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Saturday, 24 September 2011
Saturday, 17 September 2011
We all shit, we all pee but never talk about it .!
अगर मैं ठीक-ठीक याद कर पा रही हूं तो ये पिछली गर्मियों की किसी तपती दोपहरी वाले दिन घटी घटना है। मैं घर में अकेली थी कुछ-कुछ फुरसतिया मूड में कभी इधर, कभी उधर बैठकर टाइम पास करती। तभी दरवाजे की घंटी बजी।
दरवाजे पर दो महिलाएं खड़ी थीं। मेरे दरवाजा खोलते ही धुआं छोड़ने वाली 150 सीसी पल्सर की रफ्तार से शुरू हो गईं।
‘मैडम हम फलां कंपनी की तरफ से आए हैं, फलां फेयरनेस क्रीम और साबुन और शैंपू जाने क्या-क्या तो बेच रहे हैं। एक डेमो देना चाहते हैं।’
मैंने उनकी बात खत्म होने से पहले ही अपने रूटीन बेहया लहजे में कहा, ‘नहीं, नहीं, नहीं चाहिए। हम पहले से ही बहुत ज्यादा फेयर हैं। क्रीम लगाएंगे तो करीना कपूर छाती पीटकर रोएगी। उसके रूप के साथ हम अन्याय नहीं कर सकते।’
मजाक नहीं, मैंने सचमुच ऐसा ही कहा। (मैं काफी बदजबान हूं और कब कहां क्या बोल दूं, मुझे खुद भी पता नहीं होता।)
दोनों थोड़ा इमबैरेस सी हुईं, लेकिन फिर मेरे चेहरे पर शरारती मुस्कान देखकर हंसने लगीं। अबकी मैंने फाइनल डिसीजन सुना दिया, ‘Look mam, I am not interested. ’
मुझे लगा कि अब वो लौट जाएंगी और किसी और का दरवाजा खटखटाकर सुंदर होने के नुस्खे बताएंगी। लेकिन वो कुछ मिनट और खड़ी रहीं। दोनों ने एक ही रंग और डिजाइन की साड़ी पहन रखी थी। दिखने में पहली ही नजर में कहीं से आकर्षक नहीं जान पड़ती थीं, लेकिन बरछियां बरसाती बदजात दोपहरी में दरवाजे-दरवाजे भटकना पड़े तो करीना कपूर भी दस दिन में कोयला कुमारी नजर आने लगे। वो मेरी तरह कूलर की हवा में बैठकर तरबूज का शरबत पीती होतीं तो निसंदेह उनकी त्वचा इतनी खुरदुरी नहीं लगती।
मैं दरवाजा बंद करके पीछा छुड़ाना चाहती थी, लेकिन वो मेरी रुखाई के बावजूद एकदम से पलटकर दोबारा कभी मेरा मुंह भी न देखने को उद्धत नहीं जान पड़ीं। उनकी आंखों ने कहा कि वो कुछ कहना चाहती हैं, लेकिन संकोच की कोई रस्सी तन रही है।
हम दोनों ही कुछ सेकेंड चुपचाप खड़े रहे।
फिर जैसे बड़ी मुश्किल से उनमें से एक हिम्मत जुटाकर बोली, ‘मैम, हम आपका बाथरूम यूज कर सकते हैं।’
मुझे उनकी बात समझने में कुछ सेकेंड लगे। फिर बोली, ‘हां जरूर, शौक से। प्लीज, अंदर आ जाइए।’
दोनों कमरे की ठंडी हवा में आकर सुस्ताने लगीं। एक-एक करके बाथरूम गईं, मुंह पर पानी के छींटे डाले। मैंने तरबूज का शरबत उन्हें भी ऑफर किया। दोनों चुपचाप बैठकर शरबत पीने लगीं और उस पूरे दौरान हुई बातचीत से उनके मुतल्लिक कुछ ऐसी जानकारियां हासिल हुईं।
वो किसी कंपनी में डेली वेजेज पर काम करती थीं, सुबह दस से शाम छह बजे तक और शाम को मिलने वाले पैसे इस बात पर निर्भर करते थे कि दिन भर उन्होंने कितने प्रोडक्ट बेचे थे। वो घर-घर जाकर अपने प्रोडक्ट दिखातीं (जैसे चश्मे बद्दूर में दीप्ति नवल चमको साबुन बेचती थी) और जिस घर जातीं, उनका नाम, मकान नंबर और साइन एक कागज पर दर्ज कर लेती थीं। उनमें से एक अपने एलआईसी एजेंट पति और दूसरी मां और विधवा बहन के साथ रहती थी। ये जानकारियां मैंने दनादन सवालों की बौछार करके जुटा ली थीं। लेकिन मैं mainly जो बात कहना चाहती हूं, उसका इन डीटेल्स से न ज्यादा, न कम लेना-देना है।
मैं घूम-फिरकर उस सवाल पर आ गई, जो मुझे इतनी देर से कोंच रहा था।
‘आप दिन भर इतनी गर्मी, धूप में घूमते-घूमते परेशान नहीं हो जातीं।’
‘आदत हो गई है।’
‘आपको प्यास लगे तो? ’
‘किसी के घर में पी लेते हैं।’
‘और लू जाना हो तो? ’
‘क्या? ’
‘बाथरूम?’
‘बाथरूम जाना हो तो? आप लोगों को प्रॉब्लम नहीं होती। 8-10 घंटे आप बाहर घूमती हैं। बाथरूम लगे तो क्या करती हैं?’ ।
मैंने देखा संकोच की एक लकीर उनके माथे पर घिर आई थी। जाहिर था कि जैसे उन्होंने मुझे लड़की, शायद थोड़ी बिंदास लड़की या जो कुछ भी समझकर मुझसे बाथरूम यूज करने की रिक्वेस्ट कर ली थी, ऐसा वो अमूमन नहीं करती होंगी, नहीं कर पाती होंगी। वैसे भी आप किसी अनजान के घर सामान बेचने जाकर उसके बाथरूम में नहीं घुस जाते। लेकिन बाथरूम Available न हो तो ऐसा तो नहीं कि सू-सू अपने आने का कार्यक्रम मुल्तवी कर देगी।
उन्होंने बताया कि उन्हें दिक्कत तो होती है। दिन भर वो कम से कम पानी पीती हैं। बहुत बार घंटों-घंटों इस प्राकृतिक जरूरत को दबाकर भी रखती हैं। मेरे काफी खोदने पर उन्होंने स्वीकारा कि ऐसा करने का उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। पेट में दर्द से लेकर यूरिनरी इंफेक्शन तक वो झेल चुकी हैं।
‘पीरियड्स के समय भी आप ऐसे ही घूमती हैं?’
