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Tuesday, 26 March 2013

16 की सच्चाई

कैबिनेट द्वारा लाए गए बलात्कार निरोधक कानून को लेकर पिछले कुछ दिनों से कई तरह की भ्रांतियां बनी हुई हैं। हालांकि कुछ संशोधनों के साथ अब राजनीतिक दलों में मसौदे पर सैद्धांतिक सहमति बनी है। असली भ्रम सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र, बलात्कार कानून के अलावा इससे जुड़ी सजा व दुष्परिणाम को लेकर है

यौन संबंध की सहमति की उम्र 18 साल से घटाकर सरकार द्वारा अचानक 16 साल नहीं की गयी है। हालांकि अनेक राजनीतिक दलों के विरोध को देखते हुए सरकार इस मामले पर पुनर्विचार कर रही है और संकेत हैं कि यह आयु 18 वर्ष ही रखी जाएगी। मालूम हो कि भारत में सहमति की उम्र 1983 से लेकर अभी कुछ महीने पहले तक 16 वर्ष ही थी। इस मामले में सिर्फ चार महीने पहले आवाज बुलंद हुई। इसे 18 वर्ष किए जाने को लेकर मामला गर्माया और चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट (पीओसीएसओ) सामने आया। यह मामला अध्यादेश के आने के एक महीने पहले का है। सहमति की उम्र 16 वर्ष किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि किशोरों या टीन्स को सेक्स करने का लाइसेंस मिल गया या उसे बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। बहस इस पर नहीं है कि टीनएज सेक्स अच्छा है या खराब, बल्कि बहस का केंद्र यह है कि टीन्स के बीच सहमति से किया गया सेक्स बलात्कार के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है या नहीं। क्योंकि आपराधिक कानून में नैतिक या सामाजिक संहिता जैसा कुछ भी नहीं है। यदि सहमति की उम्र 18 बढ़ायी जाती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि 16 से 18 वर्ष के बीच के लड़के को बलात्कारी या यौन दोषी के तौर पर सजा दी जा सकती है जबकि उसके समान उम्र की उसकी गर्लफ्रेंड साफ तौर पर कह रही होगी कि उसकी मर्जी से उसके दोस्त ने यह सबकुछ किया। जब शादी की उम्र 18 साल है तो सहमति से सेक्स करने की उम्र में अंतर क्यों है? इस मामले में पहली बात यह कि यदि कोई नाबालिग लड़का किसी नाबालिग लड़की से शादी करता है तो बाल विवाह कानून के तहत उस लड़के को सजा नहीं मिलेगी। लेकिन जब नाबालिग लड़का अपने समान उम्र की नाबालिग लड़की को उसकी मर्जी से बांहों में लेता है, चूमता है या सेक्स करता है तो उसे यौन अपराधी या बलात्कारी के तौर पर सजा हो सकती है। बाल विवाह के खिलाफ कानून माता-पिता को नाबालिग बच्चों के जीवन के फैसले लेने से रोकता है। वह युगल को इस बात का अधिकार भी देता है कि वे बालिग होंगे तो वे शादी बरकरार रखना चाहते हैं या नहीं, यह उन पर निर्भर है। यह बात सत्य है कि 16 से 18 के बीच की अवस्था में चिकित्सा विज्ञान भी गर्भधारण को उचित नहीं मानता। उन्हें सेक्स करने से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन उस उम्र में एक-दूसरे के प्रति प्राकृतिक तौर पर आकर्षित होना हकीकत है। ऐसे में वयस्कों को यह समझाने की जरूरत है कि वे अपने शरीर को समझें, उन्हें सम्मान दें और आकर्षण में न बहें और प्रेम के प्रति जिम्मेदार बनें। ऐसे में यौन आकर्षण उन्हें अपराधी तक बना सकता है और निदरेष वयस्क बलात्कारी सिर्फ इसलिए बन जाता है क्योंकि उसने अपने हमउम्र की लड़की के साथ उसकी सहमति से सेक्स संबंध बनाए हैं। जिस लड़के ने आपसी सहमति से संबंध बनाए थे, उसे गलत तरीके से बलात्कारी के तौर पर पेश किया जाएगा। इसका अंजाम यह होगा कि वह महिलाओं से डरेगा या फिर घृणा करेगा और वह कामुकता और महिलाओं के प्रति विकृत घृणाओं से भरा रहेगा। इसलिए उसके महिलाओं के प्रति हिंसक होने की संभावनाएं अधिक होंगी। और तो और, हम उस दुनिया में रहते हैं जहां वयस्कों के जीवन और विकल्पों को लेकर मोरल पॉलिसिंग काफी खतरनाक है। चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट के तहत तीसरी पार्टी (माता-पिता, मोरल पॉलिसिंग आउटफिट्स, खाप या और कोई) नाबालिग लड़के के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करा सकता है और न्यायालय में न्यायाधीश लड़के की इस दलील पर कि लड़की की सहमति से उसने ऐसा किया, की अनदेखी कर लड़के को दोषी करार दे सकते हैं। इसलिए कई न्यायाधीशों ने भी मांग की है कि सहमति की उम्र 16 रखी जाए और इसे 18 न बढ़ाई जाए क्योंकि वे नहीं चाहते कि किसी वयस्क बालक को जबर्दस्ती दोषी ठहराया जाए जबकि उसने सहमति से यौन संबंध बनाए। टाटा स्काई के एक विज्ञापन को लेकर जरा सोचें, जिसमें एक भाई अपनी बहन को किसी लड़के के साथ डिनर पर जाने की अनुमति नहीं देता। यदि सहमति की उम्र 18 वर्ष सचमुच बढ़ा दी जाती है तो नाबालिगों के बीच किसी भी तरह का यौन संपर्क स्वत: बलात्कार की श्रेणी में आ जाएगा। ऐसे में जो भाई अपनी बहन की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना चाहता है, वह उसका प्रयोग करेगा और किसी भी लड़के/पुरुष सहपाठी/बहन के दोस्त को दोषी ठहरा देगा। इसलिए जेंडर को लेकर पक्षपातपूर्ण धारणा रखने वाली पुलिस पार्क में एक साथ बैठे जोड़ों को भी परेशान करने से नहीं चूकेगी।

