जेंडरगत भेदभाव
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कैबिनेट द्वारा लाए गए बलात्कार निरोधक कानून को लेकर पिछले कुछ दिनों से कई तरह की भ्रांतियां बनी हुई हैं। हालांकि कुछ संशोधनों के साथ अब राजनीतिक दलों में मसौदे पर सैद्धांतिक सहमति बनी है। असली भ्रम सहमति से यौन संबंध बनाने की उम्र, बलात्कार कानून के अलावा इससे जुड़ी सजा व दुष्परिणाम को लेकर है
यौन संबंध की सहमति की उम्र 18 साल से घटाकर सरकार द्वारा अचानक 16 साल नहीं की गयी है। हालांकि अनेक राजनीतिक दलों के विरोध को देखते हुए सरकार इस मामले पर पुनर्विचार कर रही है और संकेत हैं कि यह आयु 18 वर्ष ही रखी जाएगी। मालूम हो कि भारत में सहमति की उम्र 1983 से लेकर अभी कुछ महीने पहले तक 16 वर्ष ही थी। इस मामले में सिर्फ चार महीने पहले आवाज बुलंद हुई। इसे 18 वर्ष किए जाने को लेकर मामला गर्माया और चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट (पीओसीएसओ) सामने आया। यह मामला अध्यादेश के आने के एक महीने पहले का है। सहमति की उम्र 16 वर्ष किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि किशोरों या टीन्स को सेक्स करने का लाइसेंस मिल गया या उसे बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। बहस इस पर नहीं है कि टीनएज सेक्स अच्छा है या खराब, बल्कि बहस का केंद्र यह है कि टीन्स के बीच सहमति से किया गया सेक्स बलात्कार के तौर पर परिभाषित किया जा सकता है या नहीं। क्योंकि आपराधिक कानून में नैतिक या सामाजिक संहिता जैसा कुछ भी नहीं है। यदि सहमति की उम्र 18 बढ़ायी जाती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि 16 से 18 वर्ष के बीच के लड़के को बलात्कारी या यौन दोषी के तौर पर सजा दी जा सकती है जबकि उसके समान उम्र की उसकी गर्लफ्रेंड साफ तौर पर कह रही होगी कि उसकी मर्जी से उसके दोस्त ने यह सबकुछ किया। जब शादी की उम्र 18 साल है तो सहमति से सेक्स करने की उम्र में अंतर क्यों है? इस मामले में पहली बात यह कि यदि कोई नाबालिग लड़का किसी नाबालिग लड़की से शादी करता है तो बाल विवाह कानून के तहत उस लड़के को सजा नहीं मिलेगी। लेकिन जब नाबालिग लड़का अपने समान उम्र की नाबालिग लड़की को उसकी मर्जी से बांहों में लेता है, चूमता है या सेक्स करता है तो उसे यौन अपराधी या बलात्कारी के तौर पर सजा हो सकती है। बाल विवाह के खिलाफ कानून माता-पिता को नाबालिग बच्चों के जीवन के फैसले लेने से रोकता है। वह युगल को इस बात का अधिकार भी देता है कि वे बालिग होंगे तो वे शादी बरकरार रखना चाहते हैं या नहीं, यह उन पर निर्भर है। यह बात सत्य है कि 16 से 18 के बीच की अवस्था में चिकित्सा विज्ञान भी गर्भधारण को उचित नहीं मानता। उन्हें सेक्स करने से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन उस उम्र में एक-दूसरे के प्रति प्राकृतिक तौर पर आकर्षित होना हकीकत है। ऐसे में वयस्कों को यह समझाने की जरूरत है कि वे अपने शरीर को समझें, उन्हें सम्मान दें और आकर्षण में न बहें और प्रेम के प्रति जिम्मेदार बनें। ऐसे में यौन आकर्षण उन्हें अपराधी तक बना सकता है और निदरेष वयस्क बलात्कारी सिर्फ इसलिए बन जाता है क्योंकि उसने अपने हमउम्र की लड़की के साथ उसकी सहमति से सेक्स संबंध बनाए हैं। जिस लड़के ने आपसी सहमति से संबंध बनाए थे, उसे गलत तरीके से बलात्कारी के तौर पर पेश किया जाएगा। इसका अंजाम यह होगा कि वह महिलाओं से डरेगा या फिर घृणा करेगा और वह कामुकता और महिलाओं के प्रति विकृत घृणाओं से भरा रहेगा। इसलिए उसके महिलाओं के प्रति हिंसक होने की संभावनाएं अधिक होंगी। और तो और, हम उस दुनिया में रहते हैं जहां वयस्कों के जीवन और विकल्पों को लेकर मोरल पॉलिसिंग काफी खतरनाक है। चाइल्ड सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट के तहत तीसरी पार्टी (माता-पिता, मोरल पॉलिसिंग आउटफिट्स, खाप या और कोई) नाबालिग लड़के