वो और ज्यादा अपने संकोच में सिकुड़ गईं। मैं तो कोई पुरुष नहीं थी, लेकिन शायद लड़कियां भी लड़कियों से ऐसी बातें नहीं करतीं। इसलिए मैं उन्हें थोड़ी विचित्र जान पड़ी।
बोलीं, ‘हां करना तो पड़ता है मैम। क्या करें, हमारी नौकरी ही ऐसी है। एक दिन न आएं तो उस दिन के पैसे नहीं मिलेंगे। और फिर घर भी तो चलाना है। आजकल महंगाई कितनी बढ़ गई है।’
बातें जो न चाहें तो कभी खत्म न हों, को चाहकर हमने खत्म किया और वो चली गईं। वो चली गईं और मैं सोच रही थी। घड़ी की तरह शरीर में भी (खासकर औरतों के शरीर में) एक अलार्म होना चाहिए, जिसमें हर चीज का टाइम सेट कर दें। बाथरूम आने का भी टाइम सेट हो। सुबह दस से शाम छह बजे तक नहीं आएगी। जब घर में रहेंगे, तभी आएगी क्योंकि इस देश में पब्लिक टॉयलेट्स सच्ची मोहब्बत की तरह ढूंढे से नहीं मिलते। गलती से मिल भी जाएं तो पता चलता है कि सच्ची मोहब्बत नहीं, सड़क छाप, बदबू मारते गलीज बीमारियों के अड्डे हैं, जहां अव्वल तो लड़कियां घुसती नहीं और घुसती हैं तो ऐसा ही समझा जाता है कि छेड़े जाने की हरसत से आई हैं। और जो थोड़ी भलमनसाहत बाकी हो और उन्हें न भी छेड़ो तो आंखें फाड़-फाड़ देख तो लो ही सही।
तो ऐसे देश का सिस्टम तो बदलने से रहा, इसलिए अलार्म ही फिट हो सके तो कुछ बात बने। वरना हम ऐसी ही मुश्किलों से गुजरते रहने को अभिशप्त होंगे।
ऐसी मुश्किलों से मैं भी कम नहीं गुजरी हूं और बीमारियों को खुद आ बैल मुझे मार करने के लिए बुलाया है।
अपने जिए हुए अनुभव से मैं कह सकती हूं कि हिंदुस्तान जैसे मुल्क, जो हालांकि पूरा की पूरा ही बड़ा शौचालय है, लेकिन पब्लिक शौचालय का जहां कोई क्लीयर आइडिया न तो सरकार और न लोगों के दिमाग में है, में किसी लड़की के लिए ऐसा कोई काम, जिसमें उसे दिन भर सिर्फ घूमते रहना हो, करना किसी बड़ी बीमारी को मोहब्बत से फुसलाकर अपनी गोदी बिठाने से कम नहीं है।
मुंबई में मैंने कुछ समय फिल्म रिपोर्टिंग जैसे काम में हाथ आजमाया था, जिसके लिए मुझे घंटों-घंटों न घर, न ऑफिस, बल्कि बाहर इधर-उधर भटकना पड़ता था। सुबह नौ बजे मैं घर से निकलती, दो घंटे ऑटो, लोकल train और बस से सफर करके यारी रोड, पाली हिल, लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स या महालक्ष्मी रेसकोर्स रोड के रेस्टरेंट में पहुंचती, फिर वहां से पृथ्वी थिएटर, पृथ्वी से जुहू तारा रोड, जुहू तारा से सात बंगला, सात बंगला से केम्स कॉर्नर, केम्स कॉर्नर से वॉर्डन रोड करते हुए मेरा शरीर रोड की तरह हो जाता था, जिस पर लगता हजारों गाडि़यां दौड़-दौड़कर रौंदे डाल रही हैं।
मुंबई जैसे विशालकाय महानगर में, जहां पांच सितारा होटलों के चमकीले टायॅलेटों, जिनकी फर्श भी हमारी रसोई की परात जितनी साफ रहती है, इतनी कि उस पर आटा सान लो, से लेकर बांद्रा की खाड़ी के बगल में बने आसमान के नीचे खुले प्राकृतिक शौचालयों तक सबकुछ मिल जाएगा, लेकिन पब्लिक टॉयलेट ढूंढना वहां भी धारावी में ब्रैड पिट को ढूंढने की तरह है।
सुबह नौ बजे से लेकर शाम 5-6 बजे तक भटकने के बाद मैं ऑफिस पहुंचती और सबसे पहले बाथरूम भागती थी। दिन भर काफी मिट्टी पलीद होती थी। बॉम्बे के बेहद उमस भरे दिलफरेब मौसम में बार-बार पानी या लेमन जूस पीते रहना मजबूरी थी, वरना डिहाइड्ेशन से ही मर जाती। इस तरह भटकते रहने का यह ताजातरीन अनुभव था। शुरू में काफी एक्साइटमेंट था। लेकिन इससे और क्या-क्या मुश्किलात जुड़े हैं या इसके और क्या-क्या नतीजे मुमकिन हैं, इस बारे में तब तक कोई अंदाजा ही नहीं था। नौ बजे घर से निकलने के बाद 1-2 बजते-बजते मैं काफी परेशान हो जाती थी। लेकिन मैंने हालांकि बड़े सामान्य, लेकिन कुछ विचित्र भी लगने वाले तरीकों से ऐसी हाजतों से निजात पाई है। ये बोलते हुए हंसी भी आती है, लेकिन फेयरनेस क्रीम बेचने वाली उन स्त्रियों ने तो मुझसे ही बाथरूम यूज करने की रिक्वेस्ट की थी, लेकिन मैं बड़े-बड़े सेलिब्रिटियों के घर ऐसी डिमांड रख देती थी।
एक दिन स्मृति ईरानी के घर पहुंची तो जोर की बाथरूम लगी थी। संकोच बहुत था, लेकिन कुछ जरूरतें ऐसी होती हैं कि दुनिया के हर संकोच से बड़ी हो जाती हैं। मैंने बड़ी बेशर्मी से पूछ लिया, May I use your washroom please.