गया झूठी शिकायतें यदि महिला किसी पुरुष के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज कराती हैं तो इसका कानूनी विकल्प क्या है? कानूनी विकल्प आईपीसी सेक्शन-182 और 211 में पहले से मौजूद है। इसके तहत झूठी शिकायत करने पर सजा मौजूद है क्योंकि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। ऐसे में सवाल है, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में झूठी शिकायतों को लेकर क्यों विशेष प्रावधान किया जाए? इस तरह के प्रावधान महिलाओं को झूठी शिकायतें दर्ज करने से रोकते हैं। याद रखें कि यह विधेयक सिर्फ महिलाओं के संघर्ष का परिणाम है। यह पुरुष-विरोधी नहीं है। यह विधेयक यौन हिंसा संबंधी मामले में पुरुषों के साथ- साथ सभी लोगों की रक्षा के लिए है। यही कारण है कि इसमें पीड़ित को जेंडर मामले में तटस्थ रखा गया है। महिलाओं का संघर्ष ही सरकार को बदलाव लाने के लिए सहमत करता है कि अध्यादेश की गलतियों को सुधारा जाए। बलात्कार कानून में दोषी को ‘विशिष्ट जेंडर’ के तहत रखा गया है (क्योंकि महिला किसी पुरुष का बलात्कार नहीं कर सकती), सहमति की उम्र 16 साल बरकरार रखा गया है और विधेयक में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि बलात्कार के चार्जशीट वाले लोकसेवकों को अभी तक जो संरक्षण प्राप्त था, वह नहीं मिलेगा। ताकझांक, पीछा करना, एसिड हमले और नंगा करने जैसे मामले यौन अपराध के दायरे में आएंगे। ऐसे में, जस्टिस वर्मा की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करने को लेकर हमें दूसरी लड़ाई जारी रखनी होगी। बहरहाल, महिलाओं के आंदोलन को लेकर यह विधेयक काफी बड़ी उपलब्धि है।