के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करा सकता है और न्यायालय में न्यायाधीश लड़के की इस दलील पर कि लड़की की सहमति से उसने ऐसा किया, की अनदेखी कर लड़के को दोषी करार दे सकते हैं। इसलिए कई न्यायाधीशों ने भी मांग की है कि सहमति की उम्र 16 रखी जाए और इसे 18 न बढ़ाई जाए क्योंकि वे नहीं चाहते कि किसी वयस्क बालक को जबर्दस्ती दोषी ठहराया जाए जबकि उसने सहमति से यौन संबंध बनाए। टाटा स्काई के एक विज्ञापन को लेकर जरा सोचें, जिसमें एक भाई अपनी बहन को किसी लड़के के साथ डिनर पर जाने की अनुमति नहीं देता। यदि सहमति की उम्र 18 वर्ष सचमुच बढ़ा दी जाती है तो नाबालिगों के बीच किसी भी तरह का यौन संपर्क स्वत: बलात्कार की श्रेणी में आ जाएगा। ऐसे में जो भाई अपनी बहन की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना चाहता है, वह उसका प्रयोग करेगा और किसी भी लड़के/पुरुष सहपाठी/बहन के दोस्त को दोषी ठहरा देगा। इसलिए जेंडर को लेकर पक्षपातपूर्ण धारणा रखने वाली पुलिस पार्क में एक साथ बैठे जोड़ों को भी परेशान करने से नहीं चूकेगी।
गया झूठी शिकायतें यदि महिला किसी पुरुष के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज कराती हैं तो इसका कानूनी विकल्प क्या है? कानूनी विकल्प आईपीसी सेक्शन-182 और 211 में पहले से मौजूद है। इसके तहत झूठी शिकायत करने पर सजा मौजूद है क्योंकि किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। ऐसे में सवाल है, बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामले में झूठी शिकायतों को लेकर क्यों विशेष प्रावधान किया जाए? इस तरह के प्रावधान महिलाओं को झूठी शिकायतें दर्ज करने से रोकते हैं। याद रखें कि यह विधेयक सिर्फ महिलाओं के संघर्ष का परिणाम है। यह पुरुष-विरोधी नहीं है। यह विधेयक यौन हिंसा संबंधी मामले में पुरुषों के साथ- साथ सभी लोगों की रक्षा के लिए है। यही कारण है कि इसमें पीड़ित को जेंडर मामले में तटस्थ रखा गया है। महिलाओं का संघर्ष ही सरकार को बदलाव लाने के लिए सहमत करता है कि अध्यादेश की गलतियों को सुधारा जाए। बलात्कार कानून में दोषी को ‘विशिष्ट जेंडर’ के तहत रखा गया है (क्योंकि महिला किसी पुरुष का बलात्कार नहीं कर सकती), सहमति की उम्र 16 साल बरकरार रखा गया है और विधेयक में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि बलात्कार के चार्जशीट वाले लोकसेवकों को अभी तक जो संरक्षण प्राप्त था, वह नहीं मिलेगा। ताकझांक, पीछा करना, एसिड हमले और नंगा करने जैसे मामले यौन अपराध के दायरे में आएंगे। ऐसे में, जस्टिस वर्मा की सिफारिशों को पूरी तरह लागू करने को लेकर हमें दूसरी लड़ाई जारी रखनी होगी। बहरहाल, महिलाओं के आंदोलन को लेकर यह विधेयक काफी बड़ी उपलब्धि है।
ताकझांक ताकझांक का अर्थ सिर्फ घूरना नहीं है। ‘फे सबुक’ पर किसी लड़की की तस्वीर अपलोड करना ताकझांक नहीं है। यदि कोई पुरुष अपनी गर्ल फ्रेंड का सेक्स एमएमएस बनाता है या न्यूड फो टो बनाकर उसे सकरुलेट करता है तो इसे ताकझांक कहा जाएगा क्योंकि यह उसकी निजता का हनन है। यदि कोई महिला कपड़े की दुकान के चेंजिंग रूम में कपड़े बदल रही है और वहां गुप्त छेद या गुप्त कैमरे की मदद से उस पर नजर रखी जा रही है तो यह ताकझांक की श्रेणी में आएगा। दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी राम सिंह पर भी ताकझांक करने का आरोप लगा था। उसकी महिला पड़ोसी ने समाचार एजेंसी ‘रॉयटर’ को बताया था कि जब कभी-कभी हम कपड़े बदल रहे होते या नहा रहे होते थे तो वह हमारे घर की झलक ले रहा होता था। विरोध करने पर वह काफी कठोर हो जाता था और कहता था कि उसे कहीं भी खड़ा रहने का अधिकार है। ताकझांक करना मूल रूप से, किसी की निजता को छिप कर जासूसी करने का मामला है। यह कानून पुरुषों की रक्षा भी करता है।