उसने कहा, yes. Off course. ऑफ कोर्स मैंने खुद को कृतार्थ किया।
एक बार शेखर कपूर के घर, हालांकि वो उस समय घर में नहीं थे (ये बहुत दुख की बात है, क्योंकि शेखर कपूर पर मुझे क्रश है) मैंने सुचित्रा से ऐसी ही रिक्वेस्ट की और उन्होंने बड़ी खुशी से रिस्पॉन्ड किया। ऐसी रिक्वेस्ट मैंने सुप्रिया पाठक, किरण खेर, रेणुका शहाणे, सुरेखा सीकरी, नादिरा बब्बर वगैरह से भी की थी और शायद सबने इस रिक्वेस्ट की जेनुइननेस को समझा भी था। इंटरेस्टिंगली सभी स्त्रियों से ही ऐसी बात कहने का विश्वास होता था। बोस्कीयाना में बैठकर ढाई घंटे भी इंतजार करना पड़े तो भी मैं नेचर कॉल को चप्पल उतारकर दौड़ाती - 'भाग, अभी नहीं, बाद में आना।'
सिर्फ कुछ ही महीनों में सेहत की काफी बारह बज गई थी।
जारी……………
बंबई में फिल्म रिपोर्टिंग करते हुए जब तक मैं खुद इस दिक्कत से नहीं गुजरी थी, मेरे जेहन में ये सवाल तक नहीं आया था। पब्लिक टॉयलेट यूज करने की कभी नौबत नहीं आई, इसलिए उस बारे में सोचा भी नहीं। लेकिन अब अपनी दोस्त लेडी डॉक्टर्स से लेकर अनजान लेडी डॉक्टर्स तक से मैं ये सवाल जरूर पूछती हूं कि औरतों के बाथरूम रोकने, दबाने या बाथरूम जाने की फजीहत से बचने के लिए पानी न पीने के क्या-क्या नतीजे हो सकते हैं? कौन-कौन सी बीमारियां उनके शरीर में अपना घर बनाती हैं और आपके पास ऐसे कितने केसेज आते हैं। मेरे पास कोई ठीक-ठीक आंकड़ा नहीं है कि लेकिन सभी लेडी डॉक्टर्स ने यह स्वीकारा किया कि औरतों में बहुत सी बीमारियों की वजह यही होती है। उन्हें कई इंफेक्शन हो जाते हैं और काफी हेल्थ संबंधी कॉम्प्लीकेशंस। कई औरतें प्रेग्नेंसी के समय भी अपनी शर्म और पब्लिक टॉयलेट्स की अनुपलब्धता की सीमाओं से नहीं निकल पातीं और अपने साथ-साथ बच्चे का भी नुकसान करती हैं। यूं नहीं कि ये रेअरली होता है। बहुत ज्यादा और बहुत बड़े पैमाने पर होता है। खासकर जब से औरतें घरों से बाहर निकलने लगी हैं, नौकरियां करने लगी हैं और खास तौर से ऐसे काम, जिसमें एक एयरकंडीशंड दफ्तर की कुर्सी नहीं है बैठने के लिए। जिसमें दिन भर इधर-उधर भटकते फिरना है।
मुंबई में मेरे लिए ये सचमुच एक बड़ी समस्या थी। हमेशा आप किसी सेंसिटिव सी जान पड़ने वाली फीमेल सेलिब्रिटी के घर ही तो नहीं जाते। या कई बार किसी के भी घर नहीं जाना होता, फिर भी भटकना होता है। मैं तो ऐसी भटकू राम थी कि बिना काम के भी भटकती थी। तो ऐसे में मैंने एक तरीका और ईजाद किया था। बॉम्बे में वेस्टसाइड, ग्लोबस, फैब इंडिया और बॉम्बे स्टोर से लेकर शॉपर्स स्टॉप तक जितने भी बड़े स्टोर थे, उनका इस्तेमाल मैं पब्लिक टॉयलेट की तरह करती थी। जाने कितनी बार मैं इन स्टोरों में कुछ खरीदने नहीं, बल्कि इनका टॉयलेट इस्तेमाल करने के मकसद से घुसी हूं। काउंटर पर बैग जमा किया, दो-चार कपड़े, सामान इधर-उधर पलटककर देखा और चली गई उनके वॉशरुम में। इससे ज्यादा उन स्टोर्स की मेरे लिए कोई वखत नहीं थी।
बचपन में मैंने मां, मौसी, ताईजी और घर की औरतों को देखा था कि वो कहीं भी बाहर जाने से पहले बाथरूम जाती थीं और घर वापस आने के बाद भी सबसे पहले बाथरूम ही जाती थीं। गांव में, जहां हाजत के लिए खुले खेतों में जाना पड़ता है, वहां तो सचमुच औरतों के शरीर में (सिर्फ औरतों के) अलार्म फिट था। उन्हें सुबह उजाला होने से पहले और शाम को अंधेरा होने के बाद ही हाजत आती और कमाल की बात थी कि पड़ोस, पट्टेदारी की सारी औरतों को एक साथ आती थी। सब ग्रुप बनाकर साथ ही जाती थीं, मानो किसी समारोह में जा रही हों। मैं भाभी, दीदी टाइप महिलाओं से बक्क से पूछ भी लेती थी, ‘आप लोगों को घड़ी देखकर टॉयलेट आती है क्या?’ कइयों ने कहा, हां और कइयों ने स्वीकारा कि दिन में जाने का जोर आए तो दबा देते हैं।
कितनी अजीब है ये दुनिया। टायलेट जाते भी औरतों को शर्म आती है, मानो कोई सीक्रेट पाप कर रही हों। जिस कमरे से होकर बाथरूम के लिए जाना पड़ता है, या जिस कमरे से अटैच बाथरूम है, उस कमरे में अगर जेठ जी, ससुर या कोई भी पुरुष बैठा है तो मेरी दीदियां, भाभियां, मामियां और घर की औरतें रसोई में चुपाई बैठी रहेंगी, लेकिन बाथरूम नहीं जाएंगी। बोलेंगी, ‘नहीं, नहीं, वो जेठजी बैठे हैं।’ हर दो मिनट पर झांकती रहेंगी, दबाती रहेंगी, लेकिन जाएंगी नहीं। जेठजी तो गेट के बाहर गली खड़े होकर करने के लिए भी दो मिनट नहीं सोचते। बहुएं मरी जाती हैं।
जेठ-बहू को जाने दें तो पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़कियों के दिमाग भी कुछ खास रौशनख्याल नहीं हैं। इंदौर में वेबदुनिया में लेडीज टॉयलेट का रास्ता एक बड़े केबिन से होकर गुजरता था, जहां सब पुरुष काम कर रहे होते थे। वहां भी लड़कियां बाथरूम जाने में संकोच करती थीं। कहतीं,
‘सब बैठे रहते हैं वहां पर, सबको पता चल जाएगा कि हम कहां जा रहे हैं।’
‘अरे तो चलने दो न पता, कौन सा तुम अभिसार पर जा रही हो।’
‘अभिसार मतलब।’
‘अभिसार मतलब रात में छिपकर अपने प्रेमी से मिलने जाना। अभिसार पर जाने वाली अभिसारिका।’
‘तुम बिलकुल बेशर्म हो।’
‘इसमें बेशर्म की क्या बात है। अभिसार में शरमाओ तो समझ में भी आता है। लेकिन बाथरूम जाने में कैसी शर्म। जो लोग वहां बैठे हैं, वो नहीं जाते क्या।’
‘नहीं यार, अच्छा नहीं लगता।’
ऐसे ही इस दुनिया को जाने क्या-क्या अच्छा नहीं लगता। आपकी बाकी चीजें तो अच्छी नहीं ही लगतीं, लेकिन अब आप पानी पीना, बाथरूम जाना भी छोड़ दीजिए। लोगों को अच्छा जो नहीं लगता।