ताकझांक ताकझांक का अर्थ सिर्फ घूरना नहीं है। ‘फे सबुक’ पर किसी लड़की की तस्वीर अपलोड करना ताकझांक नहीं है। यदि कोई पुरुष अपनी गर्ल फ्रेंड का सेक्स एमएमएस बनाता है या न्यूड फो टो बनाकर उसे सकरुलेट करता है तो इसे ताकझांक कहा जाएगा क्योंकि यह उसकी निजता का हनन है। यदि कोई महिला कपड़े की दुकान के चेंजिंग रूम में कपड़े बदल रही है और वहां गुप्त छेद या गुप्त कैमरे की मदद से उस पर नजर रखी जा रही है तो यह ताकझांक की श्रेणी में आएगा। दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह पर भी ताकझांक करने का आरोप लगा था। उसकी महिला पड़ोसी ने समाचार एजेंसी ‘रॉयटर’ को बताया था कि जब कभी-कभी हम कपड़े बदल रहे होते या नहा रहे होते थे तो वह हमारे घर की झलक ले रहा होता था। विरोध करने पर वह काफी कठोर हो जाता था और कहता था कि उसे कहीं भी खड़ा रहने का अधिकार है। ताकझांक करना मूल रूप से, किसी की निजता को छिप कर जासूसी करने का मामला है। यह कानून पुरुषों की रक्षा भी करता है।

पीछा करना फिल्म "डर" के गाने ˜तू हां कर या ना कर, तू है मेरी सनम  को याद कर लें। यह है ˜स्टाकिंग" यानी पीछा करना। लगातार किसी का पीछा करना, धमकीभरे मेल/पत्र भेजना कि तुम पर एसिड फेंक दूंगा या बलात्कार/र्मडर कर दूंगा, इसी श्रेणी में आते हैं। ज्यादातर महिलाएं इसी दहशत में जीती हैं और इसे लेकर कोई उपाय अभी तक नहीं किया गया है। इस मामले में लगातार सड़कों पर आंदोलन हो रहे हैं कि सिर्फ बलात्कारी को ही सजा न मिले बल्कि बलात्कार, र्मडर और एसिड हमलों जैसी घटनाओं पर अंकुश लगे। याद करें- प्रियदर्शिनी मट्टू कांड को। उसने पुलिस के पास कई बार संतोष सिंह के खिलाफ पीछा करने का मामला दर्ज कराया था। लेकिन कोई कानून नहीं था जिसके बिना पर उसे पीछा करने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता तो संतोष सिंह न तो उसका बलात्कार ही कर पाता और न ही उसकी हत्या। एसिड हमलों के साथ-साथ बलात्कार और र्मडर (धौलाकुआं में राधिका तंवर की हत्या की तरह) मामले अपराधियों द्वारा काफी दिनों तक पीछा करने के बाद ही हुए हैं। पीछा करने के मामले को गैरजमानती क्यों बनाया जाना चाहिए, यह अहम सवाल है क्योंकि पीछा करने वाला, जो एसिड फेंकना चाहता है या गोली मारना चाहता है, वह आगे कदम बढ़ा सकता है और यदि महिला मामला दर्ज करती है तो वह दोगुने गुस्से से ऐसा करेगा। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि धमकियों को अंजाम देने से पहले उसे गिरफ्तार किया जाए। र्मडर और बलात्कार की तु लना में पीछा करने वाले को दोषी साबित करना आसान है। पीछा करने वालों को लेकर गवाही या फिर दस्तावेज के तौर पर सबूत (धमकी भरा पत्र, फोन कॉल की रिकॉर्डिग वगैरह) उपलब्ध होते हैं। इनके आधार पर अपराध साबित किया जा सकता है औ र सजा दी जा सकती है। पीछा करने के मामले में महिलाओं के साथ- साथ यह अधिकार पुरुषों को भी मुहैया कराया गया है।

साभार :- कविता कृष्णन

Saturday, 27 August 2011

बेशर्मी मोर्चा - Walk Walk बदलो-बदलो बदलो


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यह मार्च सादा था, बिना शोर-शराबे और दिखावे का था। स्त्रीवादी मुहिम ना होने के बावजूद सड़क पर स्लोगनों और पोस्टरों के साथ निकली लड़कियों के साथ ढेरों लड़कों ने आकर पहली बार जता दिया कि वे उनकी पीड़ा बांट रहे हैं। सोच बदलने और अपने भीतर की गंदगी को निकाल फेंकने के जोशीले वॉक पर स्पर्धा