पीछा करना फिल्म "डर" के गाने ˜तू हां कर या ना कर, तू है मेरी सनम को याद कर लें। यह है ˜स्टाकिंग" यानी पीछा करना। लगातार किसी का पीछा करना, धमकीभरे मेल/पत्र भेजना कि तुम पर एसिड फेंक दूंगा या बलात्कार/र्मडर कर दूंगा, इसी श्रेणी में आते हैं। ज्यादातर महिलाएं इसी दहशत में जीती हैं और इसे लेकर कोई उपाय अभी तक नहीं किया गया है। इस मामले में लगातार सड़कों पर आंदोलन हो रहे हैं कि सिर्फ बलात्कारी को ही सजा न मिले बल्कि बलात्कार, र्मडर और एसिड हमलों जैसी घटनाओं पर अंकुश लगे। याद करें- प्रियदर्शिनी मट्टू कांड को। उसने पुलिस के पास कई बार संतोष सिंह के खिलाफ पीछा करने का मामला दर्ज कराया था। लेकिन कोई कानून नहीं था जिसके बिना पर उसे पीछा करने के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता तो संतोष सिंह न तो उसका बलात्कार ही कर पाता और न ही उसकी हत्या। एसिड हमलों के साथ-साथ बलात्कार और र्मडर (धौलाकुआं में राधिका तंवर की हत्या की तरह) मामले अपराधियों द्वारा काफी दिनों तक पीछा करने के बाद ही हुए हैं। पीछा करने के मामले को गैरजमानती क्यों बनाया जाना चाहिए, यह अहम सवाल है क्योंकि पीछा करने वाला, जो एसिड फेंकना चाहता है या गोली मारना चाहता है, वह आगे कदम बढ़ा सकता है और यदि महिला मामला दर्ज करती है तो वह दोगुने गुस्से से ऐसा करेगा। ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि धमकियों को अंजाम देने से पहले उसे गिरफ्तार किया जाए। र्मडर और बलात्कार की तु लना में पीछा करने वाले को दोषी साबित करना आसान है। पीछा करने वालों को लेकर गवाही या फिर दस्तावेज के तौर पर सबूत (धमकी भरा पत्र, फोन कॉल की रिकॉर्डिग वगैरह) उपलब्ध होते हैं। इनके आधार पर अपराध साबित किया जा सकता है औ र सजा दी जा सकती है। पीछा करने के मामले में महिलाओं के साथ- साथ यह अधिकार पुरुषों को भी मुहैया कराया गया है।
साभार :- कविता कृष्णन
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भोजन का अधिकार जीने के अधिकार से जुड़ा हुआ है और संविधान का अनुच्छेद 21 सभी नागरिकों को जीने का अधिकार प्रदान करता है। इस लिहाज से प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा विधेयक स्वागतयोग्य है। पिछले दो दशकों में भारत में भूख एक बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। 1991 में जब आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किए गए थे, तब प्रति व्यक्ति भोजन की खपत 178 किलोग्राम थी, जो 2003 में 155 किलोग्राम रह गई। आबादी में सबसे निचले क्रम के 25 फीसदी लोगों की वर्ष 1987-88 में रोजाना खपत 1,683 किलो कैलोरी थी, जो 2004-05 में 1,624 किलो कैलोरी रह गई। जबकि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मानक क्रमशः 2,400 और 2,011 किलो कैलोरी रोजाना हैं। ये आंकड़े खाद्य सुरक्षा के मोरचे पर आपात उपाय की जरूरत को रेखांकित करते हैं।
हालांकि खाद्य सुरक्षा से संबंधित विधेयक के मसौदे में बड़े खाद्य संकट को नजरंदाज कर दिया गया है और इसमें सारा ध्यान पहले से सीमित लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर केंद्रित किया गया है। खाद्य सुरक्षा के तीन प्रमुख अंग हैं, पारिस्थितिकीय सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा। खाद्य उत्पादन के लिए भूमि, जल और जैव विविधता तीन प्राकृतिक पूंजी मानी जाती हैं, लेकिन इनमें से प्रत्येक गंभीर संकट में है। कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किसानों के साथ अन्याय तो है ही, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा भी है। यदि उर्वर भूमि नहीं रहेगी, तो फसलों का उत्पादन भी प्रभावित होगा। बीजों की हमारी संपदा को वैश्विक निगमों को सौंपा जा रहा है, जिससे जैव विविधता प्रभावित हो रही है और किसानों के अधिकारों का हनन हो रहा है। बीज संप्रभुता के बिना खाद्य संप्रभुता संभव नहीं है। मौसम चक्र में परिवर्तन की वजह से हम तेजी से पारिस्थितिकीय सुरक्षा के मामले