ये इतनी स्वाभाविक जरूरत है, लेकिन इसके बारे में हम कभी बात नहीं करते। बच्चा पैदा होते साथ ही रोने और दूध पीने के बाद पहला काम यही करता है, लेकिन औरतों के बाथरूम जाने को लेकर समाज ऐसे पिलपिलाने लगता है मानो बेहया औरतें भरे चौराहे आदमी को चूम लेने की बेशर्म जिद पर अड़ आई हों। ‘नहीं, हम तो यहीं चूमेंगे, अभी इसी वक्त।’
हम कोई अतिरिक्त सहूलियत की बात नहीं कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि बहुत मानवीय, उदात्त, गरिमामय समाज की डिमांड की जा रही है। प्लीज, प्यार कर सकने लायक खुलापन दीजिए समाज में, इतना कि अपने दीवाने को हम चूम सकें। रात में समंदर किनारे बैठकर बीयर पीना चाहें तो पीने दीजिए। हल्द्वानी-नैनीताल की बीच वाली पहाड़ी पर रात में बैठकर सितारों को देखने दीजिए। नदी में तैरने दीजिए, आसमान में उड़ने दीजिए। राहुल सांकृत्यायन की तरह पीठ पर एक झोला टांगे बस, Truck, टैंपो, ऑटो, बैलगाड़ी, ठेला जो भी मिले, उस पर सवार होकर दुनिया की सैर करने दीजिए। अपनी बाइक पर हमें मनाली से लेह जाने दीजिए और बीच में अपनी नाक मत घुसाइए, प्लीज। प्यार की खुली छूट दीजिए या फ्री सेक्स कर दीजिए।
ऐसा तो कुछ नहीं मांग रहे हैं ना। बस इतना ही तो कह रहे हैं कि बाथरूम करने दीजिए। घूरिए मत, ऐसी दुनिया मत बनाइए कि बाथरूम जाने में भी हम शर्म से गड़ जाएं। इतने पब्लिक टॉयलेट तो हों कि सेल्स गर्ल, एलआईसी एजेंट या हार्डकोर रिपोर्टर बनने वाली लड़कियों को यूरीनरी इंफेक्शन होगा ही होगा, ये बहार आने पर फूल खिलने की तरह तय हो।
प्लीज, ये बहुत नैचुरल, ह्यूमन नीड है। इसे अपने सड़े हुए बंद दिमागों और कुंठाओं की छिपकलियों से बचाइए। सब रेंग रही हैं और हम अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं।
समाप्त।
साभार :- Posted by मनीषा पांडे (बेदखल की डायरी ..से)
Sunday, 28 August 2011
अपवित्र स्त्री जीवन
अभी कुछ समय पहले खबर थी कि मलेशिया में स्थापित किया गया है। जिस वक्त यह खबर पढ़ी, तभी से मन में ख्याल आया कि हमारे धर्म और इस्लाम में कितनी समानताएं हैं। हमारे यहां भी लड़कियों को शुरू से समझाया जाता है कि पति परमेर होता है। हर पतिव्रता नारी का कर्तव्य है कि वह अपने पति परमेर के हर आदेश को ईर का आदेश समझ कर उसका पालन करे। यही बात इस्लाम में भी कही गयी है। इसके बाद स्वाभाविक रूप से मेरे मन में उत्सुकता जगी कि हमारा तीसरा प्राचीन और लोकप्रिय धर्म यानी ईसाई धर्म स्त्रियों के लिए क्या निर्देश देता है या फिर ईसाई धर्म में स्त्रियों की क्या स्थिति है, तो वहां भी स्त्रियों के लिए कमोबेश वही निर्देश थे जो हिन्दू और इस्लाम में हैं। अब मैंने नेट पर बौद्ध, जैन और दूसरे धर्मों में स्त्रियों की स्थिति के बारे में उपलब्ध जानकारी को कुछ दूसरी साइट्स को देखा। वहां से पता चला कि लगभग हर धर्म इंसान के रूप में स्त्री और पुरुष में भेदभाव करता है। इससे पहले मैंने कभी भी इस विषय में गहराई से विचार नहीं किया था। अभी तक तो नारीवादियों द्वारा नारी को दोयम दर्जा दिए जाने की बात मुझे हमेशा मजाक ही लगाती थी क्योंकि समाज में मैंने बहुत से पुरु षों को अपनी घरवालियों के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत कार्य करते देखा था। मैंने ऐसे घर भी देखे हैं, जहां गृहस्वामिनी की अनुमति के बिना घर में पत्ता भी नहीं खड़कता। ऐसे में महिलाओं पर अत्याचार और उनके साथ भेदभाव की बात मुझे अतिशयोक्ति ही लगती थी। स्त्री स्वतंत्रता के समर्थक समाज में जिन बातों का विरोध करते नजर आते हैं, उन सब बातों के पीछे मुझे कहीं न कहीं महिलाओं की भलाई ही नजर आती थी पर इस बार मुझे हमारे धर्मो में वर्णित एक तर्क बिल्कुल भी समझ नहीं आया। मैंने देखा कि सभी धर्मों में माना जाता है कि स्त्री अपवित्र है। जैनियों की मान्यता है कि स्त्री पुरुष योनि में जन्म लिए बिना मुक्ति नहीं पा सकती। हमारे धर्मों का तर्क देखिए- स्त्री अपवित्र है क्योंकि उसे मासिक स्रव होता है। इस दौरान स्त्री को आराम मिलना चाहिए पर इस वजह से स्त्री के पूरे अस्तित्व को अपवित्र मान लेने की बात मुझे बिल्कुल भी हजम नहीं हुई। अजीब सा विरोधाभास है। जो भी धर्म यह बात कहता है की स्त्री अपवित्र है या फिर ईर के समक्ष वह पुरु ष से कहीं भी कम है, वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता। साभार :- सहारा हिंदी पेपर , आधी दुनिया | ||
Saturday, 27 August 2011
विद नमकीन चार आने की पी...
Himanshu Bajpai ने लिखा है , मुझे यह अपनी दोस्त Arima के पोस्ट से प्राप्त हुआ .
समय निकाल कर जरूर पढ़े.
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चवन्नी की विदाई का वक्त है इसलिए पूरे मुल्क के साथ लखनऊ का दिल भी बुझा-बुझा सा है. क्योंकि ये वो अमीर शहर है जिसने हमेशा चवन्नी को भी सर आंखों पर उठाया है. सुबूत चाहिए तो आफताब लखनवी के कुछ अश्आर आपकी खिद्मत में पेश किए दे रहा हूं-
मै अगर छू लूं चवन्नी को अधन्ना हो जाए
‘वो’ अगर बांस को छू ले तो गन्ना हो जाए (वो=महबूबा)
***
मेरे वालिद अपना बचपन याद करके रो दिए
इतनी सस्ती थी कि विद नमकीन चार आने की पी
पूरी बोतल मेरा छोटा भाई तन्हा पी गया
मैने मजबूरी में लस्सी भर के पैमाने में पी
ये अलग बात है कि नए दौर के लखनऊ ने आफताब लखनवी को ज़मानों पहले भुला दिया और दस बीस बरस में चवन्नी भी उसके ज़हन से गैर हाजिर हो जाएगी. वो चवन्नी जो कभी लखनऊ की ज़बान और बयान के आगे आगे चलती थी. लखनऊ के मकबूल तहज़ीबी जुमलों में चवन्नी का अच्छा खासा दखल था.
