों पर सुनवाई 90 दिनों के भीतर पूरी करने की ताकीद की गई है मजबूत कानूनी कवच तहलका के संस्थापक व सम्पादक तरुण तेजपाल पर उनके सहकर्मी के साथ बलात्कार के प्रयास का आरोप है। वहीं इसके पहले, सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश पर दो प्रशिक्षु महिला वकीलों के यौन उत्पीड़न का आरोप है। दो नामी-गिरामी शख्सियतों पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के इन दोनों मामलों ने मसले को बहस का विषय बना दिया है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अगर ये घटनाएं 2013 के पहले हुई रहतीं तो इन पर सुनवाई विशाखा मामले में 13 अगस्त 1997 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई निर्देशिका के मुताबिक की जाती। लेकिन माननीय न्यायालय ने तभी तय कर दिया था कि इसकी जगह कोई सक्षम कानून लेने के पहले तक ही विशाखा निर्देशिका के तहत मामलों को निबटारा किया जा सकेगा। चूंकि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न ( बचाव, रोकथाम और निबटान) कानून-2013 बन चुका है, लिहाजा, अब इसी के मुताबिक शिकायतों की सुनवाई और उसमें सजा का प्रावधान किया जा सकेगा। कानूनविदें की राय में नया कानून सम्पूर्ण और यौन र्दुव्‍यवहारों-उत्पीड़नों के विरुद्ध ज्यादा सख्त है।
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शासन व्यवस्थाओं ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को गंभीरता से लेना शुरू किया है। ऐसे कानून बनाए जो कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए सुरक्षित कामकाजी माहौल सुनिश्चित करते हैं। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून होने की जरूरत को महसूस करते हुए 1997 में विशाखा दिशा-निर्देश तय किए थे। सोलह साल बाद संसद ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (बचाव, रोकथाम और समाधान ) कानून-2013 पारित किया।
 कानून के तहत शारीरिक सम्पर्क समेत कोई अप्रिय कार्य या बर्ताव और इस प्रकार के प्रयास करने, यौन संबंध बनाने को कहने या इस बाबत मांग करने, कामुकता दर्शाते रंगीन चिह्न बनाने, अश्लील चित्र दिखाने; या कामुक प्रवृत्ति का कोई अप्रिय शारीरिक, वाचिक या गैर-वाचिक व्यवहार करने के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के प्रावधान उल्लिखित हैं।
शिकायत समिति कानून में व्यवस्था की गई है कि नियोक्ताओं को ‘लिखित आदेश जारी करते हुए’
क आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना चाहिए। इसका अध्यक्ष किसी वरिष्ठ महिला कर्मी को बनाया जाना चाहिए। समिति में कम से कम दो ऐसे कर्मचारी शामिल किए जाने चाहिए जो ‘महिलाओं के मुद्दों को लेकर प्रतिबद्ध रहे हों’ या जिन्हें कानूनी जानकारी और सामाजिक कार्य का अनुभव हो। समिति में एक सदस्य किसी गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) या महिलाओं संबंधी कार्यकलाप में सक्रिय किसी संगठन से संबद्ध या ‘यौन उत्पीड़न से संबंधित मुद्दों की जानकारी रखने वाला व्यक्ति’ होना चाहिए। कमेटी में एक तिहाई सदस्य महिलाएं होनी चाहिए। इस कानून की धारा 6 के मुताबिक, जिलों में स्थानीय शिकायत समितियां गठित की जानी चाहिए। उन्हें उन प्रतिष्ठानों से शिकायत प्राप्त करने का दायित्व सौंपा जाना चाहिए; जहां दस से कम कामगार कार्यरत हैं और महिला कामगार भी नियोजित हैं। यह व्यवस्था इसलिए की गई है क्योंकि ऐसे प्रतिष्ठान अपने स्तर पर आंतरिक समिति का गठन नहीं कर सकते। जिला स्तरीय समिति को ऐसी शिकायत प्राप्त करने का दायित्व भी सौंपा गया जिनमें खुद नियोक्ता के खिलाफ कुछ बात कही गई हो या आरोप लगाया गया हो। इस प्रकार, संगठित और असंगठित क्षेत्र, दोनों जगहों पर महिला कामगार अब सुरक्षित हैं।
कम से कम कागजों पर तो सुरक्षित हैं ही। तो फिर जज द्वारा उत्पीड़ित किए जाने पर लॉ इंटर्न शिकायत दर्ज कराने का साहस क्यों नहीं बटोर पाई? आखिर उसकी तरह ही तमाम महिलाएं चुपचाप अपने साथ होने वाले गलत बर्ताव को क्यों झेलती हैं? इनमें से अधिकतर तो हमेशा ही उत्पीड़न का शिकार होती रहती हैं। पक्की बात है कि एक मामला प्रकाश में आता है तो उसके साथ ही सैकड़ों मामले ऐसे होते हैं जिनकी कोई शिकायत नहीं मिलती। कहा जाता है कि सबूत का अभाव कतई भी अभाव का सबूत नहीं होता। समाज का नजरिया महिलाएं शिकायत करने से क्यों बचती है ? इसका जवाब पाने के लिए जरूरी है यह जानना कि एक कामकाजी महिला को समाज किस नजरिए से देखता है। असंगठित क्षेत्र में नियोजित या एक-अकेली महिला आर्थिक रूप से समस्या से घिरी रहती है। ऐसी ज्यादातर महिला कामगारों को कानूनों की जानकारी नहीं होती। उनके नियोक्ता और पुरुष सहकर्मी जानते हैं कि वे बेरोजगार होने का जोखिम नहीं उठा सकतीं। दुकानों, सुपर मार्केट्स, निजी स्कूलों, अस्पतालों और सेल्स गर्ल के तौर पर काम करने वाली महिलाओं की हालत भी कोई खास अलग नहीं है। यदि वह हालत सहन करने योग्य नहीं रहती या कहें कि पानी सिर से ऊपर चढ़ने लगे तो वे जॉब छोड़ देती हैं। जो नहीं छोड़ पातीं वे अपने स्थानांतरण का प्रयास करती हैं या फिर उत्पीड़न के साथ ही रहना सीख जाती हैं। कटु सत्य यह है कि जरूरत उनकी सहन शक्ति को बढ़ा देती है। अनेक महिलाएं खुद को समझा लेती हैं कि दुनिया ऐसे ही चलती है। दुनिया की यही रीत है और उनके पास कोई चारा नहीं है। किन्हीं दुर्लभ हालात में महिलाएं शिकायत करती भी हैं तो उन्हें अपने सहकर्मियों से समर्थन नहीं मिल पाता। नियोक्ता कभी भी ‘दिक्कत’ वाली महिला कामगार को लेकर सहज नहीं होते। वे कहीं गहरे पैठी इस धारणा के बल पर उसे नौकरी छोड़ने को प्रेरित करते हैं कि पुरुष को नौकरी की कहीं ज्यादा जरूरत होती है। समाज की धारणा यह धारणा समाज में चहुंओर फैली है कि पुरुष अपनी आजीविका अर्जित करता है जबकि महिला ऐसा अपने परिवार की आय में बढ़ोतरी करने के लिए करती है। चूंकि ज्यादातर कॉरपोरेट कार्यालयों में अधिकतर कर्मचारी पुरुष होते हैं, इसलिए वे अपने वर्चस्व को ईष्र्या की हद तक बचाए रखने में जुटे रहते हैं। यहां तक कि यह जानते हुए भी कि उनके पुरुष सहकर्मी का अपनी महिला सहकर्मी के साथ व्यवहार उचित नहीं है, वे खुलकर सामने आने में हिचकते हैं। इस प्रकार उत्पीड़न का शिकार महिला अकेले पड़ जाती है। एक ऐसे समाज में जहां महिला की सुरक्षा उसकी खुद की जिम्मेदारी है-उसे ‘सिखाया’ जाता है कि कपड़े इस प्रकार पहने कि पुरुष ‘उकसा’ न पाएं और लम्पट फब्तियों को ‘अनदेखा’ करे-कामुक चिह्नों या कही गई कामुक बातों को शायद ही उत्पीड़न जैसा काम माना जाता है।
कोई महिला इन बातों की शिकायत करती भी है तो उस पर तिल का पहाड़ बनाने का आरोप जड़ दिया जाता है। इसलिए ताज्जुब नहीं कि तेजपाल ने कहा है कि नशे में ‘हल्की-फुल्की मस्ती’ को उनकी सहयोगी समझ नहीं पाई-जैसे कि नशे में किसी व्यक्ति द्वारा कुछ भी गलत-सलत किया जाना सिरे से ठीक है। नहीं बदली स्थिति जाहिर है कि 1988 के बाद से कुछ भी नहीं बदला है जब एक आईएएस अधिकारी खुद से र्दुव्‍यवहार किए जाने पर पुलिस अधिकारी केपीएस गिल को अदालत तक खींच ले गई थीं। गिल को आईपीसी की धारा 354 (किसी महिला के साथ छेड़छाड़) और धारा 509 (बोलकर, भाव-भंगिमा या कार्यकलाप से किसी महिला का अपमान करना) के तहत दोषी माना गया। उन्हें मामूली सजा-प्रोबेशन (ऐहतियाती बर्ताव रखने) और आर्थिक दंड-दी गई। दूसरी तरफ, उस महिला अधिकारी की मीडिया ने यह कहते हुए खासी आलोचना की कि उन्होंने ‘बात का बतंगड़’ बना दिया। जब कोई महिला यौन उत्पीड़न की शिकायत लेकर आती है तो ज्यादातर नियोक्ता मामले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश करते हैं, आरोपित का स्थानांतरण कर देते हैं या उसे माफी मांगने को कहते हैं। आईएफएफआई के दौरान घटी घटना में यही सब हुआ। आरोपित अधिकारी को ‘बिना शर्त माफी मांगने’ के बाद दिल्ली भेज दिया गया। अधिकतर मामलों में पीड़ित महिलाओं के लिए आरोपों को साबित करना आसान नहीं होता। यही बड़ा कारण है कि ज्यादातर महिलाएं पुलिस से शिकायत नहीं करतीं और आंतरिक समिति के फैसले से ‘संतुष्ट’ हो जाती हैं।