‘दिस इज नॉट एन इंविटेशन टू रेप मी‘ जैसे स्लोगन लिखे कपड़ों को पहने लड़कियां जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुई। लोगों की सोच के विपरीत इस स्लटवॉक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का आयोजन केवल कपड़े पहनने की स्वतंत्रता के लिए नहीं किया गया था। इस मोच्रे का आयोजन विचारों में खुलेपन लाने के लिए किया गया था। कपड़े चाहे छोटे हों या बड़े, खाने का मन चाहे पिज्जा का हो या रोटी का, वकील बनने का मन हो या घर संभालने का, मनमर्जी शादी करने का, जब बात किसी व्यक्ति की हो रही है तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता है कि उसकी क्या ख्वाहिश है और वह क्या पाना चाहता है। यही वजह रही कि इस स्लटवॉक को समझने में कुछ लोग चूक गए। इसे महज कपड़ों के मामले में उलझा समझ लिया गया, जबकि यहां बात हर मामले में स्वतंत्रता और अपने हक की लड़ाई की है। यह लड़ाई सिर्फ पुरुषों से नहीं बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति, संस्था, रीति-रिवाज और परिपाटी से है, जो मुक्ति को बांधे बैठी है। यह वॉक उन महिलाओं द्वारा की गई शुरुआत नहीं है, जो खादी की साड़ी में लिपटी, बड़ी बिंदी लगाए और चप्पल पहने औरतों के हक की लड़ाई लड़ती हैं। यह वॉक उन लड़कियों द्वारा शुरू की गई है, जो जमीनी स्तर पर काम नहीं कर रहीं लेकिन इन्हें पता है कि किस तरह की दिक्कतों का सामना ये करती हैं। सरे राह छेड़छाड़ हो या कपड़ों पर फब्ती, सिर्फ पुरुष ही नहीं, पुरुष मानसिकता वाले लोग लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार का ठीकरा उनके कपड़ों पर ही फोड़ते हैं।

 हां, यह जरूर है कि स्लटवॉक मुहिम की शुरुआत टीनएजर द्वारा शुरू की गई है, जो सही तरह से महिलाओं की परेशानियों और मुद्दों को अभी गहराई से समझती नहीं है। तभी तो जब इसे आयोजित करने वाली उमंग सभरवाल आगे के कदम पर निरुत्तर हो जाती है। बस केवल यही कहती है कि मैं इसे बढ़ाना चाहती हूं लेकिन आगे के कदम के बारे में कुछ सोचा नहीं है। यह उमंग की कम उम्र का ही असर है कि उसे इस वॉक का भविष्य नजर नहीं आ रहा। यही वजह है कि मुंबई में सितम्बर में होने वाले स्लटवॉक के बारे में उमंग को कुछ पता नहीं। वह बस यही कहती है कि यदि उन्हें मेरी कोई मदद चाहिए, तो मैं यहां मौजूद हूं। दरअसल, अपने यहां यही तो दिक्कत है। औरतों के हक की लड़ाई सामूहिक तौर पर नहीं लड़ी जाती। सबने अपने-अपने मोच्रे खोल लिए हैं। सभी अपनी तरह से लड़ रहे हैं। यह बात उन्हें समझ ही नहीं आती कि जब तक सामूहिक तौर पर इस समाज से लड़ा नहीं जाएगा, तब तक कुछ हासिल नहीं होने वाला, कोई हवा नहीं बदलने वाली। शायद जब मामला और बड़ा होगा, इससे न केवल मेट्रो बल्कि कस्बों और गांवों की युवतियां भी जुड़ेंगी तो औरतवादी हक के पक्ष में लड़ने के लिए मसले भी कई होंगे। तब केवल पहनावा या अपनी स्वतंत्रता के लड़ने के मुद्दे के अलावा भ्रूण हत्या, दहेज, घरेलू हिंसा, प्रेमी प्रताड़ना जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे और लड़े जाएंगे। हां, 19 साल की उमंग के दिमाग में यह जरूर साफ है कि वह फेमिनिस्ट नहीं, उसकी लड़ाई इंसानियत के हक की है। दरअसल, हमें समझने की जरूरत है कि उमंग सभरवाल समाज के उस तबके से आती है, जो अपर मिडिल क्लास है, जिसकी अलग समस्याएं है, जो गांव-कस्बों की लड़कियों की समस्याएं को नहीं समझ पाते।