अगर किन्ही हज़रत में मर्दानगी कम है तो उनके लिए कहा जाता था कि ‘अमां उनकी चवन्नी कम है’. अगर कोई मोहतरम अक्ल से पैदल हैं तो उनके लिए गढ़ा गया जुमला था कि ‘अमां फुलां साहब चवन्नी गिराए घूमते हैं.’ और अगर कोई कंजूस है तो उसके लिए- ‘अमां छोड़िए वो तो रूपए में पांच चवन्नी बनाते हैं.’ हालांकि तमाम लखनवी तहज़ीब के इन तमाम एजाजो-इकबाल के बावजूद चवन्नी के फेयरवेल के दिन जो मुहावरा मैने सबसे ज्यादा सुना वो‘चवन्नीछाप’ का था, जिसे सुनकर शायद चवन्नी भी दिल शिकस्ता (टूटे हुए दिल वाली) हो जाती होगी.
जहां तक मेरी जानकारी है ये मुहावरा 80 के दशक में कानपुर में उपजा और बाद में पूरे हिन्दोस्तान में बीमारी की तरह फैला. होता यूं था कि कानपुर से एक दौर में नौटंकी की पार्टियां पूरे देश में जाती थीं. इनमें उत्तेजक प्रसंग आने पर दर्शक मंच की तरफ चवन्नियां उछालते थे. बाद में ये चलन सिनेमा हाल तक जा पहुंचा. इन्ही लोगों को चवन्नी छाप कहा जाता था. मुहावरा पूरी तरह इंसानी मेयार बताने के लिए था लेकिन बाद में चवन्नी का मेयार भी इसी से तय होने लगा. दुनिया ये भूल गई कि इसी चवन्नी से बचपन अपने बेशुमार ख्वाब खरीद लेता था.
बहुत पुरानी बात नहीं है जब लखनऊ में चिच्चा(पन्नी की छोटी पतंग) और डग्गा(कागज की छोटी पतंगें जिनके पीछे छोटी सी पूंछ लगी होती है.)पतंगों की कीमत चवन्नी हुआ करती थी. दो चवन्नी मिलाकर मै और मेरा भाई सुपर कमांडो ध्रुव नागराज या डोगा की एक कामिक्स किराए पर लाते थे,जिसे पढ़ते पढ़ते ही मै निराला, मीर और तहलका तक पहुंचा. 25 पैसे में इनाम खोलने का एक कूपन मिलता था जिसमें कभी कभी घड़ी और मिथुन या धरमिंदर का बड़ा पोस्टर तक हाथ लग जाता था. शक्तिमान का स्टिकर भी चवन्नी में ही दस्तयाब था. मांएं अपने बच्चों को नज़र और हाय से बचाने के लिए चवन्नी की शरण में ही जाती थी. फिर बच्चे अपनी करधनी और गले से चवन्नी लटकाए घूमते थे. यही नहीं आंख दुखने पर मां जो देसी ट्यूब (जिसे आम जुबान में गल्ला कहते हैं,) बच्चे के लगाती थी वो भी चवन्नी का मिलता था. इसके साथ ही संतरे की वो सदाबहार टाफियां भी याद आती हैं जो मेरे पूरे बचपन भर ‘चवन्नी की दो वाली’ संज्ञा से ही नवाज़ी जाती रहीं. (अंग्रेजी में मजबूत कुछ बच्चे इन्हे आरेंज वाली टाफी भी कहते थे). इसी तरह कुछ टाफियों का नाम 'चवन्नी वाली' भी था. संतरे की फांक जैसा लैमनजूस या लैमनचूस (पता नहीं इसका सही नाम क्या होता है,) भी चवन्नी का ही मिल जाता था.
बचपने का रिजर्व बैंक यानि गुल्लक को तोड़कर अपनी अमीरी दिखाने के लिए जब सिक्कों की कुतुब मीनार बनाई जाती थी तो उसकी सबसे ऊपरी मंजिल भी चवन्नी से ही बनती थी. ये भी कहा जाता था कि चवन्नी को अगर कड़वे तेल में डुबो कर रेलगाड़ी के नीचे रख दो तो वो चुम्बक बन जाती है, कई दफा ये प्रयोग मैने भी सिटी स्टेशन और चारबाग की पटरियों पर आजमाया लेकिन सफल नहीं रहा. चवन्नी को उंगली की चोट से देर तक घुमाने की प्रतियोगिताएं भी खूब होती थी जिसमें इनाम वही चवन्नी होती थी. स्कूल के बाहर काला वाला तेज़ाब मिला हुआ चूरन भी चवन्नी में एक पुड़िया मिल जाता था जो कि जबान पर छाला निकालने के लिए काफी होता था. इसी तरह आइसक्रीम के ठेलों पर डिस्को नाम की एक आकर्षक चीज (पन्नी में भरा ठंडा रंगीन मीठा पेय) का दाम भी 25 पैसे था.
लेकिन फिर एक वक्त और भी आया जब इसी चवन्नी के दिन ऐसे बदले कि सफर पर जाते वक्त ढूढ ढूढ के चवन्नियां रखी जाने लगी. भिखारियों को देने के लिए. और भिखारी भी इन्हे, देने वालों को चवन्नीछाप कहके वापस कर देने लगे. बच्चों ने चवन्नी लेकर दुकान जाना बंद कर दिया और अगर कोई बच्चा पहुंच गया भी तो दुकानदार ने बनियागिरी दिखाते हुए उसका दिल तोड़कर उसे ये कहते हुए लोटा दिया कि चवन्नी नही चलेगी. जबकि मुझे घर के पास वाला बनारसी आज भी याद है जिसने मुझे 25 पैसे की इमली की गोली एक बिस्सी यानी 20 पैसे में इस शर्त के साथ दी थी कि मै पंजी या 5 पैसे उसे बाद में दे दूंगा. हालांकि मै उन्हे कभी दे नहीं पाया और पता नहीं बनारसी दादा कहां चले गए. चवन्नी के बंद होने पर व्यवहारिक रूप से कोई क्षोभ जरूरी नहीं है. लेकिन फिर भी चूंकि ये घटना अतीत के खूबसूरत पन्ने दोबारा पलट गई है इसलिए माहौल का जज्बाती होना लाजिमी है. पहले बनारसी दादा गए, फिर बचपन गया और आज बचपन के खजाने का सबसे बड़ा सिक्का यानि चवन्नी भी रूखसत हो गई.