दिल्ली में रेप मामले एक साल में दोगुने बीते साल दिसम्बर माह में 23 वर्षीय फीजियोथेरेपी की छात्रा के साथ लोकल बस में हुए बलात्कार और हत्या के बाद से भारत की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले करीब-करीब दोगुने हो गए हैं छात्रा के रेप और हत्या के बाद देश भर में फैले आक्रोश के बावजूद लगता है कि राजधानी दिल्ली में अपराधियों के मन में डर नहीं समाया सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते दस माह में जनवरी के बाद से दिल्ली में रेप के 1,330 मामले प्रकाश में आए बीते वर्ष 2012 की इसी अवधि के दौरान इनकी संख्या 706 दर्ज की गई थी यौन हमलों की संख्या में भी खासा इजाफा दर्ज किया गया। जनवरी, 2012 के बाद की दस माह की अवधि के दौरान यौन हमलों के 727 मामले दर्ज किए गए थे, जो इस वर्ष इसी अवधि के दौरान तीन गुना बढ़कर 2844 हो गए सरकार की ओर से ये आंकड़े सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने पर शीर्ष अदालत ने महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा के मामलों पर गहरी चिंता जताई थी महिला अधिकारों की अग्रणी कार्यकर्ता रंजना कुमारी के मुताबिक, ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा की लचर स्थिति को उजागर करते हैं उनके मुताबिक, सामाजिक और पुरुषवादी मानसिकता में बदलाव आने में अभी समय लगेगा। तब तक इस प्रकार के अपराध करने वालों को कड़ा दंड देने की जरूरत है महिला हिंसा के दोषियों को सख्त दंड दिए जाने से उन तक यह संदेश जाएगा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा बर्दाश्त नहीं होगी।