 स्लटवॉक न केवल पुरुषों के खिलाफ हो, बल्कि यह ’रन‘ उस समाज के खिलाफ हो, जहां लड़कियों पर कानून कसने वालों का शिंकजा बुरी तरह से हावी रहता है। यह न पहनो, ऐसे न करो, यहां न जाओ, यह मत खाओ, जैसे कहने वालों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए हो स्लटरन। मॉडर्न ड्रेस पहन लिए और किसी ने फब्ती कस दी तो साथ वाली कहती है, यार! तुझे ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए थे। भला कोई दूसरा यह कैसे तय कर सकता है कि किसी को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं? हमें किस तरह से चलना चाहिए, किस तरह से ऑफिस जाना चाहिए, यह दूसरा तय नहीं कर सकता। इसे तय करेगा खुद वही, जिसे चलना है। औरतों पर पाबंदी लगाने को भला हम टीवी चैनलों को कैसे भूल सकते हैं? भारी-भरकम साड़ी और लदे- फदे गहनों में टीवी की ये औरतें इस स्लटवॉक का उपहास उड़ाती दिखती हैं। इन दिनों टीवी पर एक धारावाहिक आ रहा है, जिसमें बहू को डॉक्टरी की पढ़ाई की इजाजत तो मिल गई लेकिन वह मेडिकल कॉलेज भी गहनों में लदी- फंदी जाती है। अब भला यह तो वही बता सकती है कि भारी साड़ी और गहनों में वह किस तरह पढ़ाई करती होगी और किस तरह लैब में चीर- फाड़ करती होगी। फेसबुक पर शुरू की गई इस मुहिम को कइयों ने पसंद किया तो कइयों की सोच थोड़ी अलग सी दिखी। लोगों ने इसे गलत तरीके से सोचा भी और समझा भी। कुछ ने तो इसे सिर्फ लड़कियों के पहनावे से जोड़कर देख लिया। कुछ ने फेसबुक के इस पन्ने पर निगेटिव कमेंट्स भी दे मारे। ऐसे लोगों के बारे में उमंग कुछ कहना नहीं चाहती। वह बस यही कहती है कि इनकी मानसिकता ठीक नहीं।

 हमारा मुद्दा सिर्फ यही है कि किसी के व्यक्तित्व पर कोई दूसरा हक नहीं जमा सकता। फेसबुक के इसी पन्ने पर ऋचा शर्मा कहती हैं कि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबारों में स्लटवॉक के बारे में पढ़ा है। मैं उन लड़कियों में हूं, जिनके माता-पिता यह सोचते हैं कि लड़कियों के पहनावे की वजह से ही उनके साथ गलत है। मैं चाहती हूं कि उनकी भी मानसिकता बदले। अपनी आजादी को लेकर लड़कियों द्वारा निकाली गई इस रैली को कैश करने की कोशिश में कई लोग गए हैं। इनमें मुख्य नाम पूनम पांडे का है। इन्हें पहचान की तो दरकार नहीं, फिर भी लाइमलाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करना चाहिए। सो, दिल्ली के स्लटवॉक की नकल करते हुए मुंबई में होने वाले स्लटवॉक की अगुवाई का जिम्मा इन्होंने उठाया है। कहती हैं कि काश! मैं दिल्ली स्लटवॉक का हिस्सा बनती। पूनम को क्या किसी ने मना किया था कि दिल्ली आने के लिए उन्हें किसी बात का डर था? अब यह तो पूनम ही जानें लेकिन यह जरूर तय है कि उमंग द्वारा शुरू किए गए बेशर्मी मोच्रे की शुरुआत हो चुकी है। इसे बड़े मोच्रे पर ले जाने की जरूरत है ताकि यह मसला लड़कियों की आजादी का बन जाए ताकि यह मसला स्त्रियों के हर उस हक का बन जाए, जिसकी वे हकदार हैं। इसे केवल ’वॉक‘ नहीं बल्कि ’रन‘ बनाने की जरूरत है। (फेसबुक कमेंट्स पेज 2 पर भी)

यह प्रेरणा देने वाला है कि समाज में व्याप्त बुराइयों से लड़ने के लिए हम आगे बढ़े हैं..लेट्स गो पीपल
हम लड़कियां हैं..और हमेशा रहेंगी.हम भी निर्णय ले सकती हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत..!!
मुझे लगता है कि अब की लड़कियां समझदार हैं..वे जानती हैं कि उन्होंने क्या पहना है और उन कपड़ों को कैसे कैरी करना है..ये तो कुछ मूर्ख लो ग हैं, जिनकी मानसिकता छोटी है..जिनके लिए आप कुछ नहीं कर सकते..