में असुरक्षित होते जा रहे हैं। इसी कारण पारिस्थितिकी सुरक्षा और लचीलापन प्रदान करने वाली पारिस्थितिकी खेती खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक हो गई है। खाद्य और कृषि पर ग्लोबल एग्रीबिजनेस के कब्जे और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के पक्षपाती नियमों की वजहों से हम अपनी खाद्य संप्रभुता खोते जा रहे हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा में निष्पक्ष व्यापार और डब्ल्यूटीओ में सुधार आवश्यक है। जीएमओ और रासायनिक तरीके से संवर्द्धित भोजन को बढ़ावा देने से हमारा भोजन असुरक्षित होता जा रहा है। खाद्य सुरक्षा समिति में बहुराष्ट्रीय निगमों के बढ़ते प्रभावों से नागरिक खाद्य सुरक्षा के अधिकार से वंचित होते जा रहे हैं। सुरक्षित भोजन के बिना खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है। आप तब तक लोगों को भोजन मुहैया नहीं करा सकते, जब तक कि आप सबसे पहले पर्याप्त मात्रा में खाद्य उत्पादन सुनिश्चित न कर लें। और खाद्यान्न उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए खाद्यान्न उत्पादकों यानी कृषकों के जीवन यापन के संसाधनों को सुरक्षित रखना होगा। असल में खाद्यान्न पैदा करने का किसानों का अधिकार खाद्य सुरक्षा की दिशा में पहला कदम है। इसी से खाद्य संप्रभुता की अवधारणा ने जन्म लिया है, जिसे हम अन्न स्वराज कह सकते हैं। खाद्य संप्रभुता सामाजिक-आर्थिक मानवाधिकार से उत्पन्न हुई है, जिसमें भोजन का अधिकार और ग्रामीण आबादी के लिए खाद्यान्न उत्पादन का अधिकार शामिल है। यदि किसी देश की आबादी को अपने अगले समय के भोजन के लिए अनिश्चितताओं और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हो रहे उतार-चढ़ाव, भोजन को हथियार के बतौर इस्तेमाल न करने की किसी महाशक्ति की सद्भावना या महंगे परिवहन की वजह से बढ़ती कीमत पर निर्भर रहना पड़े, तब तो वह देश न तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से और न ही खाद्य सुरक्षा के लिहाज से सुरक्षित होगा। इसलिए खाद्य संप्रभुता का मतलब खाद्य सुरक्षा से भी कहीं आगे है। इसके लिए जरूरी है कि गांव में लोगों के पास उर्वर जमीन हो और उन्हें फसलों का उचित दाम मिले, ताकि वे लोगों का पेट भरते हुए खुद भी सम्मानजनक तरीके से जीवन यापन कर सकें। हमारी दो तिहाई आबादी खेती और खाद्यान्न उत्पादन से जुड़ी हुई है। हमारे छोटे किसान देश के लिए खाद्यान्न पैदा करते हैं और 1.21 अरब लोगों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराते हैं। पर पिछले एक दशक के दौरान दो लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली। जब हमारे खाद्यान्न उत्पादक ही नहीं बचेंगे, तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का क्या होगा? खाद्य उत्पादकों की उपेक्षा भारत इसलिए भी बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि हमारा ग्रामीण समुदाय भुखमरी के गहरे संकट से जूझ रहा है। दुनिया भर में भूख का शिकार आधे लोग खाद्य उत्पादन से ही जुड़े हैं। इसका संबंध बढ़ती लागत, बढ़ते रासायनिक उपयोग और हरित क्रांति के रूप में पेश की गई खाद्यान्न उत्पादन की महंगी प्रणाली से है। लिहाजा, किसान कर्ज में डूब जाते हैं और फिर वे जो कुछ भी पैदा करते हैं, उसे कर्ज चुकाने के लिए बेच डालते हैं। कृषि उत्पादन से जुड़े समुदाय की भूख की समस्या का समाधान एग्रो इकोलॉजी के सिद्धांत पर आधारित कम लागत वाली टिकाऊ कृषि उत्पादन के रूप में हो सकता है। पारिस्थितिकीय (ऑर्गेनिक) खेती महंगी नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा की अनिवार्यता है। हमारी ‘हेल्थ पर एकड़’ रिपोर्ट दिखाती है कि पारिस्थितिकी खेती के जरिये हम दो भारत का पेट भर सकते हैं। लेखिका चर्चित कृषि वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं |
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