मैथिली सुंदर , वरिष्ठ पत्रकार 

Wednesday, 14 August 2013

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...



च्छा लगता है बच्चों को आज के दिन खुश देख कर , तिरंगा खरीदने की जिद्द करते हुए। उन के लिए यह एक उत्सव है। होना भी चाहिए ..वो सब !! 
 मतलब बोले तो सभी बच्चे  !! हर प्रकार के  फ़िक्र से परे है !! मतलब सब  फ़िक्र से परे  ..उन्हे क्या पता बी जे पी - कांग्रेश का  चुनावी एजेंडा क्या है ? जिंदल क्यूँ boxit निकालने के लिए पहाड़ ले रहा है , क्यूँ बड़े बाँध के लिए लोग बिस्थापित किए जा रहें हैं ? मनरेगा का रुपिया जो की हमारे टैक्स का रुपिया है कहाँ जा रहा है ? मंदिर जरूरी है या अस्पताल , जिन्दा रहना जरूरी है या लड़ना। 

और हम सब भी गज़ब हैं  ..बढ़े होते संतान को घर वाले क्या  समझाते है - पढो की जल्दी नौकरी  मिल जाए , क्या करो की सब काबू मे रहे  .पर  घर/ समाज / देश की राजनीति पर कोई समझ बनाने के लिए कोई प्रयास  नहीं ! 
क्या बात है !! और फ़िर सब तथाकथित चिन्तक लोगों को लगता है की घर/देश/समाज मे  सब गड़बड़ हो रहा है ।  

बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले !

भारत माँ की चिंता , भारत माँ के इज्जत की चिंता , उस के चारो ओर  के दीवार / सीमा के सुरक्षा की चिंता।  इसी चिंता के कारण देश का रक्षा बजट बढ़ता जा रहा है और शिक्षा , स्वस्थ्य पर सब्सिडी काम होती जा रही है।  

सम से माँ रूपी देश की चिंता करते - करते हम अब घर में मौजूद  लड़की - औरत  के शरीर की चिंता  करने लगे हैं  और इनको भी दीवाल और सीमा मे बाँध देने के नियम और परम्परा बना दिए हैं।  कोई फर्क नहीं तथाकथित भारत माँ ! और घर की माँ-औरत -लड़की मे।   यह की इसी सीमा के अंदर वो कहने को सुरक्षित हैं क्यों कि महिलाओं का शरीर इसी सीमा के अंदर भेदभाव झेलता है , हिंसा सहता  है , गाली सुनता है 
 सीमा से बाहर तो सीता जेसा हाल  !! और सुरक्षा का ठेका लक्ष्मन-आदमी- मर्द-भाई-हथियार से  ;-) ओह ओह !! वाह वाह !! 
मानसिकता बनाने के लिए एक से एक मुहाबरे / कहावत - औरत खुली तिजोरी है , लड़की घर की इज्जत है , लड़की लक्ष्मी है , औरतों की अकल  घुटने में है , औरतों के नाक न हो तो गन्दा खा लें। ढोल गवाँर छुद्र पशु नारी  , सब तारण के अधिकारी।  

 सब का अर्थ यह निकलता है कि लड़किओं और औरतों को घर के अंदर बंद कर के रखो , तिजोरी की तरह। घर की तिजोरी को कोई भी  खुला तो नहीं छोरता।   धन तो घर के अन्दर हीं  सुरक्षित हैं।  धन रूपी शरीर को  संभाल कर रखो।  
 तथाकथित तिजोरी पर तो इतना ध्यान और चोर-लुटेरे पर कोई चर्चा नहीं ! मतलब इज्जत लेने वाले पुरुषों पर।  

सही मायने में पूरा चक्कर है नियंत्रण का देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच - योनिकता -व्यवहार -  निर्णय और बाहर घूमने - फिरने  पर  .

अब जरा सोंचिए ना   माँ - बहन की गाली दो - पत्थर से बनी  देवी की पूजा करो , मन्दिर - मस्जिद- गुरुद्वारा - चर्च और कही भी चप्पल खोल कर जाओ और  - घर - पडोस की महिला पर किसी बहाने लात- जूता - चप्पल चलाओ। 
और तो और !!  अपने ना चलाओ तो जो चला रहा है उस को चलाने से ना रोको ..और ना रोकने के कई बहाने ( मेरी बीबी नहीं , मेरे घर की नहीं है , उस की है जो उस को मन करे वो उस के साथ करे ..हम को क्या ? )
 किसी धार्मिक जगह पर चप्पल पहन कर चले जाए तो !! जो आप को जानते नहीं वो भी आप की कायदे से क्लास ले लेंगे।  तब धर्म , आस्था के नाम पर अनजाने लोग भी एक हो जायगे .  
निर्जीव वस्तु के लिए श्रद्धा चरम पर लेकिन सजीव शरीर के सम्मान के लिए , उनके हिंसा और भेदभाव मुक्त जीवन के लिए कोई एक नहीं होता।  सब बट जाते हैं।  