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........................................................राष्ट्रीयसहारा समय लाइव ' आधी दुनिया '  के साभार से

समलैंगिकता – विकृति या सामाजिक अपराध ?


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जागरण जंक्शन परिवार मे छपी ख़बर  पर   
 (  समलैंगिकता – विकृति या सामाजिक अपराध ?
पोस्टेड ओन: 25 Jul, 2011 Junction Forum में     )

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साथी लोग खुल कर अपनी टिप्णी दें , 
लिखने वालों को पता भी चले की ख़बर लिखे भी तो किस तरह ..! वेब पेज पर जा कर जो टिप्पणी
लिखते  है  उनको भी पढ़े , उनका भी जवाब दें , जरूर दें , दोस्तों 


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समलैंगिकता के ऊपर गत कुछ समय से निरंतर बहस जारी है. इसके पक्ष और विपक्ष में अनेकानेक मत सामने आ रहे हैं. हाल के कुछ वर्षों में समलैंगिकता को लेकर एक आश्चर्यजनक उत्साही प्रवृत्ति देखने को मिल रही है, जिसके समर्थन में कई गैर-सरकारी संगठनों सहित तमाम समुदाय व कुछ उदार कहे जाने वाले व्यक्ति खड़े हो रहे हैं. समलैंगिकों के हितों में आवाज बुलंद करने वाली “नाज फाउंडेशन” नामक संस्था तो बाकायदा समलैंगिकों के अधिकारों और समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करवाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है और उसे आंशिक रूप से सफलता भी मिल चुकी है.

नाज फाउंडेशन की याचिका पर वर्ष 2010 में दिल्ली उच्च न्यायालय का फ़ैसला आया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से समलैंगिक रिश्ता बनाते हैं तो वह सेक्शन 377 आईपीसी के अर्न्तगत अपराध नहीं होगा. बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी धारा 377 के कुछ प्रावधानों को रद्द करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. परन्तु गौर करने वाला पहलू यह है कि न तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने और न ही उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक विवाहों या विवाहेत्तर समलैंगिक संबंधों को विधिमान्यता दी है और इस मामले पर अभी उच्चतम न्यायालय में विचार चल रहा है.

परन्तु समलैंगिकता के समर्थकों ने जिस तरह का उन्माद, जश्न और उत्सव पूरे देश में मनाया, गे-प्राइड परेडें निकालीं,  वह कई बातों पर सोचने के लिए विवश करता है. समलैंगिकता के विरोधियों की चिंता यह है कि समलैंगिकता को जिस तरह रूमानी अंदाज में पेश किया जा रहा है, उससे कहीं जिसे विकार के रूप में लिया जाना चाहिए, उसे समाज सहज रूप में न ले बैठे, अन्यथा भविष्य में समाज में कई बीमारियां और कई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. उल्लेखनीय है किसी विषय को मुद्दा बनाने से लोगों में उसको जानने-समझने का कौतूहल एवं उत्सुकता बढ़ती है, जो कि उस बात का प्रचार करती है.

समलैंगिकता के विरोधी मानते हैं कि “समलैंगिक व्यभिचार मूल रूप से उन व्यक्तियों से संबंधित होता है जिन्होंने मनोरंजन और विलास की सारी हदें पार कर ली हों. ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर कुछ नया करने को चाहिए होता है. यही कारण है कि विदेशी संस्कृति में समलैंगिक व्यवहार आम चलन में मौजूद है. समलैंगिकता पश्चिमी रीति-रिवाजों में इस तरह समाहित है कि वहॉ पर इसे सहज रूप से स्वीकार किया जाने लगा है. पश्चिमी देशों के तमाम राष्ट्राध्यक्ष, नौकरशाह, अभिनेता, अभिनेत्रियों सहित व्यापार जगत की बड़ी हस्तियां समलैंगिकता नामक उन्मुक्त पाशविक व्यभिचार में लिप्त पाई जाती हैं. किंतु भारत के संदर्भ में ऐसी स्थिति की कल्पना करना भी भयावह और खतरनाक है.”