बेशर्मी मोर्चा - Walk Walk बदलो-बदलो बदलो
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यह मार्च सादा था, बिना शोर-शराबे और दिखावे का था। स्त्रीवादी मुहिम ना होने के बावजूद सड़क पर स्लोगनों और पोस्टरों के साथ निकली लड़कियों के साथ ढेरों लड़कों ने आकर पहली बार जता दिया कि वे उनकी पीड़ा बांट रहे हैं। सोच बदलने और अपने भीतर की गंदगी को निकाल फेंकने के जोशीले वॉक पर स्पर्धा
‘दिस इज नॉट एन इंविटेशन टू रेप मी‘ जैसे स्लोगन लिखे कपड़ों को पहने लड़कियां जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुई। लोगों की सोच के विपरीत इस स्लटवॉक अर्थात बेशर्मी मोर्चा का आयोजन केवल कपड़े पहनने की स्वतंत्रता के लिए नहीं किया गया था। इस मोच्रे का आयोजन विचारों में खुलेपन लाने के लिए किया गया था। कपड़े चाहे छोटे हों या बड़े, खाने का मन चाहे पिज्जा का हो या रोटी का, वकील बनने का मन हो या घर संभालने का, मनमर्जी शादी करने का, जब बात किसी व्यक्ति की हो रही है तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता है कि उसकी क्या ख्वाहिश है और वह क्या पाना चाहता है। यही वजह रही कि इस स्लटवॉक को समझने में कुछ लोग चूक गए। इसे महज कपड़ों के मामले में उलझा समझ लिया गया, जबकि यहां बात हर मामले में स्वतंत्रता और अपने हक की लड़ाई की है। यह लड़ाई सिर्फ पुरुषों से नहीं बल्कि समाज के हर उस व्यक्ति, संस्था, रीति-रिवाज और परिपाटी से है, जो मुक्ति को बांधे बैठी है। यह वॉक उन महिलाओं द्वारा की गई शुरुआत नहीं है, जो खादी की साड़ी में लिपटी, बड़ी बिंदी लगाए और चप्पल पहने औरतों के हक की लड़ाई लड़ती हैं। यह वॉक उन लड़कियों द्वारा शुरू की गई है, जो जमीनी स्तर पर काम नहीं कर रहीं लेकिन इन्हें पता है कि किस तरह की दिक्कतों का सामना ये करती हैं। सरे राह छेड़छाड़ हो या कपड़ों पर फब्ती, सिर्फ पुरुष ही नहीं, पुरुष मानसिकता वाले लोग लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार का ठीकरा उनके कपड़ों पर ही फोड़ते हैं।
हां, यह जरूर है कि स्लटवॉक मुहिम की शुरुआत टीनएजर द्वारा शुरू की गई है, जो सही तरह से महिलाओं की परेशानियों और मुद्दों को अभी गहराई से समझती नहीं है। तभी तो जब इसे आयोजित करने वाली उमंग सभरवाल आगे के कदम पर निरुत्तर हो जाती है। बस केवल यही कहती है कि मैं इसे बढ़ाना चाहती हूं लेकिन आगे के कदम के बारे में कुछ सोचा नहीं है। यह उमंग की कम उम्र का ही असर है कि उसे इस वॉक का भविष्य नजर नहीं आ रहा। यही वजह है कि मुंबई में सितम्बर में होने वाले स्लटवॉक के बारे में उमंग को कुछ पता नहीं। वह बस यही कहती है कि यदि उन्हें मेरी कोई मदद चाहिए, तो मैं यहां मौजूद हूं। दरअसल, अपने यहां यही तो दिक्कत है। औरतों के हक की लड़ाई सामूहिक तौर पर नहीं लड़ी जाती। सबने अपने-अपने मोच्रे खोल लिए हैं। सभी अपनी तरह से लड़ रहे हैं। यह बात उन्हें समझ ही नहीं आती कि जब तक सामूहिक तौर पर इस समाज से लड़ा नहीं जाएगा, तब तक कुछ हासिल नहीं होने वाला, कोई हवा नहीं बदलने वाली। शायद जब मामला और बड़ा होगा, इससे न केवल मेट्रो बल्कि कस्बों और गांवों की युवतियां भी जुड़ेंगी तो औरतवादी हक के पक्ष में लड़ने के लिए मसले भी कई होंगे। तब केवल पहनावा या अपनी स्वतंत्रता के लड़ने के मुद्दे के अलावा भ्रूण हत्या, दहेज, घरेलू हिंसा, प्रेमी प्रताड़ना जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे और लड़े जाएंगे। हां, 19 साल की उमंग के दिमाग में यह जरूर साफ है कि वह फेमिनिस्ट नहीं, उसकी लड़ाई इंसानियत के हक की है। दरअसल, हमें समझने की जरूरत है कि उमंग सभरवाल समाज के उस तबके से आती है, जो अपर मिडिल क्लास है, जिसकी अलग समस्याएं है, जो गांव-कस्बों की लड़कियों की समस्याएं को नहीं समझ पाते।
स्लटवॉक न केवल पुरुषों के खिलाफ हो, बल्कि यह ’रन‘ उस समाज के खिलाफ हो, जहां लड़कियों पर कानून कसने वालों का शिंकजा बुरी तरह से हावी रहता है। यह न पहनो, ऐसे न करो, यहां न जाओ, यह मत खाओ, जैसे कहने वालों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए हो स्लटरन। मॉडर्न ड्रेस पहन लिए और किसी ने फब्ती कस दी तो साथ वाली कहती है, यार! तुझे ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए थे। भला कोई दूसरा यह कैसे तय कर सकता है कि किसी को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं? हमें किस तरह से चलना चाहिए, किस तरह से ऑफिस जाना चाहिए, यह दूसरा तय नहीं कर सकता। इसे तय करेगा खुद वही, जिसे चलना है। औरतों पर पाबंदी लगाने को भला हम टीवी चैनलों को कैसे भूल सकते हैं? भारी-भरकम साड़ी और लदे- फदे गहनों में टीवी की ये औरतें इस स्लटवॉक का उपहास उड़ाती दिखती हैं। इन दिनों टीवी पर एक धारावाहिक आ रहा है, जिसमें बहू को डॉक्टरी की पढ़ाई की इजाजत तो मिल गई लेकिन वह मेडिकल कॉलेज भी गहनों में लदी- फंदी जाती है। अब भला यह तो वही बता सकती है कि भारी साड़ी और गहनों में वह किस तरह पढ़ाई करती होगी और किस तरह लैब में चीर- फाड़ करती होगी। फेसबुक पर शुरू की गई इस मुहिम को कइयों ने पसंद किया तो कइयों की सोच थोड़ी अलग सी दिखी। लोगों ने इसे गलत तरीके से सोचा भी और समझा भी। कुछ ने तो इसे सिर्फ लड़कियों के पहनावे से जोड़कर देख लिया। कुछ ने फेसबुक के इस पन्ने पर निगेटिव कमेंट्स भी दे मारे। ऐसे लोगों के बारे में उमंग कुछ कहना नहीं चाहती। वह बस यही कहती है कि इनकी मानसिकता ठीक नहीं।