दिमाग - विचार - व्यवहार - कर्म से गुलाम और आज़ादी उत्सव देश के नाम वाह !! 
देश आज़ाद  कैसे  रहेगा ? इस के लिए एक हज़ार उपाय और प्रयाश पर मानव शरीर कैसे  आज़ाद रहेगा उसमे भी महिलाओं का शरीर तो सब आप की बोलती बंद कर देंगे लोग समझाने पहुँच जाएगें और कहेंगे कि शी शी !! क्या बोल रहे हैं ?? ..धीरे बोलिए क्या बोल रहे है ..कोई सुन लेगा .. घर- परिवार - राष्ट्र -धर्म तो उस की गुलामी की सोच रहा है .और आप इन की आज़ादी की बात कह रहे हैं। भाई  देश आज़ाद रहना चहिए पर महिलाओं का शरीर, मन  गुलाम।   

हम  कार, मोटर साइकिल पर तिरंगा का स्टीकर चिपकाते हुए खुश हो लेते हैं , पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन से निकलते हुए कई सालों से ..हाथ मे कागज से बना  छोटा तिरंगा का स्टीकर लिए पिन के साथ ..वो औरत .... जो सब के सीने पर कपडे मे तिरंगा लगा कर रुपिया लेना चाहती है ..और हम मे  से कई उस को मना करते रहते हैं ... यही है सच उस तिरंगे का ..तिरंगे के मायने का !! और एक विशेष दिन उस की इतनी कद्र ..ओह !! 
क्या सड़क , दुकान , फूटपाथ , राजनितिक पार्टियाँ ..सब का मुद्दा एक  " आज़ादी "  ," तिरंगा " ... " देश की सुरक्षा " , भारत माँ की चिंता उस के चारो और के दीवार / सीमा की चिंता ...

चक्कर है नियंत्रण का ..देश के बहाने शरीर - मन - सपने - सोंच पर / 

और फिर कई सवाल से चतुराई से बचने की सफल कोशिस .... 
घर मे एक शरीर को तो ..... क्या पहनना है , क्या पढना है , कहाँ और कब जाना है ,  किसके साथ जाना है, कहाँ  रहना है , किस से सम्बन्ध रखना है - बनाना है इस की फ़िक्र तो है नहीं ..हम इस आज़ादी पर  कोई सवाल नहीं सुनना चाहते ..बढ़े आए देश की आज़ादी पर सोचने वाले ...
इंडियन नेशन की आज़ादी का उत्सव वाह !! और नेशन की जनता की आज़ादी , राज्यों की आज़ादी !!    उस पर हमारा नेशन हम को बात नहीं करने देता ..और साथी किया तो देश द्रोह ...तथाकथित नेशन के पक्ष मे कहा - सुना - मान लिया तब तो देश भक्त पर !! सवाल उठा दिया  ..ओह ओह .. तब तो देश द्रोही  नहीं तो विकाश बीरोधी ....
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दीप जिस का महल्लात  (महल का बहुवचन) ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत ( समयोचितता, expediency ) के पले

ऐसे दस्तूर( संविधान)  को, सुबह-ए-बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

मैं भी खाइफ़ ( खोफज़दा, भयभीत )  नहीं तख्ता-ए-दार ( फाँसी का तख़्ता )  से
मैं भी मंसूर ( एक मशहूर सूफी संत जिन्हें बादशाह ने उन के विधर्मिक व्यवहार के कारण फांसी पर चढ़ा दिया था )  हूँ कह दो अग़यार ( ग़ैर का बहुवचन ) से
क्यूँ डराते हो ज़िन्दां  ( क़ैदख़ाना ) की दीवार से

ज़ुल्म की बात को, जहल ( जहालत ) की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

फूल शाखों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिन्दों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो

इस खुले झूट को, ज़हन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ ( जादू )
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूँ

तुम नहीं चारागर ( चिकित्सक, काम बनाने वाला, (काम या हालत वगैरा को) दुरुस्त करने वाला, बिगड़ा काम बनाने वाला, मदद करने वाला ) , कोई माने, मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता

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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।
एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।
अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।
ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।
राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।
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भागवत के भांड नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
मौलाना का फरमान नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
नेता का भाषण नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 
फौज पुलिस का जुल्म नहीं 
बेख़ौफ़ आज़ादी अभी चाहिए 

राजपथ तुम्हारा होगा 
जनपथ हमारा है 
ये 2013 है 
एक नया सवेरा है 

जम्हूरियत का एक ही नाम 
बेख़ौफ़ औरत 
आज़ाद इंसान

Saturday, 27 April 2013

आंखें खोल लो !! सच जो देखना है ....


जेंडरगत भेदभाव  










































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