उपरोक्त को देखते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने या इसे केवल मानसिक विकृति और बीमारी के रूप में परिभाषित कर सुधारात्मक या दंडात्मक कार्यवाही के औचित्य पर विचार विमर्श को दिशा दी जा सके, इस संबंध में कुछ बेहद संवेदनशील और अनिवार्य प्रश्न निम्नलिखित हैं:

1. आप की नजर में समलैंगिकता एक अपराध है या मानसिक विकृति व बीमारी?
2. क्या समलैंगिकता के उन्मूलन के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की जानी चाहिए?
3. क्या समलैंगिकता को बीमारी व मानसिक विकृति मानकर उपचारात्मक कार्यवाही की जानी चाहिए?
4. क्या समलैंगिकता को सामाजिक मान्यता मिलनी चाहिए?
5. समलैंगिकता को समाज पर थोपकर, स्वीकार्य कराकर समलैंगिकता के पैरोकार कौन-सी सामाजिक जागरूकता लाना चाहते हैं?

जागरण जंक्शन इस बार के फोरम में अपने पाठकों से राष्ट्रहित और व्यापक जनहित के इसी मुद्दे पर विचार रखे जाने की अपेक्षा करता है. इस बार का मुद्दा है:

समलैंगिकता – विकृति या सामाजिक अपराध ?

आप उपरोक्त मुद्दे पर अपने विचार स्वतंत्र ब्लॉग या टिप्पणी लिख कर जारी कर सकते हैं.

नोट: 1. यदि आप उपरोक्त मुद्दे पर अपना ब्लॉग लिख रहे हों तो कृपया शीर्षक में अंग्रेजी में “Jagran Junction Forum” अवश्य लिखें. उदाहरण के तौर पर यदि आपका शीर्षक “समलैंगिकता के लिए दंड” है तो इसे प्रकाशित करने के पूर्व समलैंगिकता के लिए दंड – Jagran Junction Forum लिख कर जारी करें.
2. पाठकों की सुविधा के लिए Junction Forum नामक नयी कैटगरी भी सृजित की गयी है. आप प्रकाशित करने के पूर्व इस कैटगरी का भी चयन कर सकते हैं.

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धन्यवाद 
  साभार  :-   जागरण जंक्शन परिवार



बुर्के में दुख



युवतियों की पीठ, वह भी नग्न! और उस पर बने टैटू। लो जी हो गया संस्कृति का नाश। हो गई पाश्चात्य संस्कृति की नकल।

इस खुलेपन को देख महिलाओं को बुर्के में कैद रखने वाले ब्लॉगजगत के कुछ संदेशवाहकों को भारतीय संस्कृति याद आ गई। अन्य मामलों में भारतीय संस्कृति कहां चली जाती है, पता नहीं। भारतीय संस्कृति को याद ही कर लिया है तो इसकी एक झलक दिखला दूं, तुम्हें भी पता चले भारत क्या था, ज्यादा पीछे क्यों जाए। बस अपनी परदादियों के जमाने की ही बात कर लेते हैं।

 उस समय रूढ़िवादी कहलाते राजस्थान के छोटे से कस्बे तक में ‘सभ्य-संस्कारी’ हिन्दू महिलाएं ‘ब्लाउज’
(यह अंग्रेजों की देन है) नहीं, ‘कांचली’ नामक वस्त्र पहनती थीं, जिसमें उनकी पूरी पीठ खुली रहती थी। यह हमारी संस्कृति थी। उस समय की कोई तस्वीर तो नहीं है, मगर इस कलाकृति में उस वस्त्र को देख सकते हैं। रही बात टैटू की तो पूरे शरीर में ‘गोदने’ गुदवाने वाली ‘फैशनेबल’ महिलाएं तो मैंने भी देखी है, जो अब उम्र हो जाने से दिवंगत हो गई हैं। माने हमारे यहां कई पीढ़ियों से टैटू का प्रचलन रहा है। ऐसे में आधुनिक युवतियां भी टैटू खुदवा कर कौन-सी संस्कृति का नाश कर रही हैं?

 अत: संस्कृति की आड़ में महिलाओं के प्रति अपने दूषित विचार व्यक्त करने से पहले भारतीय संस्कृति का पूरा अध्ययन कर लें, फिर अपनी ऊर्जा अपने समाज में व्याप्त रूढ़ियों को दूर करने में लगाएं, जहां आज भी महिलाएं बुर्के में सिसक रही हैं।