हमारा मुद्दा सिर्फ यही है कि किसी के व्यक्तित्व पर कोई दूसरा हक नहीं जमा सकता। फेसबुक के इसी पन्ने पर ऋचा शर्मा कहती हैं कि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबारों में स्लटवॉक के बारे में पढ़ा है। मैं उन लड़कियों में हूं, जिनके माता-पिता यह सोचते हैं कि लड़कियों के पहनावे की वजह से ही उनके साथ गलत है। मैं चाहती हूं कि उनकी भी मानसिकता बदले। अपनी आजादी को लेकर लड़कियों द्वारा निकाली गई इस रैली को कैश करने की कोशिश में कई लोग गए हैं। इनमें मुख्य नाम पूनम पांडे का है। इन्हें पहचान की तो दरकार नहीं, फिर भी लाइमलाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करना चाहिए। सो, दिल्ली के स्लटवॉक की नकल करते हुए मुंबई में होने वाले स्लटवॉक की अगुवाई का जिम्मा इन्होंने उठाया है। कहती हैं कि काश! मैं दिल्ली स्लटवॉक का हिस्सा बनती। पूनम को क्या किसी ने मना किया था कि दिल्ली आने के लिए उन्हें किसी बात का डर था? अब यह तो पूनम ही जानें लेकिन यह जरूर तय है कि उमंग द्वारा शुरू किए गए बेशर्मी मोच्रे की शुरुआत हो चुकी है। इसे बड़े मोच्रे पर ले जाने की जरूरत है ताकि यह मसला लड़कियों की आजादी का बन जाए ताकि यह मसला स्त्रियों के हर उस हक का बन जाए, जिसकी वे हकदार हैं। इसे केवल ’वॉक‘ नहीं बल्कि ’रन‘ बनाने की जरूरत है। (फेसबुक कमेंट्स पेज 2 पर भी)
हां, यह जरूर है कि स्लटवॉक मुहिम की शुरुआत टीनएजर द्वारा शुरू की गई है, जो सही तरह से महिलाओं की परेशानियों और मुद्दों को अभी गहराई से समझती नहीं है। तभी तो जब इसे आयोजित करने वाली उमंग सभरवाल आगे के कदम पर निरुत्तर हो जाती है। बस केवल यही कहती है कि मैं इसे बढ़ाना चाहती हूं लेकिन आगे के कदम के बारे में कुछ सोचा नहीं है। यह उमंग की कम उम्र का ही असर है कि उसे इस वॉक का भविष्य नजर नहीं आ रहा। यही वजह है कि मुंबई में सितम्बर में होने वाले स्लटवॉक के बारे में उमंग को कुछ पता नहीं। वह बस यही कहती है कि यदि उन्हें मेरी कोई मदद चाहिए, तो मैं यहां मौजूद हूं। दरअसल, अपने यहां यही तो दिक्कत है। औरतों के हक की लड़ाई सामूहिक तौर पर नहीं लड़ी जाती। सबने अपने-अपने मोच्रे खोल लिए हैं। सभी अपनी तरह से लड़ रहे हैं। यह बात उन्हें समझ ही नहीं आती कि जब तक सामूहिक तौर पर इस समाज से लड़ा नहीं जाएगा, तब तक कुछ हासिल नहीं होने वाला, कोई हवा नहीं बदलने वाली। शायद जब मामला और बड़ा होगा, इससे न केवल मेट्रो बल्कि कस्बों और गांवों की युवतियां भी जुड़ेंगी तो औरतवादी हक के पक्ष में लड़ने के लिए मसले भी कई होंगे। तब केवल पहनावा या अपनी स्वतंत्रता के लड़ने के मुद्दे के अलावा भ्रूण हत्या, दहेज, घरेलू हिंसा, प्रेमी प्रताड़ना जैसे मुद्दे भी शामिल होंगे और लड़े जाएंगे। हां, 19 साल की उमंग के दिमाग में यह जरूर साफ है कि वह फेमिनिस्ट नहीं, उसकी लड़ाई इंसानियत के हक की है। दरअसल, हमें समझने की जरूरत है कि उमंग सभरवाल समाज के उस तबके से आती है, जो अपर मिडिल क्लास है, जिसकी अलग समस्याएं है, जो गांव-कस्बों की लड़कियों की समस्याएं को नहीं समझ पाते।
स्लटवॉक न केवल पुरुषों के खिलाफ हो, बल्कि यह ’रन‘ उस समाज के खिलाफ हो, जहां लड़कियों पर कानून कसने वालों का शिंकजा बुरी तरह से हावी रहता है। यह न पहनो, ऐसे न करो, यहां न जाओ, यह मत खाओ, जैसे कहने वालों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए हो स्लटरन। मॉडर्न ड्रेस पहन लिए और किसी ने फब्ती कस दी तो साथ वाली कहती है, यार! तुझे ऐसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए थे। भला कोई दूसरा यह कैसे तय कर सकता है कि किसी को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं? हमें किस तरह से चलना चाहिए, किस तरह से ऑफिस जाना चाहिए, यह दूसरा तय नहीं कर सकता। इसे तय करेगा खुद वही, जिसे चलना है। औरतों पर पाबंदी लगाने को भला हम टीवी चैनलों को कैसे भूल सकते हैं? भारी-भरकम साड़ी और लदे- फदे गहनों में टीवी की ये औरतें इस स्लटवॉक का उपहास उड़ाती दिखती हैं। इन दिनों टीवी पर एक धारावाहिक आ रहा है, जिसमें बहू को डॉक्टरी की पढ़ाई की इजाजत तो मिल गई लेकिन वह मेडिकल कॉलेज भी गहनों में लदी- फंदी जाती है। अब भला यह तो वही बता सकती है कि भारी साड़ी और गहनों में वह किस तरह पढ़ाई करती होगी और किस तरह लैब में चीर- फाड़ करती होगी। फेसबुक पर शुरू की गई इस मुहिम को कइयों ने पसंद किया तो कइयों की सोच थोड़ी अलग सी दिखी। लोगों ने इसे गलत तरीके से सोचा भी और समझा भी। कुछ ने तो इसे सिर्फ लड़कियों के पहनावे से जोड़कर देख लिया। कुछ ने फेसबुक के इस पन्ने पर निगेटिव कमेंट्स भी दे मारे। ऐसे लोगों के बारे में उमंग कुछ कहना नहीं चाहती। वह बस यही कहती है कि इनकी मानसिकता ठीक नहीं।
हमारा मुद्दा सिर्फ यही है कि किसी के व्यक्तित्व पर कोई दूसरा हक नहीं जमा सकता। फेसबुक के इसी पन्ने पर ऋचा शर्मा कहती हैं कि मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबारों में स्लटवॉक के बारे में पढ़ा है। मैं उन लड़कियों में हूं, जिनके माता-पिता यह सोचते हैं कि लड़कियों के पहनावे की वजह से ही उनके साथ गलत है। मैं चाहती हूं कि उनकी भी मानसिकता बदले। अपनी आजादी को लेकर लड़कियों द्वारा निकाली गई इस रैली को कैश करने की कोशिश में कई लोग गए हैं। इनमें मुख्य नाम पूनम पांडे का है। इन्हें पहचान की तो दरकार नहीं, फिर भी लाइमलाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करना चाहिए। सो, दिल्ली के स्लटवॉक की नकल करते हुए मुंबई में होने वाले स्लटवॉक की अगुवाई का जिम्मा इन्होंने उठाया है। कहती हैं कि काश! मैं दिल्ली स्लटवॉक का हिस्सा बनती। पूनम को क्या किसी ने मना किया था कि दिल्ली आने के लिए उन्हें किसी बात का डर था? अब यह तो पूनम ही जानें लेकिन यह जरूर तय है कि उमंग द्वारा शुरू किए गए बेशर्मी मोच्रे की शुरुआत हो चुकी है। इसे बड़े मोच्रे पर ले जाने की जरूरत है ताकि यह मसला लड़कियों की आजादी का बन जाए ताकि यह मसला स्त्रियों के हर उस हक का बन जाए, जिसकी वे हकदार हैं। इसे केवल ’वॉक‘ नहीं बल्कि ’रन‘ बनाने की जरूरत है। (फेसबुक कमेंट्स पेज 2 पर भी)
यह प्रेरणा देने वाला है कि समाज में व्याप्त बुराइयों से लड़ने के लिए हम आगे बढ़े हैं..लेट्स गो पीपल
हम लड़कियां हैं..और हमेशा रहेंगी.हम भी निर्णय ले सकती हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या गलत..!!
मुझे लगता है कि अब की लड़कियां समझदार हैं..वे जानती हैं कि उन्होंने क्या पहना है और उन कपड़ों को कैसे कैरी करना है..ये तो कुछ मूर्ख लो ग हैं, जिनकी मानसिकता छोटी है..जिनके लिए आप कुछ नहीं कर सकते..
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........................................................राष्ट्रीयसहारा समय लाइव ' आधी दुनिया ' के साभार से
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Saturday, 6 August 2011
कम होती बच्चियां. .मधु पूर्णिमा किश्वर
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लगातार गिरता बाल लिंग अनुपात, खासकर छह साल की उम्र में प्रति 1,000 बालकों की तुलना में गिरती बालिकाओं की संख्या, इसका सुबूत है कि हमारे देश में गर्भस्थ शिशु का लिंग पता करने की दुष्प्रवृत्ति को रोकने से संबंधितकानून कितना लचर है। छह साल तक के आयु वर्ग में बालिकाओं का घटता अनुपात दरअसल कन्या भ्रूणहत्या का नतीजा है, जो गर्भस्थ शिशु के लिंग की जांच का परिणाम है। देश के दो अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों, पंजाब और हरियाणा, में लिंगानुपात सबसे खराब है। इससे यह पता चलता है कि राष्ट्रीय राजधानी के नजदीक भी गर्भस्थ शिशु के लिंग की जांच के खिलाफ कानून व्यावहारिक तौर पर कितना लचर है।
वर्ष 1961 में छह वर्ष तक के आयु वर्ग में प्रति 1,000 बालकों पर 978 बालिकाएं थीं। वर्ष 2001 तक आते-आते प्रति हजार बच्चों पर बच्चियों की संख्या घटकर 727 रह गई थी। 2011 की ताजा जनगणना में यह अनुपात और कम होकर 914 रह गया है। हालांकि कुल मिलाकर स्त्री-पुरुष अनुपात में ऐसी कमी नहीं आई है। वर्ष 1961 में प्रति 1,000 पुरुष पर 941 महिलाएं थीं, जबकि 2011 की जनगणना में प्रति हजार पुरुष पर 940 महिलाएं हैं। 1980 तक छह वर्ष के आयु वर्ग में भी प्रति हजार बालक पर बालिकाओं की संख्या आज की तुलना में कहीं अधिक थी। इसलिए जनसंख्या में बालिकाओं का घटता अनुपात चिंताजनक है।
इन विरोधाभासी प्रवृत्तियों की एक वजह शायद यह है कि गर्भस्थ शिशु की लिंग जांच के बाद भ्रूणहत्या कर परिवार जहां अवांछित बच्चियों से छुटकारा पा लेते हैं, वहीं वे ही बच्चियां जिंदा रहती हैं, जिन मां-बापों को बेटियों की चाह होती है; ऐसे में इन बच्चियों की बेहतर देखभाल होती है। चूंकि पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक मेहनती और लचीली होती हैं, इसलिए अगर पोषण और स्वास्थ्य के मोरचे पर उनसे भेदभाव न हो, तो अधिक उम्र तक जीती हैं।
2001 से 2011 के बीच बुजुर्गों के लिंगानुपात में आई मामूली गिरावट आई है, तो उसकी वजह शायद यह है कि अपने यहां मध्य आयु के पुरुषों की मृत्यु दर अधिक है। उदाहरण के लिए, मध्य आयु वर्ग में हार्ट अटैक से मरने वाले पुरुषों की संख्या स्त्रियों की तुलना में कहीं अधिक है। भारतीय महिलाओं की तुलना में भारतीय पुरुष मोटापे से जुड़ी बीमारी, मद्यपान, धूम्रपान और ड्रग्स जैसी रहन-सहन से संबंधित आदतों के शिकार ज्यादा होते हैं।
रहन-सहन से जुड़ी बुरी आदतों को दूर करना आसान है, लेकिन छह वर्ष तक के आयु वर्ग में बालिकाओं की संख्या में आई गिरावट जिस सामाजिक विकृति का नतीजा है, उसका कोई आसान समाधान नहीं है। अगर सरकारी अधिकारियों, खासकर आईएएस अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों और सांसदों, विधायकों, पंचायत सदस्यों और पार्षदों के परिवारों की अलग जनगणना हो, तो बेहद दिलचस्प नतीजे आएंगे। इनका लिंगानुपात राष्ट्रीय अनुपात से कम ही होगा। अगर समृद्ध तबकों में कन्या भ्रूणहत्या रोकने के लिए सरकार सख्त कानून लागू करे, तो संभवतः बेटे की चाह रखने वाली रुग्णमानसिकता पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
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साथियो , लेख पर अपना मत और अपने क्रिटिक जरूर लिखे ...
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